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तर्रेम जहां 22 बरस पाँच महिने पच्चीस दिन पहले हुआ था.. माओवादियों का वो पहला बड़ा हमला.. जिसमें मारे गए थे सत्रह जवान..दिलचस्प कि बाईस बरस बाद भी कोई सबक़ नहीं

रायपुर,4 अप्रैल 2021। तर्रेम का वो इलाक़ा जहां कल माओवादियों के ट्रेप में फँसे 22 जवानों की शहादत हुई और तीस से अधिक घायल हुए जबकि एक पंक्तियों के लिखे जाने तक लापता है, उसी तर्रेम ईलाके में धरती बाईस बरस पांच महिने और 25 दिन पहले भी जवानों के खून से लाल हो चुकी है।
तारीख़ थी 8 अक्टूबर 1998 जबकि माओवादियों ने तर्रेम इलाक़े से गुजर रही पुलिस जवानों से भरी लॉरी और ठीक पीछे चल रही जीप को लैंड माइंस का इस्तेमाल कर उड़ा दिया था। इस हादसे में अठारह जवान शहीद हुए थे, हालाँकि कुछ रिपोर्ट इसमें शहीद हुए जवानों की संख्या सत्रह बताती है।
यह हमला माओवादियों के भीषण हमलों की शुरुआत के रुप में दर्ज हुआ, इसके लिए भेज्जी इलाक़े में जरुर एक ब्लास्ट हुआ था लेकिन इस हमले को पहला सबसे बड़ा हमला माना गया।
उस वक्त दंतेवाड़ा कप्तान टी लांगकुमेर थे,जिनकी इस घटना के बाद खासी आलोचना हुई थीं। घटना को लेकर जो ब्यौरा मिलता है उसके अनुसार टीम सर्चिंग पर थी,सात अक्टूबर की रात क़रीब साढ़े बारह बजे रवाना हुई, पुलिस को सूचना थी कि, माओवादी उपर पहाड़ी पर कैंप किए हुए हैं, पुलिस की रणनीति थी कि दो टीमें होंगी एक जो उपर पहुँचेगी और हमला करेगी, यदि नक्सलवादी नीचे भागे तो नीचे वाली टीम के शिकार बनेंगे।एक टीम उपर पहुँची तो माओवादियों के कैंप होने की केवल निशानी मिली, माओवादी नदारद थे। इधर वो टीम जो पहाड़ी से नीचे थी आख़िरकार वो लौटने के लिए लॉरी और कमांडर जीप पर सवार हो गई। आठ अक्टूबर 1998 को ठीक दस बजकर दस मिनट पर ब्लास्ट हुआ और जवानों से भरी लॉरी हवा में उड़ गई, क़रीब सौ मीटर पीछे चल रही पुलिस अधिकारियों की कमांडर जीप भी चपेट में आई। इसके ठीक बाद माओवादियों ने फ़ायरिंग शुरू कर दी, जवान करीब 90 मिनट तक पूरी बहादुरी से लड़ते रहे लेकिन सत्रह जवानों की शहादत के साथ यह घटना बस्तर के इतिहास में दर्ज होने से नहीं रोक सके।
जबकि इस घटना की रिपोर्ट अख़बारों में छपी जिसमें से एक की कतरन इस खबरनवीस को सामाजिक कार्यकर्ता संपत झा के ज़रिए हासिल हुई तो उसमें लिखी लाईन लगता है कि माओवादियों से मुठभेड़ के इतिहास में शुरु से लागू होते आई हैं।बस्तर के पत्रकार सुरेश रावल की इस रिपोर्ट में उल्लेख है कि “माओवादियों को पुलिस की हर गतिविधि और रणनीति की जानकारी थी और वे धैर्य से इंतज़ार कर रहे थे।”
पत्रकार सुरेश रावल जबकि इस खबर की रिपोर्ट लिखते हुए यह पंक्ति लिख रहे थे तो शायद ही उन्हें पता होगा कि यह पंक्तियाँ बाईस बरसों बाद भी जबकि माओवादियों के बड़े हमलों की रिपोर्ट लिखी जाएगी, यह पंक्तियाँ लिखी जाती रहेंगी।
बाईस बरसों में कई मुठभेड़ हुई हैं और माओवादियों ने साबित किया है कि धोखे की रणनीति में उनका अब तक कोई सानी नहीं है।यह भी साबित होते आया है कि, माओवादियों के हमले रणनीतिक रुप से सशस्त्र बलों पर भारी पड़ते हैं क्योंकि जंगल के भीतर छल के हथियार के साथ बार बार अपनी रणनीति तो माओवादी बदलते हैं लेकिन सुरक्षा बलों के रणनीतिकार उतने चपल साबित नहीं होते।
बस्तर में आशिंक सफल लेकिन भयावह विवादित रहे तत्कालीन आईजी शिवराम प्रसाद कल्लुरी की यह बात मुझे भुले नहीं भुलती और ज़ब ज़ब ऐसी घटनाएँ होंगी यह बात याद आते रहेगी। IPS एसआरपी कल्लुरी ने तब मुझे कहा कहा था-
“माओवादियों और माओवाद से लड़ाई धोखे की लड़ाई है जो जितना बडा धोखेबाज़ जीत उसकी उतनी तय”

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