ओह भाजपा.. आह भाजपा! विधानसभा के बाद नगरीय निकाय भी चित्त.. ना चिंतन ना चिंता.. ‘भात पर बात’ कार्यक्रम भी धूल धूसरित.. ना भात ना बात..

रायपुर,13 जनवरी 2019। आख़िरकार वह हुआ जो कि आँकड़ों की तरीक़े से बाज़ीगरी कर जाते तो कतई ना होना था। विधानसभा में आँधी की तरह जा उड़ी भाजपा पंद्रह बरस बाद 15 सीट पर सिमट गई, लोकसभा की नैया ‘मोदी की आंधी’ ने पार लगा दी। उप चुनाव में जीती गई सीट भाजपा गँवा बैठी,खबरनवीस बताते हैं कि, आख़िरी दो दिन में खेल ‘मैनेजमेंट’ में बिगड़ गया। पंद्रह बरस सत्ता में रही भाजपा बिलकुल ग़रीबी रेखा के नीचे जा पहुँची। नगरीय निकाय में तो यह बेहद साफ़ नुमाया हुआ कि, ‘अर्थ बग़ैर सब व्यर्थ’ है। नगरीय निकाय में कोरबा बिलासपुर समेत पाँच निकाय ऐसे थे जहां भाजपा की ठोस क़वायद उसे नगरीय निकाय में दस के मुक़ाबिल शून्य के आंकड़े की जगह पाँच बँटे पाँच पर ले आती लेकिन ऐसा हुआ नही। आज की सियासत में समर्पित कार्यकर्ता के साथ ‘पोटली बाबा की’ के महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। 6 नगरीय निकाय में मेयर कौन इसकी कुंजी निर्दलीयों के हाथ थी, और ज़ाहिर है ‘मैनेजमेंट’ में कांग्रेस सफल रही। उस कोरबा में भी जहां भाजपा सबसे बड़े दल के रुप में उभरी थी। महंत के इस गढ़ में कांग्रेस को समर्थन उस छजका ने कर दिया जिसे कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व भाजपा की बी टीम कहता है।

इन सब पर कोई चिंता तो छोड़िए चिंतन तक नज़र नहीं आता। पंद्रह बरस की सत्ता के बाद पंद्रह सीटों पर सिमटी भाजपा का संगठन भी अब तक अर्धमूर्छा से जाग उठता नहीं दिखता। अब सामने पंचायत चुनाव हैं, और पंद्रह बरस बाद कांग्रेस सरकार की वापसी की सबसे अहम वजह यदि कोई वर्ग था तो वह था किसान।
धान ख़रीदी को लेकर सरकारी भले किसानोन्मुखी होने का दावा करती हो लेकिन हकीकतन कई दर्जन निर्देशों के बावजूद किसान हलाकान परेशान हैं। रामानुजगंज के तेज तर्रार विधायक बृहस्पति सिंह तो खुली नाराजगी मीडिया पर ज़ाहिर कर चुके हैं। लेकिन हालात में सुधार नहीं है।
अवस्थित धान ख़रीदी प्रक्रिया जिसकी वजह मैदानी अमले को बताने की क़वायद होती है, और कुछेक जगहों पर कड़ी कार्यवाही भी हुई है जैसे कि सरगुजा में सीधे बर्खास्त किया गया। किसानों का ग़ुस्सा थम नहीं रहा है, क्योंकि सरकार की क़वायद उन्हें राहत नहीं दे पा रही है।
इस ग़ुस्से के बीच पंचायत चुनाव होने हैं,लेकिन कांग्रेस को शायद ज़्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि नाराज़गी चाहे जैसी हो, आंकलन तो परिणामों से होना है कि आख़िरकार ज़िला और जनपद में किस दल के समर्थित चेहरे को अध्यक्ष उपाध्यक्ष पद पर क़ाबिज़ पाया जाता है। और उपचुनाव के बाद नगरीय निकाय के नतीजों ने बताया कि कांग्रेस ने निर्दलीयों को साध कर ही सही पर नतीजे के रुप में दस बँटे शून्य के साथ क्लीन स्वीप कर दिया है।
इधर भाजपा पर सन्निपात का असर ही ख़त्म नहीं हो रहा है,बीते दस जनवरी को तेज तर्रार वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर ने ऐलान किया

“धान के मसले पर किसान परेशान हलाकान है, हम इस पर किसानों के बीच जाएंगे और ‘भात पर बात’ करेंगे”

छेरछेरा पर्व से इसकी शुरुआत होनी थी।यह एक ऐसा संवाद होता जिसका असर पंचायत चुनाव पर पड़ता ही। लेकिन हुआ क्या, हुआ यह कि अजय चंद्राकर यह ऐलान कर के चले गए, और प्रदेश कार्यालय इस ऐलान के दो दिन बाद तक यह बता पाने की स्थिति में नहीं है कि, किस तारीख़ को किस जगह कितने बजे कार्यक्रम आयोजित होगा।
यह कार्यक्रम यदि तरीक़े से योजनाबद्ध रुप से होता तो किसान और ग्रामीणों तक भाजपा पहुँचती और ज़ाहिर है तमाम मुद्दों पर असफलता के आरोप पर ग्रामीण मतदाता का मानस बदलने की क़वायद के साथ धान ख़रीदी मुद्दे पर हलाकान परेशान किसान के सामने ‘मददगार’ के रुप में सामने आ जाती, स्वाभाविक रुप से इसका फ़ायदा त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में मिलता, लेकिन फिर वही ढाँक के तीन पात का आलम है।
यदि यह नजारा उस गुटबाज़ी का परिणाम है जिसे हमेशा भाजपा नकारते रही है लेकिन वह छुपाए नहीं छूप रहा है तो बूथ लेव्हल पर भाजपा के कार्यकर्ता के लिए क्या ही संदेश पहुँच रहा है और वह किस कदर किंकर्तव्यविमूढ़ है, उसे समझना मुश्किल नहीं है।
लिखने की हालाँकि जरुरत नहीं है, पर यह आलम मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और समूची कांग्रेस के लिए राहत भरा तो है ही, वह भी गहरी मुस्कुराहट के साथ।

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