राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने शुरु किया एक दिवसीय उपवास.. राष्ट्रपति कोविंद को लिखे पत्र में कहा- “..मेरे जैसे मामूली गाँव और सामान्य पृष्ठभूमि से निकले इंसान आयेंगे और जायेंगे…

नई दिल्ली,22 सितंबर 2020। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह संसद परिसर में धरने पर बैठे उन सांसदों के लिए सुबह की चाय लेकर पहुँचे जिन्हे सदन में अमर्यादित अशालीन व्यवहार के लिए पूरे सत्र से निकाल दिया गया है। सत्र भर के लिए निकाले गए इन सांसदों ने सदन में अमर्यादित अशालीन व्यवहार जिस शख़्स के साथ किया वे वही हरिवंश नारायण सिंह हैं जो कि सुबह की चाय लेकर पहुँचे थे। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने इसके ठीक पहले भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को संवेदनाओं और तथ्यों से भरपूर पत्र लिखकर सूचित किया है कि वे एक दिवसीय उपवास कर रहे हैं ताकि ऐसे सांसदों के अंदर आत्मशुद्धि का भाव जागृत हो।
उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह का यह पत्र तीन पन्नो का है। हरिवंश प्रसाद ने हालाँकि इसे इतनी गहराई से लिखा है कि पूरा पत्र पढे बग़ैर उसे छोड़ा नहीं जा सकता। उपसभापति हरिवंश नारायण ख्याति लब्ध प्रभात खबर के प्रधान संपादक रहे हैं, वे उसके पहले बैंक में भी सेवा दे चुके थे।
हरिवंश नारायण सिंह अपने पत्र में लिखते हैं –
“..राज्यसभा में जो कुछ हुआ उससे पिछले दो दिनों से गहरी आत्मपीड़ा आत्मतनाव और मानसिक वेदना में हूँ, मैं पूरी रात सो नहीं पाया..जेपी के गाँव में सिर्फ पैदा नहीं हुआ उनके परिवार और हम गाली वालों के बीच पीढ़ियों का रिश्ता रहा, गांधी जेपी लोहिया और कर्पूरी ठाकुर जैसे लोगों के सार्वजनिक जीवन ने मुझे हमेशा प्रेरित किया..”

हरिवंश ने आगे लिखा –
“सदन और आसन की मर्यादा को अकल्पनीय क्षति पहुँची है.माननीय सदस्यों द्वारा लोकतंत्र के नाम पर हिंसक व्यवहार हुआ, आसन पर बैठे व्यक्ति को भयभीत करने की कोशिशें हुई , उच्च सदन की हर मर्यादा और व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ायी गयीं।सदन में माननीय सदस्यों ने नियम पुस्तिका फाड़ी,मेरे उपर फेंका.सदन के जिस ऐतिहासिक टेबल पर बैठकर सदन के अधिकारी सदन की महान परंपराओं को शुरु से आगे बढ़ाने में मूक नायक की भुमिका अदा करते रहे हैं.उनकी टेबल पर चढ़कर सदन के महत्वपूर्ण काग़ज़ात दस्तावेज को पलटने फेंकने व फाड़ने की घटनाएँ हुई हैं. नीचे से काग़ज़ को रोल बनाकर आसन पर फेंके गए.नितांत आक्रामक व्यवहार भद्दे और असंसदीय नारे लगाए गए,ह्रदय और मानस को बेचैन करने वाला लोकतंत्र के चीरहरण का दृश्य पूरी रात मस्तिष्क पर छाया रहा”

उपसभापति पत्र में लिखते हैं
“स्वभावत: अंतर्मुखी हूँ,गाँव का आदमी हूँ, मुझे साहित्य संवेदना और मूल्यों ने गढ़ा है.. सर मुझसे गलतियां हो सकती हैं,पर मुझमें इतना नैतिक साहस है कि सार्वजनिक जीवन में खुले रुप से गलतियां स्वीकार करुं…”

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कार्यकाल में उनके सलाहकार रह चुके और धर्मवीर भारती और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों के लिए श्रद्धा प्रतीक सुरेंद्र प्रताप सिंह (एसपी) के साथ काम कर चुके जनता दल यू से राज्यसभा पहुँचे थे। हरिवंश नारायण सिंह के पत्र का यह अंश उनकी वेदना को बेहद क़रीब से अभिव्यक्त करता है, वे लिखते हैं
“..मुझे महाभारत का यक्ष प्रश्न का एक अंश हमेशा याद रहता है, यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा, जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि, हम रोज़ कंधों पर शव लेकर श्मशान जाते हैं, पर हम कभी नहीं सोचते हैं कि अंतत: जीवन की यही नियति है.मेरे जैसे मामूली गाँव और सामान्य पृष्ठभूमि से निकले इंसान आयेंगे और जायेंगे. समय और काल के संदर्भ में उनकी न कोई स्मृति होगी न गणना, पर लोकतंत्र का यह मंदिर ‘सदन’ हमेशा समाज और देश के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा.अंधेरे में रोशनी दिखाने वाला लाईट हाउस बनकर ही संस्थाएँ ही देश और समाज की नियति तय करती हैं.इसलिए राज्यसभा और राज्यसभा का उपसभापति का रंग ज़्यादा महत्वपूर्ण और गरिमामय है, मैं नहीं. इस तरह मैं मानता हूँ कि मेरा निजी कोई महत्व नहीं है, पर इस पद का है.मैने जीवन में गांधी के साधन और साध्य से हमेशा प्रेरणा पाई है”

अपनी गंवई पृष्ठभूमि खुले मैदान में पेड़ के नीचे लगते स्कुल से शिक्षा गंगा और सरयू के बीच बसे गाँव से मिले संस्कार संयमित और उदार व्यवहार का संदर्भ देते हुए हरिवंश ने लिखा
“गांधी लोहिया जेपी कर्पूरी ठाकुर चंद्रशेखर जैसे लोगों के विचारों ने मुझे मूल्य और संस्कार दिये.उनकी ही हत्या मेरे सामने उच्च सदन में हुई”

उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने सदन के भीतर अपमानजनक व्यवहार का ज़िक्र करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को जानकारी दी है कि वे आज एक दिन का उपवास कर रहे हैं ताकि ऐसे आचरण करने वालों के भीतर आत्मशुद्धि का भाव जागृत हो। हरिवंश नारायण सिंह ने अपने पत्र का समापन राष्ट्रकवि कहे गए रामधारी सिंह दिनकर की कविता के इस अंश से की है
“वैशाली!जन का प्रतिपालक, गण का आदि विधाता..जिसे ढूँढता देश आज प्रजातंत्र की माता।
रुको, एक क्षण पथिक!यहां मिट्टी को शीश नवाओ.. राजसिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ..।

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