3D प्रिंटिंग में बड़ी सफलता: चीनी वैज्ञानिकों ने बनाई नई तकनीक, अब सिर्फ 1 सेकंड से भी कम समय में तैयार होगी 3D वस्तु
China Tsinghua University 3D Printing Technology: चीन की Tsinghua (सिंघुआ) यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 3D प्रिंटिंग के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। उन्होंने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है जिसके ज़रिए अब सिर्फ 0.6 सेकंड में ठोस वस्तु का निर्माण किया जा सकता है। यह खोज मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है।

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China Tsinghua University 3D Printing Technology: 3D प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी ने पिछले कुछ सालों में पूरी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री का नक्शा ही बदल कर रख दिया है। फैक्ट्रियों में प्रोडक्शन का तरीका बदला है और प्रोटोटाइपिंग में नई जान आई है। मगर एक दिक्कत इस टेक्नोलॉजी के साथ हमेशा से रही है जिसकी वजह से इसका पूरा फायदा नहीं उठाया जा सका। वो दिक्कत है रफ्तार की। कोई भी चीज़ 3D प्रिंट करनी हो तो मिनटों से लेकर घंटों तक का इंतज़ार करना पड़ता है।
अब चीन के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का तोड़ निकाल लिया है। बीजिंग की मशहूर Tsinghua (सिंघुआ) यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने एक ऐसी नई तकनीक ईजाद की है जो एक सेकंड से भी कम वक्त में ठोस वस्तु तैयार कर देती है। SCMP (साउथ चाइना मार्निंग) की रिपोर्ट में इस खोज के बारे में विस्तार से बताया गया है।
आखिर कैसे काम करती है यह नई तकनीक
जो 3D प्रिंटिंग मशीनें अभी तक इस्तेमाल हो रही थीं उनमें लेयर बाय लेयर यानी परत दर परत प्रिंटिंग होती थी। चीनी वैज्ञानिकों ने इस पूरे कॉन्सेप्ट को ही बदल दिया है। नई तकनीक में होलोग्राफिक प्रोजेक्टेड लाइट फील्ड का इस्तेमाल होता है जो एकदम अलग तरीके से काम करती है।
इस तकनीक में एक पारदर्शी चैम्बर का उपयोग किया जाता है जिसके अंदर फोटोसेंसिटिव रेज़िन भरी होती है। ये रेज़िन रोशनी के प्रति बेहद संवेदनशील होती है। जब इस चैम्बर पर खास तरह का लाइट पैटर्न डाला जाता है तो वो तरल पदार्थ फौरन ठोस 3D आकार में बदल जाता है। सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि पूरी प्रक्रिया केवल 0.6 सेकंड में ही पूरी हो जाती है।
पुराने तरीके में क्या खामियां थीं
मार्केट में आज जितनी भी 3D प्रिंटिंग मशीनें मिलती हैं वो सब मैकेनिकल स्कैनिंग पर डिपेंड करती हैं। प्लास्टिक की प्रिंटिंग हो या मेटल की या फिर मेडिकल फील्ड के लिए स्पेशल मटीरियल की हो, सबमें यही तरीका अपनाया जाता था। मशीन पहले एक लेयर बनाती है उसके बाद दूसरी लेयर फिर तीसरी और ये सिलसिला चलता रहता है। इसी वजह से थोड़ा सा भी कॉम्प्लेक्स पार्ट बनाने में घंटों का वक्त लग जाता था। इंडस्ट्री में तेज़ प्रोडक्शन की डिमांड तो बढ़ती जा रही थी लेकिन टेक्नोलॉजी साथ नहीं दे पा रही थी।
किन इंडस्ट्रीज़ के लिए फायदेमंद रहेगी यह खोज
टेक इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस नई तकनीक से कई बड़े सेक्टर्स को जबरदस्त फायदा होने वाला है। इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां अपने नए प्रोडक्ट्स के प्रोटोटाइप अब बहुत जल्दी बना पाएंगी जिससे प्रोडक्ट डेवलपमेंट का समय काफी कम हो जाएगा। मेडिकल फील्ड में मरीज़ों के लिए कस्टमाइज़्ड इम्प्लांट्स तैयार करने में अब उतना इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। एयरोस्पेस इंडस्ट्री में जहां पार्ट्स की क्वालिटी और स्पीड दोनों मायने रखती हैं वहां ये तकनीक बड़ा बदलाव ला सकती है। ऑटोमोबाइल सेक्टर को भी इस तकनीक से काफी फायदा होने की उम्मीद है।
अभी क्या सीमाएं हैं और भविष्य में क्या होगा
हालांकि इस तकनीक की कुछ लिमिटेशंस भी हैं जिन पर अभी काम करना बाकी है। फिलहाल इस तकनीक से सिर्फ मिलीमीटर साइज़ के छोटे छोटे पार्ट्स ही बनाए जा सकते हैं। बड़े आकार की चीज़ें बनाने के लिए वैज्ञानिकों को अभी और रिसर्च करनी होगी। लेकिन अगर इस टेक्नोलॉजी को बड़े स्केल पर ले जाया गया तो छोटे बैच प्रोडक्शन से लेकर मास मैन्युफैक्चरिंग तक सबकुछ बदल जाएगा। टेक एक्सपर्ट्स इसे असली मायनों में इंस्टेंट 3D प्रिंटिंग की दिशा में पहला बड़ा कदम मान रहे हैं।
