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No Contact Rule : डिजिटल युग में नया ट्रेंड : क्या है नो कॉन्टैक्ट सिचुएशन और क्यों आजकल के युवा रिश्तों में अपना रहे हैं यह रास्ता?

No Contact Rule : मोबाइल की रिंगटोन, व्हाट्सएप के नोटिफिकेशन और सोशल मीडिया के लाइक्स के बीच आज के रिश्तों में एक नया शब्द तेजी से गूंज रहा है— नो कॉन्टैक्ट

No Contact Rule : डिजिटल युग में नया ट्रेंड : क्या है नो कॉन्टैक्ट सिचुएशन और क्यों आजकल के युवा रिश्तों में अपना रहे हैं यह रास्ता?
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No Contact Rule : डिजिटल युग में नया ट्रेंड : क्या है नो कॉन्टैक्ट सिचुएशन और क्यों आजकल के युवा रिश्तों में अपना रहे हैं यह रास्ता?

By Uma Verma

No Contact Rule : डिजिटल डेस्क : मोबाइल की रिंगटोन, व्हाट्सएप के नोटिफिकेशन और सोशल मीडिया के लाइक्स के बीच आज के रिश्तों में एक नया शब्द तेजी से गूंज रहा है— नो कॉन्टैक्ट (No Contact)। कभी ब्रेकअप के बाद लोग धीरे-धीरे बातचीत कम करते थे, लेकिन अब यह एक सोची-समझी रणनीति बन चुकी है। आखिर क्या है यह नो कॉन्टैक्ट सिचुएशन और क्यों यह मानसिक स्वास्थ्य से लेकर रिश्तों के भविष्य तक को प्रभावित कर रही है?

No Contact Rule : क्या है नो कॉन्टैक्ट रूल'?

नो कॉन्टैक्ट का सीधा मतलब है अपने पूर्व पार्टनर (Ex) या किसी ऐसे व्यक्ति से पूरी तरह संपर्क तोड़ लेना, जिसके साथ आपका रिश्ता तनावपूर्ण रहा हो। इसमें न केवल फोन कॉल और मैसेज बंद किए जाते हैं, बल्कि सोशल मीडिया पर ब्लॉक करना, स्टोरीज न देखना और उनके दोस्तों से उनके बारे में बात न करना भी शामिल है। यह मौन आमतौर पर 30, 60 या 90 दिनों के लिए होता है।

क्यों बढ़ रहा है इसका चलन?

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, आजकल के युवा इस नियम को दो प्रमुख कारणों से अपना रहे हैं:

हीलिंग और सेल्फ-केयर: लगातार मैसेजिंग और सोशल मीडिया के कारण लोग पुराने रिश्तों की यादों से बाहर नहीं निकल पाते। नो कॉन्टैक्ट व्यक्ति को खुद पर ध्यान केंद्रित करने और भावनात्मक रूप से शांत होने का समय देता है।

सेल्फ-रिस्पेक्ट को बचाना : कई बार रिश्तों में पीछा करने या बार-बार मिन्नतें करने से आत्मसम्मान कम हो जाता है। ऐसे में चुप हो जाना अपनी वैल्यू (Value) वापस पाने का एक तरीका माना जाता है।

टॉक्सिक रिश्तों से आजादी : अगर रिश्ता मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाला रहा हो, तो पूरी तरह संपर्क काटना ही बचने का इकलौता रास्ता बचता है।

सोशल मीडिया का दबाव और घोस्टिंग का डर

आज के दौर में किसी को भूलना सबसे मुश्किल काम है क्योंकि डिजिटल पदचिह्न (Digital Footprints) हर जगह मौजूद हैं। जब कोई व्यक्ति अचानक नो कॉन्टैक्ट पर जाता है, तो दूसरे पक्ष के लिए यह कभी-कभी घोस्टिंग (बिना बताए गायब हो जाना) जैसा महसूस हो सकता है। इससे भ्रम और मानसिक तनाव की स्थिति पैदा होती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि नो कॉन्टैक्ट और घोस्टिंग में बारीक अंतर है—नो कॉन्टैक्ट अपनी बेहतरी के लिए लिया गया फैसला है, जबकि घोस्टिंग जिम्मेदारी से भागना है।

क्या इससे टूटा हुआ रिश्ता जुड़ता है?

इंटरनेट पर ऐसे हजारों वीडियो और लेख हैं जो दावा करते हैं कि नो कॉन्टैक्ट अपनाने से पार्टनर वापस आ जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस नियम का प्राथमिक उद्देश्य खुद को ठीक करना होना चाहिए, न कि सामने वाले को मेनिपुलेट करना। यदि सामने वाला व्यक्ति वापस आता भी है, तो क्या रिश्ता पहले जैसा स्वस्थ रहेगा? यह एक बड़ा सवाल है।

विशेषज्ञों की राय: मौन कब खतरनाक और कब वरदान?

प्रसिद्ध रिलेशनशिप काउंसलर्स का कहना है कि दूरी कभी-कभी स्पष्टता लाती है। जब आप शोर-शराबे और इमोशनल ड्रामे से दूर होते हैं, तभी आप ठंडे दिमाग से सोच पाते हैं कि वह रिश्ता आपके लिए सही था या नहीं। लेकिन, यदि इसका उपयोग केवल सामने वाले को सजा देने या उसे तड़पाने के लिए किया जा रहा है, तो यह रिश्ते की नींव को और कमजोर कर देता है।

नो कॉन्टैक्ट सिचुएशन आज के आधुनिक समाज की एक हकीकत बन गई है। यह दर्शाता है कि अब लोग अपने मानसिक सुकून (Peace of Mind) को किसी भी अस्थिर रिश्ते से ऊपर रख रहे हैं। डिजिटल शोर के इस दौर में, कभी-कभी 'खामोशी' ही सबसे प्रभावी उत्तर साबित होती है।

Uma Verma

Uma Verma is a postgraduate media professional holding MA, PGDCA, and MSc IT degrees from PTRSU. She has gained newsroom experience with prominent media organizations including Dabang Duniya Press, Channel India, Jandhara, and Asian News. Currently she is working with NPG News as acontent writer.

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