छत्तीसगढ़ के इस IAS की किस्मत तो देखिए, हाईपावर कमेटी के नौ बार बुलाने पर भी अपने को आदिवासी साबित नहीं कर पाए……फर्जी जाति के आरोपी अधिकारी को भारत सरकार ने IAS अवार्ड कर दिया…देखिए हाईपावर कमेटी की रिपोर्ट

रायपुर, 23 सितंबर 2020। वाकई किस्मत तो होती है…बीएल अग्रवाल 22 साल की उम्र में यूपीएससी क्लियर कर आईएएस सलेक्ट हो गए थे, वे नौकरी से फोर्सली रिटायर कर दिए गए और राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी आनंद मसीह को हाईपावर कमेटी ने नौकरी से बर्खास्त करने की सिफारिश की थी, उसे भारत सरकार से आईएएस अवार्ड हो गया।

आनंद मसीह 91 बैच के राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। उन पर फर्जी आदिवासी बनकर डिप्टी कलेक्टर की नौकरी हथियाने के गंभीर आरोप हैं। सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस पर बनी हाईपावर कमेटी ने अफसर की जाति की जांच की थी।
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 28 नवंबर 2005 से लेकर 11 दिसंबर 2006 तक नौ बार आनंद मसीह को कमेटी के सामने पेश होकर जाति साबित करने का मौका दिया गया। लेकिन, उन्होंने हर बार भिन्न-भिन्न कारण दर्शाते हुए आगे का डेट ले लिया।

आनंद मसीह ने जाति प्रमाण पत्र में चांपा का मूल निवासी होना बताया था। मगर जांजगीर एसपी की जांच में पता चला कि उनके उनके पिता यीशु प्रसाद मूलतः भाटापारा के रहने वाले थे। पीएससी में उन्होंने आदिवासी का लाभ लेने के लिए अपना सरनेम उरांव लिखा था। लेकिन, शासकीय प्राथमिक शाला चांपा के स्कूल दाखिले रजिस्टर क्रमांक 3858 में एक जुलाई 1970 को जाति की जगह ईसाई लिखा हुआ है। आनंद मसीह अपने को आदिवासी बताने के लिए हाईपावर कमेटी के सामने एक भी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाए।

जबकि, सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट फैसला है कि जाति प्रमाण पत्र के सत्यापन हेेतु वह व्यक्ति और उसके माता-पिता उसी जाति का होना चाहिए, जिसका वह दावा कर रहा है। और यह भी कि जाति को साबित करने का दायित्व भी उसी व्यक्ति का है, जो इसका लाभ लेना चाह रहा है।
हाईपावर कमेटी ने इस मामले में तीन सिफारिशें की थीं। पहला आनंद मसीह का उरांव अनुसूचित जनजाति का दिया गया जाति प्रमाण पत्र तत्काल निरस्त किया जाए, दूसरा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सरकार तत्काल आरोपी अधिकारी की नियुक्ति निरस्त करें और तीसरा कलेक्टर बिलासपुर को निर्देशित किया जाता है कि गलत जाति प्रमाण पत्र प्राप्तकर्ता और जारीकर्ता के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

इसके बाद आनंद मसीह को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। लेकिन, बाद में उन्होंने बिलासपुर हाईकोर्ट से स्टे लेकर फिर से नौकरी ज्वाईन कर ली। हाईकोर्ट से उनका स्टे अभी भी चल रहा है। और जैसा कि सरकारी अधिकारियों के मामले में होता है, सरकारी अमले का स्टे वैकेंट कराने की ओर ध्यान ही नहीं रहता। 2008 में उन्हें बर्खास्त किया गया था। और 12 साल से स्टे पर ही वे नौकरी करते रहे। भारत सरकार ने अब उन्हें आईएएस अवार्ड कर दिया है।

अब इसे किस्मत नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे…आदिवासी की हक मारकर डिप्टी कलेक्टर बनने के आरोपी अधिकारी देश की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित सेवा में रहने का मौका मिल जाए।
हालांकि, सामान्य प्रशासन विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि कोई मामला अगर कोर्ट में चल रहा है तो उसमें प्रमोशन नहीं रोका जा सकता…जब तक कोर्ट का फैसला नहीं आ जाए। अधिकारी की दलील ठीक है…नियम ऐसा होगा। लेकिन, 12 साल से मामला कोर्ट में है। अफसर के नौकरी करते 29 साल हो गए हैं…कुछ साल बाद वे रिटायर हो जाएंगे। फिर डिप्टी कलेक्टर की ट्राईबल सीट हड़पने के मामले में न्याय कैसे होगा।
देखिए, हाईपावर कमेटी की रिपोर्ट-

 

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