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तरकश : आईएएस की हिन्दी

संजय के दीक्षित
तरकश, 5 सितंबर 2021

आईएएस की हिन्दी

ग्लोबल इंवेस्टर्स मीटिंग की खबर आई तो 10 साल पहले नवंबर 2012 में हुए पहले इंवेस्टर्स मीट की याद ताजा हो गई। उस समय मुंबई के रोड शो में एक बडा दिलचस्प वाकया हुआ था। इंवेस्टर्स मीट के बारे में बताने के लिए एक गैर हिन्दी भाषी आईएएस खड़े हुए। दो-तीन लाईन टूटी-फूटी हिन्दी में उन्होंने छत्तीसगढ़ के बारे में बताया। फिर, इस शब्द पर आकर उनकी गाडी अटक गई….एक बार आप छत्तीसगढ आएंगे तो….आईएएस को कुछ सूझ नहीं रहा था कि इसके आगे क्या बोलना चाहिए। पीछे भीड़ जुटाने की दृष्टि से कुछ चिरकुट टाईप उद्योगपति बैठे थे, जिनका इंवेस्ट से कोई लेना-देना नहीं होता। इंवेंट आरगेनाइजिंग कंपनियां भीड़ दिखाने के लिए उन्हें जुटा लेती है। उनमें से कुछ लोग हौले से बोल बैठे…एक बार आओगे तो फिर दोबारा नहीं आओगे। मौके की नजाकत को भांपते मुख्यमंत्री रमन सिंह ने तुरंत सामने रखे माइक उठाया और बोले…हिन्दी कमजोर होने के कारण वे ठीक से अपनी बात रख नहीं पा रहे। इनके कहने का मतलब यह है कि एक बार छत्तीसगढ़ आएंगे तो बार-बार आएंगे। इस पर जमकर ठहाके लगे थे।

सबक ले सरकार

अगले साल जनवरी में आयोजित होने वाले इंवेस्टर्स मीट के लिए अच्छी बात यह है कि इसमें सरकार का कोई खर्चा नहीं होगा। इसके लिए प्रायोजक मिल गया है, जो मेला स्थल पर एडवर्टाइजिंग से अपना खर्चा निकालेगी। मगर सरकार को यह देखना चाहिए कि एमओयू के साथ उद्योग लगाने की एक हद तक गांरटी मिले। क्योंकि, 2012 के इंवेस्टर्स मीट का कड़वा सच यह है कि साढ़े तीन लाख करोड़ के पूंजी निवेश के लिए 275 एमओयू हुए थे। उनमें से मात्र सात कंटीन्यू हैं। बाकी सभी इसलिए निरस्त हो गए क्योंकि, उन्होंने दस साल में एक ढेला काम नहीं किया। जिन सात के एमओयू अभी अस्तित्व में हैं, उनकी दस साल में कुल जमा उपलब्धि यह है कि जमीन लेकर बाउंड्री बना ली है। कब प्लांट लगाएंगे और तब उत्पादन प्रारंभ होगा, इसका कोई भरोसा नहीं। सरकार को एमओयू की संख्या की बजाए इस पर ध्यान देना चाहिए कि ठोस लोगों के साथ एमओयू किया जाए, जो उद्योग लगाने के प्रति गंभीर हो।

पहले कप्तान

राजधानी रायपुर के एसएसपी अजय यादव सूबे के ऐसे पुलिस कप्तान होंगे, जिनकी पोस्टिंग के साथ ही हटने की चर्चाएं शुरू हो गई थी। कोई महीना ऐसा नहीं गुजरता कि लोग दावे नहीं करते कि बस, अजय यादव अब जाने वाले हैं। जून में जब उनका एक बरस पूरा हुआ तो लोग ऐलानिया बोलने लगे थे…कप्तान दुर्ग रेंज प्रभारी बनकर जा रहे हैं। वैसे, कम लोगों को पता है कि अजय यादव को रायपुर का एसपी बनाए जाने के पहले लिस्ट से उनका नाम कट जाने की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। याद होगा, राजधानी की खास लॉबी ने उनका विरोध भी किया था। मगर लास्ट ऑवर में मुख्यमंत्री ने अजय के नाम के आगे चिड़िया बिठा दिया था।

अमरेश चले विलायत

2005 बैच के आईपीएस अमरेश मिश्रा हायर स्टडी के लिए विलायत जा रहे हैं। लंदन स्थित आक्सफोर्ड में एक साल के पब्लिक पॉलिसी कोर्स के लिए उनका सलेक्शन हुआ है। अमरेश फिलहाल डेपुटेशन पर एनआईए में हैं। वे डीआईजी लेवल के अधिकारी हैं। दंतेवाड़ा, कोरबा, दुर्ग और रायपुर के पुलिस कप्तान रह चुके हैं। 2019 में प्रतिनियुक्ति पर वे दिल्ली गए थे।

राजभवन का रिकार्ड

आमतौर पर राज्यपालों को रबड़ स्टैम्प माना जाता है…राजभवन की उंची चाहरदीवारियों में आम आदमी का प्रवेश वर्जित रहता है। लेकिन, छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनसुईया उइके इससे इतर राजभवन की मिथकों को तोड़ते हुए आम आदमी के लिए राजभवन का द्वार खोलकर एक अलग नजीर पेश की है। दो साल के कार्यकाल में उनका एक साल कोरोना में गुजरा। इसके बावजूद राजभवन के रजिस्टर में राज्यपाल से मिलने वालों की संख्या 16 हजार को लांघ गई है। वाकई यह रिकार्ड होगा। बड़े राज्यों के राज्यपाल से पांच साल में इतने लोग नहीं पाते।

