पत्रकारिता के बदलते मायने और गाँधी

अखिलेश कुमार तिवारी

पत्रकारिता देश के चौथे स्‍तंभ के रूप में देखा जाता है। इस खंभे की ताकत ही थी कि अकबर इलाहाबादी ने भी तोप मुकाबिल होने पर अखबार निकालने की बात कही थी। स्‍वतंत्रता संग्राम से लेकर तमाम कुरीतियों को खत्‍म करने के लिए पत्रकारिता ही सबसे सशक्‍त माध्‍यम रहा। देश के बड़े-बड़े विद्वान, चिंतक, सुधारक ने इसे ही सबसे उत्‍तम माध्‍यम माना, जिसमें गांधी जी भी शामिल थे। गांधी जी ने भी अपनी लड़ाई अथवा संघर्षों को पत्रकारिता के माध्‍यम से ही सामने लाया।

आज जब पत्रकारिता व्यावसायिकता की चरम सीमा पर है, तो राष्‍ट्रपिता महात्मा गांधी की पत्रकारिताको याद करना जरूरी हो जाता है। उनकी पत्रकारिता का उद्देश्‍य राष्‍ट्रीयता एवं जन जागरण था। देश की नई पीढ़ी महात्मा गांधी को सत्य और अहिंसा के बल पर आजादी की लड़ाई के लिए जानती है। लेकिन मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी बनने के उनके सफर में पत्रकारिता के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत पत्रकारिता से ही की थी। सन् 1898 में जब वे 19 वर्ष की आयु में कानून की पढ़ाई करने लंदन पहुंचे, तो ‘टेलीग्राफ’ और डेली न्यूज’ जैसे अखबारों में लेख लिखना प्रारम्भ किया। गांधी जी ने स्वतंत्र लेखन के माध्यम से पत्रकारिता में प्रवेश किया था। दक्षिण अफ्रीका में अश्‍वेतों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ उन्होंने भारत से प्रकाशित‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’, ‘हिंदू’ ’अमृत बाजार पत्रिका’, ‘स्टेट्समेन’ आदि पत्रों में लगातार लिखतेरहे। न्यायालय परिसर में उन्हें पगड़ी उतारने के लिए मजबूर किया गया, तो उन्होंने डरबन के एक स्थानीय सम्पादक को खत लिख कर विरोध जताया। उनके इस पत्र को अखबार ने जस का तस प्रकाशित कर दिया। यहीं से गांधी जी की पत्रकारिता प्रारम्भ हुई।

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ लड़ाई के दौरान गांधी जी की पत्रकारिता पुष्पित-पल्लवित हुई। यहां उन्होंने जनमत निर्माण करने एवं ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध लोगों को जागरूक करने में पत्रकारिता को अपना हथियार बनाया। दक्षिण भारत में उन्होंने ‘इंडियन ओपिनियन’ नामक पत्र का सम्पादन प्रारम्भ किया। 1903 में ‘इंण्डियन ओपिनियन’ का पहला अंक चार भाषाओं हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती एवं तमिल में प्रकाशित हुआ। जानकारों के अनुसार संभवतः गांधी जी भारत के पहले ऐसे पत्रकार हैं, जिन्होंने चार भाषाओं में पत्रकारिता की। ‘इण्डियन ओपिनियन’ के पहले अंक में ही उन्होंने पत्रकारिता के उद्देश्‍यों की स्पष्‍ट व्याख्या की थी। उनका मानना था कि पत्रकारिता का पहला काम जन भावनाओं को समझना एवं उन्हें अभिव्यक्ति देना है। भारत में आकर गांधी जी ने ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ नामकदो समाचार पत्रों को 1919 में प्रारम्‍भ किया, जिसका प्रकाशन सन् 1932 में गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद बंद हो गया।

