किस्सा उस खाँटी धरतीपकड़ नेता का जिसने भरे मंच से CM अर्जुन सिंह को ललकारा – “मैं प्रदेश अध्यक्ष हूँ.. आपकी सूची ख़ारिज करता हूँ.. टिकट उन्हें मिलेगी जो लिस्ट मैंने तय की है” वो क़द्दावर नेता जिसने शुक्ल का रथ रोका .. तो भिड़े अर्जुन सिंह से भी

रायपुर, 26 सितंबर 2020। साल 1983.. में अप्रैल का एक दिन..जगह बिलासपुर का लाल बहादुर शास्त्री मैदान.. तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने खचाखच भरे मैदान में एक सूची पढी और सूची को पढ़ कर आख़िर में कहा
“ये आपके बिलासपुर नगर निगम के लिए कांग्रेस के पार्षद होंगे..”
पर इसके बाद जो हुआ उसने हलचल मचा दी, तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के इस ऐलान के तत्काल बाद एक शख़्स ने माईक थामा और दो टूक बात कह दी। उस शख़्स ने कहा
“मैं प्रदेश अध्यक्ष हूँ.. मुख्यमंत्री जी यह संगठन का काम है कि वह तय करें कि किसे टिकट दी जाएगी.. आपकी सूची ख़ारिज करता हूँ.. टिकट उन्हें मिलेगी जो लिस्ट मैंने तय की है”
और नगर निगम बिलासपुर में आख़िरकार हुआ भी यही।मई 83 में नगर निगम बिलासपुर का पहला निर्वाचित दल अस्तित्व में आया और पहले मेयर बने अशोक राव।यह अप्रत्यक्ष प्रक्रिया से मेयर चुने जाने की प्रक्रिया वाला चुनाव था, तब टसल अर्जुन सिंह से मेयर के नाम पर भी गहराई थी लेकिन वह शख़्स सीएम अर्जुन सिंह की नाराज़गी की परवाह किए बिना मेयर पद पर संगठन की पसंद को क़ाबिज़ करा गया।
लेकिन जिसने सियासत के माहिर खिलाड़ी और बाद की राजनीति में कई गुरु माने गए लोगों के भी गुरु रहे अर्जुन सिंह को एक प्रकार से सीधे ललकारा था, उस शख़्स की सियासत भी ख़त्म हो गई। लेकिन जो सही लगा वो किया के अंदाज वाले इस शख़्स ने जो रेखा खींची उसे कोई छोटा नहीं कर पाया।
वह शख़्स जिसने तत्कालीन मध्यप्रदेश की सियासत में भूचाल ला दिया था उनका नाम था पंडित रामगोपाल तिवारी। पंडित रामगोपाल तिवारी ने जब मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सर्वशक्तिमान होने के भाव को मंच से चूर चूर किया था तब पंडित रामगोपाल अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे।
पंडित रामगोपाल तिवारी को लेकर एक बात और जान लीजिए, यही वे शख्स थे जिन्होंने छत्तीसगढ़ के शुक्ल बंधुओं में एक श्यामाचरण शुक्ला की कांग्रेस वापसी पर लगे ब्रेक को हटाने की कोशिश कर तत्कालीन सीएम अर्जुन सिंह का कोप चरम पर ला दिया था। सन् 1980 में जबकि पंडित रामगोपाल तिवारी पीसीसी के अध्यक्ष बने, पंडित श्यामाचरण कांग्रेस वापसी के लिए पुरज़ोरताक़त लगा रहे थे, दरअसल आपातकाल के बाद श्यामाचरण कांग्रेस से अलग हो गए थे, हालाँकि जब कांग्रेस 1980 में पूरी ताक़त से लौटी तो श्यामाचरण वापस इंदिरा कांग्रेस की ओर लौटने की क़वायद में लगे, और तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने पूरा ज़ोर लगा दिया कि श्यामा चरण शुक्ल की वापसी ना हो सके, लेकिन पीसीसी चीफ़ पंडित रामगोपाल तिवारी ने अर्जुन सिंह को दो टूक मना कर श्यामाचरण शुक्ल की कांग्रेस वापसी की राह में अवरोध बनने से इंकार कर दिया।
पंडित रामगोपाल तिवारी बेहद दृढ़ व्यक्तित्व के थे और उनकी दृढ़ता को लेकर सटीक आंकलन उसी बिलासपुर की घटना से मिलता है आख़िर वही इकलौते थे जिन्होंने अर्जुन सिंह की घोषणा को उन्हीं के सामने मंच से खचाखच भरी भीड़ के सामने ख़ारिज कर दिया था।
राजनीति बिलकुल अविश्वसनीय बेहद निर्दयी और बला की निर्मम होती है। इसे थाम पाना कभी किसी के बस में स्थाई नहीं रहा। लेकिन फिर भी अर्जुन सिंह उन लोगों में शरीक माने जाएँगे जिन्होंने कुछ क्षण के लिए सही पर सियासत को थामा।नतीजतन अर्जुन सिंह को मंच से ख़ारिज करने वाले पंडित रामगोपाल तिवारी पीसीसी का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। उन्हें 1983 में इस पद से हटना पड़ा।
पंडित रामगोपाल तिवारी इसके बाद वकालत की ओर मूड़ गए। पंडित रामगोपाल तिवारी 1967 के उपचुनाव में अकलतरा से जीते थे।वे 1971 में संविद सरकार में मंत्री भी रहे। सन् 1971 में ही उन्होंने बिलासपुर लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की थी।सन् 1980 में वे फिर सांसद बने, ये वही जांजगीर का चुनाव था, जिसमें बसपा संस्थापक काशीराम ने पहली बार चुनाव लड़ा था। इसके बाद पंडित रामगोपाल तिवारी को सन् 1990 में सीपत से टिकट मिली, वे ढाई हज़ार मतों से हारे। यह वही चुनाव था जिसमें खुला घात हुआ था, यह वही चुनाव था जिसमें राजीव गांधी का कुर्ता पकड़ने की कोशिश हुई थी।
पंडित रामगोपाल तिवारी को “सहकारिता पुरुष” भी कहा गया। उन्होंने सहकारिता के क्षेत्र में आसमान की उंचाई को भी बौना कर दिया था।वे नोफेड के अध्यक्ष रहे थे। पंडित रामगोपाल तिवारी मार्कफेड के पहले अध्यक्ष थे।पंडित रामगोपाल तिवारी को तत्कालीन प्रधानमंत्री पी व्ही नरसिम्हा राव ने सहकारिता पुरुष के सम्मान से नवाज़ा था।
सहकारिता के क्षेत्र में देश ही नहीं विदेश तक में अपनी मौजुदगी बेहद पुख़्ता तरीक़े से जताने वाले पंडित रामगोपाल तिवारी अंतिम दिनों में अल्जाईमर से लड़ते हुए देह छोड़ गए, लेकिन दृढ़ता अडिगता के कई क़िस्से वे छोड़ गए।
जिस बिलासपुर के पंडित रामगोपाल तिवारी थे और जहां के लिए उन्होंने तत्कालीन सत्ता प्रमुख से सीधे टकराहट को स्वीकारा, उस बिलासपुर में उनकी स्मृति में ना वार्ड ना प्रतिमा।

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