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सत्ता का नया केंद्रः जय सिंह अग्रवाल के प्रभारी मंत्री बनने से बिलासपुर में पावर का एक और केंद्र बनेगा? सिंहदेव, महंत समर्थक असहज क्यों महसूस कर रहे राजनीति के इस नए समीकरण से?

सत्ता का नया केंद्रः जय सिंह अग्रवाल के प्रभारी मंत्री बनने से बिलासपुर में पावर का एक और केंद्र बनेगा? सिंहदेव, महंत समर्थक असहज क्यों महसूस कर रहे राजनीति के इस नए समीकरण से?
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By NPG News

NPG.NEWS
बिलासपुर, 25 जून 2021। प्रभारी मंत्री बनने के बाद पहली बार बिलासपुर पहुुंचने पर आज जयसिंह अग्रवाल का शहर में आतिशी स्वागत हुआ। कोरोना प्रोटोकाॅल को किनारे करते हुए चैक-चैराहों पर जयसिंह को माला पहनाने कार्यकर्ताओं में होड़ लग गई। प्रभारी मंत्री का जिस तरह शहर में स्वागत हुआ, उसे देखकर दीवारों पर लिखी इबारत लोगों को समझ में आ गई…आगे चलकर शहर की राजनीति किस तरफ करवट लेगी।
बिलासपुर शहर अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से राजनीतिक तौर पर बेहद संवेदनशील रहा है। यहां बीआर यादव जैसे कद्दावर मंत्री रहे हैं, जिनकी मुख्यमंत्री की दावेदारी खतम करने के लिए बड़ी चतुराई के साथ किनारे लगाया गया था। अविभाजित बिलासपुर जिले के चरणदास महंत को किस तरह जांजजीर से लोकसभा चुनाव लड़ाकर दिल्ली भेज दिया गया, पुराने लोग इसे भूले नहीं होंगे। महंत को तब लोकसभा की टिकिट दे दी गई, जब वे मध्यप्रदेश की राजनीति में काफी ताकतवर हो गए थे। इसके बाद अजीत जोगी जब मुख्यमंत्री बने तो बिलासपुर का राजनीतिक वजन काफी बढ़ा। जोगी के समय बिलासपुर में विकास के काफी काम भी हुए। लेकिन, तीन साल बाद कांग्रेस की सत्ता जाने के बाद बिलासपुर का सियासी वजूद फिर गौण हो गया।
बीजेपी में हालांकि अमर अग्रवाल प्रभावशाली नेता रहे… सिस्टम पर उनकी पकड़ भी अच्छी रही। लेकिन, पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उन्हें भी हांसिये पर करने की कोई कमी नहीं की। अरपा प्रोजक्ट को अमर के लाख प्रयास के बाद भी मूर्त रूप नहीं लेेने दिया गया। यहां तक कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भी उन्हें निबटाने में पार्टी के कुछ नेताओं ने खास रुचि ली थी, ये बात किसी से छिपी नहीं है। कुल मिलाकर बिलासपुर के नेताओं को सदैव किनारे लगाने का प्रयास किया गया…भले ही सरकार किसी भी पार्टी की रही।
2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद यह पहला मौका था, जब बिलासपुर जिले को मंत्री पद से मरहूम होना पड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि बिलासपुर में कांग्रेस की राजनीति कई गुटों में बंट गई। एक गुट मुख्यमंत्री के नजदीकी लोगों का है। दूसरा गुट टीएस सिंहदेव का है। और तीसरा स्पीकर चरणदास महंत का। हालांकि, महंत का गुट कहना उपयुक्त नहीं होगा। उन्हें समर्थक कह सकते हैं। दरअसल, महंत बिलासपुर के समर्थकों को लेकर अब उतने संजीदा नहीं है। फिर भी बिलासपुर में उनके लोग हैं।
सियासी प्र्रेक्षक भी मानते हैं कि जय सिंह अग्रवाल के प्रभारी मंत्री बनने बनने से बिलासपुर की राजनीति बदलेगी। जय सिंह की राजनीति करने की जो स्टाईल है, जाहिर तौर पर उससे उनका अपना एक वर्ग तैयार होगा, जो टीएस सिंहदेव और चरणदास महंत से अलग होगा। बिलासपुर की राजनीति में सिंहदेव गुट अपना ठीकठाक पोजिशन बनाया हुआ है। खासकर, सिंहदेव के पास जो विभाग है, मसलन हेल्थ और पंचायत विभाग के फेसलों में इसकी झलक साफ दिखती है। सिम्स में आईएएस को ओएसडी बनाने के लिए एक गुट ने आखिर क्या नहीं किया, लेकिन सिंहदेव खेमा कलेक्टर के आदेश को आसानी से रोकवा दिया। आखिरकार, ओएसडी का मामला टाय-टाय फुस्स हो गया।
उधर, जय सिंह अग्रवाल यंग्रीमैन वाली राजनीति करते हैं। कोरबा बिलासपुर से ज्यादा दूर नहीं है, लिहाजा उनकी कार्यशैली से यहां के लोग नावाकिफ नहीं होंगे। अफसर उनके तेवर से घबराते हैं और राजनीति की बात करें तो भाजपा की सरकार होने के बाद भी वे कोरबा से लगातार चुनाव जीतते रहे। वैसे भी, बिलासपुर का प्रभारी मंत्री बनाने के पीछे निश्चित तौर पर खास रणनीति होगी। बिलासपुर जिले में विधानसभा की छह सीटें हैं, उनमें से चार भाजपा के पास है। कांग्रेस के सिर्फ दो विधायक हैं। शैलेष पाण्डेय और रश्मि सिंह। जय सिंह की कई सारी राजनीतिक एजेंडा के साथ एक अहम एजेंडा यह भी होगा कि अगले चुनाव में पार्टी की सीटें बढ़ाई जाए। इसके लिए बिलासपुर में अपनी टीम तैयार करने की कोशिश करेंगे। वो जयसिंह टीम होगी। ऐसे में, बाकी खेमों की चिंता समझी जा सकती है।

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