आज गलाकाट प्रतिस्पर्धा का युग है। पत्रकारिता का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं। टीआरपी, प्रसार संख्या, पाठकों की संख्या (रीडरशिप) बढ़ाने के लिए सनसनीखेज खबरों को महत्व दिया जा रहा है। पत्रकारिता विज्ञापन आधारित हो गई है। इससे मीडिया की निष्‍पक्षता और विश्‍वसनीयता प्रभावित हुई है। महात्मा गांधी के शब्दों में “मैंने पत्रकारिता को केवल पत्रकारिता के प्रयोग के लिए नहीं, बल्कि उसे जीवन में अपना जो मिशन बनाया है, उसके साधन के रूप में अपनाया है।’’ ’इण्डियन ओपिनियन’ के जरिए अपने विचारों और सिद्धांतों पर चलते हुए समाज के अंतिम छोर के व्यक्ति के हित में आवाज उठाई। यह उनकी सत्यनिष्‍ठ, निष्‍पक्ष, सामयिक एवं निर्भीक पत्रकारिता का ही प्रभावथा कि अफ्रीका जैसे रंगभेद के प्रकोप वाले देश में प्रतिकूल परिस्थितियों में चार अलग-अलग भारतीय भाषाओं में ‘इण्डियन ओपिनियन’ का प्रकाशन होता रहा। महात्मा गांधी के अनुसार-“मेरा ख्याल है कि कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्मबल हो, अखबार की सहायता के बिना नहीं चलाई जा सकती। अगर मैंने अखबार निकाल कर दक्षिण अफ्रीका में बसी हुई भारतीय जमात को उसकी स्थिति न समझाई होती, तो मैं अपने उद्देश्‍य में सफल नहीं हो पाता। इस तरह मुझे भरोसा हो गया कि अहिंसक उपायों से सत्य की विजय के लिए अखबार एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य साधन है।’’

गांधी जी की पत्रकारिता के बरक्‍स आज की पत्रकारिता में बड़ा बदलाव देखा जा सकता है। मैंने छत्तीसगढ़ के दो प्रमुख समाचार पत्रों में काम किया है। करीब डेढ़ दशक। इस दौरान प्रदेश के कई वरिष्ठ पत्रकारों का सानिध्य एवं मार्गदर्शन मुझे मिला। इनमें से अधिकांश आज भी पत्रकारिता व्योम में दैदीप्यमान हैं। शुरू के दो-तीन वर्ष तो पत्रकारिता का ककहरा सीखने में गुजर गए। बाकी समय एक्सक्लुसिव खबरें लाने की जद्दोजहद से जूझता रहा। पन्द्रह वर्षों में यह सोचने का अवसर नहीं मिला कि पत्रकारिता क्या है? गाँधी जी को पढ़ने के बाद इतना जरूर समझ पाया कि आज की पत्रकारिता पहले से काफी भिन्न हो चुकी है। कई पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादक रहे राकेश रेणु ने अपने आलेख ‘गाँधी की पत्रकारिता के बरक्स आज की पत्रकारिता’में लिखा है- “गाँधी गुजरी सदी के बेहद प्रभावशाली पत्रकार थे। वह अपने अख़बारों में कोई विज्ञापन प्रकाशित नहीं करते थे। अपने पाठकों से वह चंदे और दान की मांग करते थे, लेकिन शासन तंत्र से नहीं।” इसी तरह डॉ. सुरेन्द्र वर्मा अपने आलेख ‘गाँधी जी और पत्रकारिता’ मेंलिखते हैं- “गाँधी जी ने पत्रकारिता को कभी एक व्यवसाय के रूप में स्वीकार नहीं किया। वे एक मिशनरी पत्रकार थे और वे इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि उनके मिशन की सफलता के लिए पत्रकारिता एक अत्यन्त सशक्त माध्यम है।

आज जब पत्रकारों की कलम भोथरी हो गई है। सम्पादक का स्थान प्रबंध सम्पादकों, मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) एवं प्रबंधकों ने ले लिया है, महात्मा गांधी की पत्रकारिता को जानना, समझना एवं पढ़ना बेहदजरूरी हो जाता है। समाजशास्त्री आनंद कुमार के अनुसार-“एक पत्रकार के रूप में गांधी जी किसी भी तरह के दबाव से परे थे। उनके जीवन की तरह उनकी पत्रकारिता भी नैतिकता और सत्य के आग्रह से संचालित थी। क्षेत्रीय भिन्नताओं के बावजूद उनके लिए न तो भाषाएं दीवार खड़ी कर सकी और न ही वर्गीय दबाव उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य कर सके।’’

