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शरीफ कलेक्टर…पंगु नेतृत्व: बिलासपुर में 12 दिन में 338 लोगों की सांसें उखड़ गई, अपोलो अस्पताल बेड बढ़ाने तैयार नहीं, पत्रकार गणेश तिवारी भी चल बसे

बिलासपुर, 28 अप्रैल 2021। बिलासपुर में कोरोना से मौतों का खतरनाक आंकड़ा आ रहा… 12 दिन में यहां 338 लोगों की बेहतर इलाज के अभाव में सांसें टूट गई। ये सरकारी आंकड़ा है, जो प्रशासन अपने हिसाब से बता रहा। गैर सरकारी आंकड़े तो और भी अधिक होंगे।
हकीकत यह है कि बिलासपुर आज की तारीख में छत्तीसगढ़ का मेजर हॉटस्पॉट बन गया है। 3 लाख आबादी वाले शहर में 35 से 40 मौतें रोज हो रही हैं। फिर भी व्यवस्थाओं के नाम पर खाली डिब्बा ही है। सिम्स और संभागीय कोविड सेंटर के नाम से जाने जाने वाला जिला अस्पताल की क्या हालत है, बिलासपुर के लोगों से छिपा नहीं है। और जब सिम्स और जिला अस्पताल का ये हाल है तो फिर प्रशासन द्वारा तैयार किये गए टेम्पोरेरी आइसोलेशन सेंटरों का क्या हाल होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है।….. बेड 300 तो कोरोना के लिए 75 क्यों? अपोलो अस्पताल आखिर जिला प्रशासन का क्यों नहीं सुन रहा, कलेक्टर के बोलने पर सिर्फ 25 बेड बढ़ा…..

अपोलो अस्पताल को जरूर बिलासपुर के लिए वरदान माना जाता था, लेकिन वो भी इस संकट की घड़ी में बेड बढ़ाने को लेकर पता नहीं किन कारणों से वो कुछ ज्यादा जिद पर है।
सबको पता है, बिलासपुर के पत्रकार प्रदीप आर्य बेहतर इलाज के अभाव में चले गए। कांग्रेस नेता बसंत शर्मा को अपोलो में बेड मिलने में तीन दिन लग गए। दैनिक भास्कर के क्राइम रिपोर्टर चंद्रप्रकाश दुबे ने अपने बहनोई को अपोलो में बेड दिलाने के लिए आखिर किससे नहीं गिड़गिड़ाए। एक सीनियर पुलिस अधिकारी से मिन्नतें की। पुलिस अधिकारी ने एक छोटे अस्पताल में बेड दिलाया। तब तक लेट हो चुका था। न्यूज़ चैनल आईबीसी 24 के पत्रकार अनिल तिवारी अपने पिता को भर्ती कराने के लिए अपोलो अस्पताल में प्रयास किये। पर वही टका से जवाब मिला, बेड खाली नहीं है। अनिल के पिता भी नहीं रहे। नवभारत में लंबे समय तक सेवा देने वाले वरिष्ठ पत्रकार गणेश तिवारी की सांसें भी आज कोरोना से उखड़ गई। उनके परिजनों ने अपोलो में जाने की कोशिश की तो लोगों ने कहा, जब बसंत शर्मा को वहां टाइम पर बेड नहीं मिल पाया, तो फिर….पावर ग्रिड के मैनेजर संतोष पाण्डेय की अपोलो अस्पताल के गेट पर मौत हो गई। ये नाम उनके हैं, जिनकी किसी-न-किसी रूप में पहचान है। 12 दिन में बिलासपुर में 338 मौते हुईं है, उनमें से अधिकांश लोगों ने निश्चित तौर पर पहला प्रयास अपोलो में किया होगा। क्योंकि इलाज में गुणवत्ता के कारण लोगों का अपोलो पर एतबार है। लेकिन, अपोलो ने इस बार आम आदमी का भरोसा तोड़ा है। बेड बढ़ाने में संवेदना का परिचय नहीं दे रहा। अपोलो के पास फुल्ली ऑक्सीजन और ट्रेंड स्टाफ वाला 300 बेड हैं। जाहिर सी बात है, अपोलो अगर बेड बढ़ा दिया होता तो उम्दा चिकित्सा सुविधा मिलने से 338 परिवार उजड़ने से बच गए होते।….  कलेक्टर सारांश के बोलने पर आज 20 बेड बढ़ाया अपोलो ने, बेड बढ़ाने में बनिया की तरह कंजूसी कर रहा अपोलो प्रबंधन, राजनीतिक नेतृत्व की कमी अब लोगों को अखर रहा….      हैरत इस बात का है…कलेक्टर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट भी होता है। आपदा काल में कलेक्टरों को असीमित शक्तियां मिल जाती हैं। बावजूद इसके कलेक्टर डॉ. सारांश मित्तर के बोलने पर कल अपोलो ने कंजूसी की इन्तेहाँ कर दी। मात्र 20 बेड बढ़ाया। दरअसल, सारांश शरीफ कलेक्टर हैं। वरना, ये स्थिति नहीं होती।
रही बात जनप्रतिनिधियों की, तो ये कहने में कोई हिचक नहीं बिलासपुर का नेतृत्व दम तोड़ चुका है। वरना, सत्ताधारी पार्टी के नेता को अस्पताल में बेड मिलने में तीन लग जाये और कोई आवाज न उठे। असल में, बिलासपुर में पहले जैसे दमदार नेता रहे नहीं। अब के नेता ऐसे हैं कि उनका और उनके चंगु, मंगू का काम हो जाये। बाकी आम आदमी मर रहा तो उससे कोई वास्ता नहीं। ऐसे में क्या किया जा सकता है। अपोलो न जिला प्रशासन की सुन रहा और न मुफ्त में मिली जमीन और बिल्डिंग को देख बिलासपुर के लोगों के प्रति उसकी जमीर जाग रही। और नेता…उनको भूल जाइए। सब कुछ रामभरोसे है बिलासपुर में।

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