नीतीश कुमार की जगह निशांत कुमार बनेंगे एलएलसी? पत्नी मंजू सिन्हा ने Nitish को पहली बार चुनाव लड़ने के लिए मनाया था
Bihar Political News : सीएम नीतीश कुमार ने आज विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। इसके साथ ही बेटे निशांत कुमार और जदयू के लिए नई चुनौती खड़ी हो गई है।

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Bihar CM News : बिहार के सीएम नीतीश कुमार के पैतृक गांव कल्याण बिगहा से मुख्यमंत्री निवास 1, अणे मार्ग की दूरी 70 किलोमीटर ही है। मगर, नीतीश कुमार को यह दूरी तय करने में 25 साल से ज्यादा लगे थे। एक बार जब वह वहां पहुंच गए तो फिर हिले नहीं। 19 साल सीएम रहे। अब वह फिर दिल्ली का रुख किए हैं। नीतीश ने आज ही बिहार विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दिया है। इसके साथ वह नए राजनीतिक पड़ाव के और करीब पहुंच गए।
नीतीश कुमार की जगह निशांत जाएंगे विधान परिषद?
नीतीश कुमार की यह यात्रा उनके सियासी सफर के सम्मानजनक अंत की शुरुआत है। साथ ही उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीतिक यात्रा शुरू हो गई है। माना जा रहा कि विधान परिषद में नीतीश की खाली हुई सीट निशांत कुमार भरेंगे।
अपने बूते कितनी लंबी यात्रा कर पाएंगे निशांत कुमार
पिता से अलग निशांत बिना सियासी अनुभव के इस सफर पर निकले हैं। उनका अब तक का जैसा जीवन दुनिया के सामने आया है, उससे यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि वह अपने बूते कितनी लंबी और कैसी राजनीतिक यात्रा कर पाएंगे। उन्हें इसके लिए तैयार करने की कोशिश शुरू है। कई नेता निशांत को कोचिंग दे रहे हैं, ताकि वह जनता को पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने और बढ़ाने का भरोसा दिला सकें।
पत्नी ने नीतीश को चुनावी राजनीति के लिए मनाया था
निशांत की जो छवि मीडिया के माध्यम से अब तक सामने आई है, उसे देखते हुए कई लोग उन्हें राजनीति के लिए मिसफिट बताते हैं। नीतीश भी खुद को राजनीति के लिए मिसफिट मानते थे। शुरुआत में उनके मन में चुनावी राजनीति नहीं करने का ख्याल आया था। मगर, पत्नी मंजू सिन्हा ने समझाया कि चुनाव नहीं लड़ना तो फिर राजनीति करने का मतलब क्या? नीतीश दो बार विधानसभा चुनाव लड़े हार गए। 1980 में दूसरी हार के बाद नीतीश छोटा बिजनेस करने की सोच चुके थे। उनके साथी मुन्ना सरकार ने बताया कि कुछ समय के लिए उन्होंने गुमनाम तरीके से पीयरलेस इंश्योरेंस में पैसा लगाना शुरू किया था। मगर, पत्नी और मां परमेश्वरी देवी को उन पर भरोसा था। तभी मां उन्हें अपने पेंशन से पैसे बचा कर बेटे को चुनाव लड़ने को देती रहीं। अंततः कामयाबी मिली।
निशांत कुमार रहते आ रहे चर्चा से दूर
निशांत के बारे में भी अभी कोई नतीजा नहीं निकाला जा सकता। हां, जरूर है कि वह अब तक लाइमलाइट के बिना अपने हिसाब से जिंदगी जी रहे हैं। कार्यक्रमों में पहुंचकर भी मीडिया से बच कर रहाते हैं। एक बार मां की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने कल्याण बिगहा गए। 20 मिनट रहे। गांव वालों से हाथ मिलाया, थोड़ी बातचीत की, लेकिन मीडिया वालों से बात किए बिना लौट गए।
शुरू से राजनीति में रमे थे नीतीश कुमार
नीतीश कुमार की शुरू से राजनीति में दिलचस्पी थी। वह कॉलेज के जमाने में राजनीति में आए थे। छात्र आंदोलन से निकले नेता हैं। उनके मामले में यह भी था कि कई दोस्त और करीबी राजनीति में सक्रिय थे। बख्तियारपुर का उनका पड़ोसी मुन्ना सरकार उन्हें स्कूटर पर पीछे बिठा कर घुमाया करते थे। दोनों साथ-साथ राजनीतिक कार्यक्रमों और अभियानों में जाते थे। 1980 के दशक में दोनों ऐसे ही एक कार्यक्रम में रहुई (हरनौत) गए थे। शाम हो गई तो अंधेरे के कारण स्कूटर को गांव में छोड़ना पड़ा। तब दोनों जीप में पीछे लटक कर घर गए थे। नीतीश के उभार में 1994 में हुई कुर्मी चेतना रैली का बड़ा रोल रहा। वैसे इस रैली के पीछे उनकी कोई सक्रिय भूमिका नहीं थी, यह उनका आइडिया भी था। इसके पीछे जिस कुर्मी नेता सतीश कुमार की भूमिका थी, वह इसका फायदा नहीं उठा सके। मगर, रैली से नीतीश को अलग पहचान मिल गई।
उप मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा
निशांत बिना ठोस होमवर्क किए मैदान में उतरे या उतारे गए हैं। उन्हें JDU और राज्य सरकार में क्या भूमिका दी जाती है, उस बारे में कुछ सार्वजनिक नहीं है। चर्चा है कि उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। उनके कुछ हितैषी इसे सही संकेत नहीं मानते हैं। उन्हें डर है कि जिस तरह हाल में नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर उनकी नकारात्मक छवि गढ़ी गई, उसी तरह निशांत की अनुभवहीनता को लेकर उनकी नकारात्मक छवि न बना दी जाए। ऐसा हुआ तो निशांत लॉंच होने से पहले ही फेल हो सकते हैं। ऐसे में जदयू भी कमजोर हुए बिना नहीं रह पाएगी।