गाँधी जी ने अपने समाचार पत्रों में कभी विज्ञापन स्वीकार नहीं किया। वहीं मौजूदा दौर में पत्रकारिता, विज्ञापन आधारित दिखाई देती है। ख़बरों पर विज्ञापन का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होने लगा है। इससे खबरों की विश्वसनीयता पर असर पड़ा है। विज्ञापन एवं उचित-अनुचित लाभ के लिए पत्रकारिता, सत्ता के इर्द-गिर्द घूमने लगी है।बड़े पूंजीपति व उद्योगपति मीडिया के स्वामी बन गए हैं। यही वजह है कि पत्रकारिता ने ‘मिशन’ के स्थान पर ‘प्रोफेशन’ का रूप धारण कर लिया है। पत्रकारिता में नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है। मीडिया की आड़ में कई धंधे फल-फूल रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के मालिक सत्ता में भागीदारी के लिए प्रयास करते नजर आते हैं।

प्रेस की आजादी और प्रेस पर सरकार के नियंत्रण के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी का स्पष्ट मत था कि कलम की निरंकुशता खतरनाक हो सकती है, लेकिन उस पर व्यवस्था का अंकुश ज्यादा खतरनाक है। दक्षिण अफ्रीका के पत्रकारिता के दिनों को याद करते हुए उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है-“समाचार पत्र सेवा भाव से ही चलाना चाहिए। समाचार पत्र एक जबरदस्त शक्ति है। लेकिन जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गाँव के गाँव को डूबा देता है और फसल को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार निरंकुश कलम का प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता है। लेकिन यदि ऐसा अंकुश बाहर से आता है, तो वह निरंकुशता से भी अधिक विषैला सिद्ध होता है। अंकुश अन्दर का ही लाभदायक हो सकता है।” वहीं आज मीडिया की स्थिति किसी से छिपी नहीं। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया से प्रश्न पूछने की आजादी छिन सी गयी है। सत्ता का साथ नहीं देने पर विज्ञापन बंद करने की धमकी दी जाती है। जिस देश में मीडिया पर अंकुश लगाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाये जाते हैं, वहां स्वस्थ लोकतंत्र की बात करना बेमानी होगी। गाँधी जी के आदर्शों और सिद्धांतों पर ही चल कर ही हम पत्रकारिता के मानवीय मूल्यों की रक्षा कर सकते हैं।

पत्रकारिता का भय और ताकत ही था कि सरकार को कई प्रेस अधिनियम औरसेंसरशिप लागू करने पड़े थे। अंग्रेजी हुकूमत के मन मेंअखबारों और पत्र-पत्रिकाओं का ऐसा आतंक था कि ‘देहली उर्दू’,‘पयामे आजादी’आदिजैसेकुछ अखबार या पत्र-पत्रिकाएं किसी के घर से बरामद हो जाने पर उन्‍हें देशद्रोही करार दे दिया जाता था या काला पानी की सजा दे दी जाती थी। किंतु आज के दौर में कहां है, पत्रकारिता का वह भय और आतंक? धन-बल के आगे नतमस्‍तक होने वाले पत्रकारों ने पत्रकारिता की पूरी की पूरी परिभाषा बदल कर रख दी है। उनका पूरा दिन सनसनीखेज खबरों में ही निकल जाता है। उन्‍हें देखकर ऐसा लगता है कि उनके जहन और पेशे से प‍त्रकारिता का मिशन तो किसी कोने में कब का दफन हो चुका है। महात्‍मा गांधी की प‍त्रकारिता में सनसनीखेज खबरों के लिए कोई स्‍थान नहीं था। वही आज सनसनीखेज खबरें मीडिया के लिए सस्‍ती लोकप्रियता प्राप्‍त करने का साधन बन गई है।

(लेखक गुरु घासीदास केंद्रीय विश्‍वविद्यालय बिलासपुर में हिंदी अधिकारी हैं)

 

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