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नवरात्रि विशेष: माता का ऐसा मंदिर जहां सोने-चांदी नहीं, बल्कि पत्थर चढ़ाते हैं भक्त, हर मनोकामना पूरी करती हैं माता

बिलासपुर, 12 अक्टूबर 2021। नवरात्रि के पावन पर्व पर देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। छत्तीसगढ़ में सुदूर जंगल और पहाड़ पर अलग-अलग रूपों में देवी विराजमान हैं, जहां भक्त अपनी मनोकामना लेकर पूजा करते हैं। दान करते हैं। आपने ऐसे भक्तों के बारे में सुना होगा, जो सोने-चांदी के मुकुट-गहने चढ़ाते […]

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नवरात्रि विशेष: माता का ऐसा मंदिर जहां सोने-चांदी नहीं, बल्कि पत्थर चढ़ाते हैं भक्त, हर मनोकामना पूरी करती हैं माता
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बिलासपुर, 12 अक्टूबर 2021। नवरात्रि के पावन पर्व पर देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। छत्तीसगढ़ में सुदूर जंगल और पहाड़ पर अलग-अलग रूपों में देवी विराजमान हैं, जहां भक्त अपनी मनोकामना लेकर पूजा करते हैं। दान करते हैं। आपने ऐसे भक्तों के बारे में सुना होगा, जो सोने-चांदी के मुकुट-गहने चढ़ाते हैं, लेकिन कभी यह नहीं सुना होगा कि जहां माता सोने-चांदी नहीं, बल्कि 5 पत्थर के चढ़ावे से ही प्रसन्न होकर भक्तों के मन की मुरादें पूरी करती हैं। देवी का अद्भुत मंदिर बिलासपुर में स्थित है, जहां माता 100 साल पहले परसा (पलाश) के पेड़ के नीचे प्रकट हुईं। माता का आशीर्वाद और भक्तों की आस्था ही है कि बिना किसी सरकारी मदद के अब भव्य मंदिर बना है। बिलासपुर के अरपापार सरकंडा क्षेत्र में खमतराई ग्राम पंचायत (जो कि वर्तमान में नगर निगम में शामिल हो चुका है) में खमतराई रोड पर ड़ीएलएस कालेज के पीछे वनदेवी का मंदिर स्थित है। मन्दिर श्रद्धालुओं में बगदायी देवी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

कैसे हुआ देवी का प्राकट्य:

मन्दिर के मुख्य पुजारी अश्वनी तिवारी ने बताया कि 100 साल से भी अधिक समय पहले खमतराई गांव के ही एक बुजुर्ग को देवी मां ने सपने में आकर उक्त जगह में परसा पेड़ के नीचे विराजित होने का स्वप्न दिया था। दूसरे दिन बुजुर्ग के द्वारा उक्त जगह जा कर तफ्तीश करने पर स्वप्न सही निकला और उसे देवी मां के दर्शन हुए। तब से उस परसा पेड़ के नीचे चबूतरा बना कर देवी की प्रतिमा को स्थापित कर आसपास के ग्रामीणों द्वारा देवी की पूजा की जाने लगी।
100 साल पहले अंग्रेजों के शासनकाल में इस क्षेत्र में झाड़ के घने जंगल हुआ करते थे और यहां से एक धरसा (पगडंडी) रास्ता पैदल चलने का हुआ करता था। उस रास्ते का उपयोग कर दूसरे छोर पर बसे गांव के लोग अपनी आजीविका चलाने व विभिन्न कामों के लिए परसा के जंगल को पार करके बिलासपुर शहर आना-जाना करते थे। जंगल में उस समय जंगली जानवरों का भय भी बना हुआ रहता था। गांव से आने वाले ग्रामीणों के द्वारा आने-जाने के समय देवी मां से जंगली जानवरों व डकैतों से सुरक्षा की विनती करते हुए चमारगोटा (नदी में पाए जाने वाला चमकीला पत्थर) के 5 पत्थर चढ़ा दिया करते थे। देवी मां प्रसन्न होकर राहगीरों की रक्षा भी किया करतीं थीं। इसके बाद लोग अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए भी पत्थर चढ़ाने की मनौती मानने लगे। मनौती पूरा होने पर पत्थर चढ़ाने भी आने लगे और इस तरह देवी मां की महिमा दूर-दूर तक फैल गई।

बिना किसी सरकारी मदद के जन सहयोग से बना भव्य मंदिर, 34 सेवादार बिना वेतन देते हैं सेवा

मन्दिर की महिमा बढ़ने व भक्तों की संख्या बढ़ने पर आसपास रहने वाले ग्रामीणों ने आपस में राशि एकत्रित कर कई वर्षों पहले मंदिर निर्माण कार्य शुरू किया। कई वर्षों तक थोड़ा थोड़ा निर्माण कार्य चलने के बाद आज मंदिर ने भव्य रूप ले लिया है। मंदिर परिसर में वनदेवी की प्राकट्य मूर्ति के अलावा बगदायी देवी की अलग से मूर्ति स्थापित की गई हैं। इसके अलावा संकटमोचन हनुमान का मंदिर भी बनवाया गया है।शनि भक्तों के लिए शनि देव की मूर्ति मन्दिर के आंगन में स्थापित है, जिसमें शनि भक्त हर शनिवार तेल चढ़ाते हैं। मन्दिर परिसर में ही 12 ज्योतिर्लिंग मन्दिर स्थित हैं, जहां 12 ज्योतिर्लिंगों के प्रतीक स्वरूप 12 शिवलिंग की प्रतिमा अलग अलग रखी गई हैं। श्री राधा कृष्ण मंदिर,बपंचमुखी हनुमान मंदिर, रामदरबार भी स्थित हैं। मन्दिर में हरियाली लाने हेतु कई वृक्ष भी लगाए गए हैं। खास बात यह हैं कि इतने भव्य मंदिर को बनवाने में कोई सरकारी सहायता या किसी संस्थान का सहयोग नहीं मिला है। आसपास ग्रामीणों की बस्ती हैं, जिनकी माता के प्रति श्रद्धा व माता का चमत्कार ही हैं, जो बिना किसी बाहरी मदद के ग्रामीणों ने भव्य मंदिर का निर्माण करवा लिया। मन्दिर परिसर में सेवा देने के लिए 34 स्वयंसेवक भी हैं, जो बिना किसी वेतन के माता की सेवा में लगें हैं।

नवरात्रि में प्रज्ज्वलित होती हैं ज्योतिकलश, जवारा भी बोया जाता है
मंदिर में क्वांर (शारदीय) नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि में जवारा बो कर ज्योति कलश भी प्रज्वलित किया जाता है। मंदिर में अलग से दो ज्योतिबकलश कक्ष निर्मित किए गए हैं। इस वर्ष भक्तों ने 450 तेल ज्योति व 24 घृत ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करवाएं हैं। हर वर्ष इनकी संख्या लगभग दोगुनी होती हैं पर इस वर्ष कोरोना की वजह से संख्या आधी ही रह गई है।

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