राजभवन और सरकार के बीच बढ़ रहा टकराव…? राजभवन के सिकेट्री सोनमणि बोरा हटाए गए, गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू राजभवन की मीटिंग से पहले अचानक क्वारंटाईन हो गए

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रायपुर, 14 अक्टूबर 2020। राजभवन के सचिव सोनमणि बोरा को सरकार ने आज हटा दिया। उनकी जगह बस्तर कमिश्नर अमृत खलको को नया सिकेट्री नियुक्त किया गया है। वहीं, केडी कुंजाम को राजभवन का संयुक्त सचिव।
सामान्य प्रशासन के आदेश के अनुसार खलको की मूल पोस्टिंग सचिव कृषि रहेगी। राजभवन सिकेट्री का अतिरिक्त प्रभार रहेगा उनके पास। आमतौर पर ऐसा होता नहीं। राजभवन की मूल पोस्टिंग होती है और दूसरे विभाग एडिशनल रहते हैं। लेकिन, खलको की मूल पोस्टिंग कृषि रहेगी। इसी तरह केडी कुंजाम के पास नियंत्रक खाद्य और औषधि के साथ ज्वाइंट सिकेट्री राजस्व, आपदा और सामान्य प्रशासन पहले से था। राजभवन के संयुक्त सचिव का चार्ज अतिरिक्त रहेगा।
हालांकि, सोनमणि को सेंट्रल डेपुटेशन पर जाना है। लेकिन, अभी तक पोस्टिंग आदेश जारी नहीं हुआ है। जब तक भारत सरकार से आदेश निकल नहीं जाता, तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता। लिहाजा, सोनमणि की राजभवन से विदाई से लोग चौंक गए। फिर, खलको की जगह बस्तर में किसी नए कमिश्नर की नियुक्ति नहीं की गई है। ये ऐसे केस में होता है, जब सरकार कोई मैसेज देना चाहती हो। रुटीन पोस्टिंग में ऐसा नहीं होता।
बताते हैं, सोनमणि बोरा के हटाए जाने की जानकारी राजभवन को भी नहीं थी। जीएडी का आदेश जब वायरल हुआ तो पता चला कि सचिव बदल गए हैं। जानकारों का कहना है, राजभवन और राज्य सरकार के बीच केमेस्ट्री जब ठीक रहती है तो सरकार राजभवन के अधिकारियों को बदलने से पहले राजभवन की पसंद पूछ लेता है या फिर राजभवन जिस अफसर को चाहता है, उसे पोस्ट कर दिया जाता है। लेकिन, ये तभी होता है जब रिश्ते ठीक हो।
दूसरी घटना आज ये हुई कि राज्यपाल कानून-व्यवस्था को लेकर आज राजभवन में बैठक करने वाली थी। इसमें गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू, डीजीपी समेत गृह और पुलिस विभाग के शीर्ष अधिकारियों को मौजूद रहना था। मगर ऐन वक्त पर जानकारी आई कि गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू क्वारंटाईन हो गए हैं, इसलिए बैठक स्थगित की जा रही है।
राजभवन और राज्य सरकार के बीच टकराव की नींव कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता विवि के कुलपति की नियुक्ति के दौरान पड़ी थी। जब राजभवन ने संघ पृष्ठभूमि के बलदेव शर्मा को वीसी नियुक्त कर दिया। बलदेव शर्मा की नियुक्ति को कांग्रेस और उसकी छात्र इकाई एनएसयूआई ने विरोध किया था। इसके बाद छत्तीसगढ़ विवि संशोधन विधेयक समेत कई विधेयक राजभवन में पेंडिंग पड़ी है। इसको लेकर सरकार के चार मंत्री राज्यपाल से मिलने राजभवन गए थे। लेकिन, अभी तक ये क्लियर नहीं हुआ है।
कोई भी नया बिल या संशोधन के मामले में नियम यह है कि विधानसभा से बिल पास होने के बाद आखिरी दस्तखत करने के लिए उसे राज्यपाल के पास भेजा जाता है। राज्यपाल अगर किसी सुझाव के साथ एक बाद विधेयक लौटा देते हैं तो कैबिनेट दोबारा बिल राजभवन भेजता है। राज्यपाल की बाध्यता होती है दूसरी बार बिल पर दस्तखत करने की। मगर विवि संशोधन विधेयक को राजभवन आवश्यक कार्रवाइयो के लिए अपने पास रख लिया है। करीब चार महीने से विधेयक राजभवन में है। चारों मंत्रियों को राज्यपाल ने बताया था कि उन्होंने यूजीसी से मार्गदर्शन मांगा है, उसके बाद विधेयक पर निर्णय लेंगी। बताते हैं, राज्यपाल विवि अधिनियमों में किए गए संशोधनों से सहमत नहीं हैं। इस विधेयक के पास हो जाने से कुलपति नियुक्ति का अधिकार राजभवन की बजाए राज्य सरकार को मिल जाएगा।
इसके बाद राज्य सरकार ने गौरेला को नगर पंचायत का दर्जा दिया तो राजभवन ने उसे पांचवी अनुसूची के तहत बिना राज्यपाल की अनुमति से ऐसा करने से रोक दिया। कांकेर के पत्रकार मारपीट मामले में भी राजभवन की सक्रियता सरकार को जाहिर है खटकी होगी। राजभवन और सरकार के बीच दुरियां बढ़ने के ऐसे कई कारण हैं।

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