ब्यूरोक्रेसी की अग्निपरीक्षा

आईएएस, आईपीएस की सर्विस भले ही देश की सर्वोच्च सर्विस मानी जाती होगी मगर सेवाकाल में उन्हें कितना कंप्रोमाइज करना पड़ता है आप कल्पना नहीं कर सकते। आईएएस, आईपीएस की सर्विस उम्र के अनुसार आमतौर पर 30 से 32 साल की होती है। इनमें से करीब पांच साल तो निष्ठा साबित करने में निकल जाता है कि हम पिछली सरकार के आदमी नहीं हैं। पांच साल उस हिसाब से कैलकुलेट किया जाता है कि 30-32 साल में तीन-से-चार मुख्यमंत्री बदल जाते हैं। और जब भी सरकारें बदलती हैं, नौकरशाहों को फिर से वफादारी की परीक्षा पास करनी होती है। वैसे भी, दो-एक अपवादों को छोड़ दें ंतो 30 साल की सर्विस में किसी भी नौकरशाह की 10 साल की पोस्टिंग ही क्रीम होती हैं। 10 साल सामान्य रहता है और 10 साल बहुत बुरा। याने लूप लाईन। नौकरशाह इसे सूत्रवाक्य मानकर चलते हैं।

चिंतन में चिंता-1

भाजपा ने मिशन-2023 को लेकर बस्तर में तीन दिन का चिंतन शिविर किया। लेकिन, कारोबारी नेताओं को चिंतन शिविर से बाहर रखने का नतीजा यह हुआ कि मीडिया में चिंतन से ज्यादा विवादों को प्रमुखता मिल गया। समझा जाता है, पार्टी के शीर्ष नेताओं ने लोगों को मैसेज देने के लिए कारोबारी नेताओं को नजरअंदाज किया। गौरीशंकर अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत सरीखे नेताओं को चिंतन शिविर से किनारे कर दिया गया। बृजमोहन अग्रवाल चूकि विधायक हैं, इसलिए उन्हें आमंत्रित किया गया। बृजमोहन ने वैसे भी अपना कद ऐसा बना लिया है कि भले ही उन्हें कोई बड़ा दायित्व न सौंपा जाए, किंतु उन्हें किनारे भी नहीं किया जा सकता। उधर, मोर्चा, प्रकोष्ठों के प्रमुखों को भी बुलौवा नहीं भेजा गया। जाहिर है, पार्टी का ये रुखा व्यवहार उन्हें भी खटका होगा। रही-सही कसर आखिरी दिन पूरी हो गई, जब प्रदेश प्रभारी पुरंदेश्वरी की जुबां फिसल गई।

चिंतन में चिंता-2

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिछड़े वर्गों के ध्रुवीकरण की चिंता बीजेपी के चिंतन शिविर में भी दिखी। बताते हैं, चिंतन शिविर का ब्लू प्रिंट इस लाइन पर तैयार किया गया था कि पिछड़े वर्ग के ध्रुवीकरण से निबटने पार्टी को क्या करना चाहिए। और किस तरह कांग्रेस को पटखनी देते हुए सूबे में भाजपा की सत्ता फिर से स्थापित किया जाए। तीन दिन की मंथन में सार यही निकला कि पार्टी की कमान तेज और बोलने वाले ओबीसी नेता को सौंपा जाए। पार्टी के एक बड़े नेता का दावा है कि चिंतन में हुई चिंता का असर एकाध महीने के भीतर दिख जाएगा। संगठन में सिरे से बदलाव किया जाएगा। अजय चंद्राकर, विजय बघेल, अरुण साव और ओपी चौधरी में से कम-से-कम दो को बड़ा दायित्व मिल सकता है।

छत्तीसगढ़ में तीसरी पार्टी?

बीजेपी के चिंतन शिविर में इस बात पर भी बड़े नेताओं के बीच चर्चा हुई कि सूबे में तीसरी पार्टी अगर बनी तो पार्टी उससे कैसे निबटेगी। दरअसल, भाजपा को यइ चिंता इसलिए सता रही कि छत्तीसगढ़ में पिछड़े वर्ग की आबादी 50 फीसदी से अधिक है। इत्तेफाकन अगर तीसरी पार्टी का अभ्युदय हुआ तो जाहिर है, उससे वोटों का ध्रुवीकरण बदलेगा। छत्तीसगढ़ में वैसे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तीसरी पार्टी बनाई थी। लेकिन, उन्हें वो कामयाबी नहीं मिल पाई, जिनकी उन्हें उम्मीद थी। रही-सही कसर कांग्रेस की एकतरफा जीत ने खतम कर दी। वरना, उनकी और बसपा की सात सीटें निर्णायक हो सकती थी। जोगी से पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री वीसी शुक्ला ने 2003 के विस चुनाव में एनसीपी के साथ इसका प्रयोग किया था। तब सीट तो मात्र एक मिली मगर जोगी सरकार की विदाई में एनसीपी के सात फीसदी वोट अहम कारक बने। क्योंकि तब कांग्रेस से साढ़े तीन फीसद वोटों की बढ़त लेकर भाजपा ने सरकार बनाई थी। अगर सात प्रतिशत वोट वीसी शुक्ला शिफ्थ नहीं कराए होते तो भाजपा किसी भी सूरत में सरकार नहीं बना पाती। चिंतन शिविर में बंद कमरे में शीर्ष नेताओं के बीच इस पर भी गंभीर मंत्रणा हुई।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस भाजपा नेत्री से एक बड़े भाजपा नेता इन दिनों किसलिए बड़े घबराए और सहमे-सहमे से नजर आते हैं?
2. क्या यह सही है कि ट्रांसपोर्ट विभाग में ताकतवर अफसरों से ज्यादा एक ड्राईवर की चलती है?

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