सबरीमाला विवाद: 'नॉनवेज और शराब' की मिसाल देकर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी? जानिए क्या है पूरा मामला?

Sabarimala Case: केरल के मशहूर सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Temple) में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक बार फिर तीखी बहस हुई। केंद्र सरकार ने मंदिर की पुरानी परंपराओं का मजबूती से बचाव करते हुए कोर्ट को धार्मिक मामलों में दखल न देने की सलाह दी है। सरकार की ओर से पेश हुए अडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) नटराज ने तर्क दिया कि धार्मिक परंपराओं को संवैधानिक या महिला-पुरुष अधिकारों के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
'कोई कहेगा मुझे तो नॉनवेज लेकर मंदिर जाना है'
सुनवाई के दौरान ASG नटराज ने एक बेहद दिलचस्प तर्क पेश किया। उन्होंने कहा कि कई मंदिर ऐसे हैं जहां सिर्फ वेजिटेरियन खाने का ही नियम है। अगर कोई शख्स कहे कि नॉनवेज खाना मेरा संवैधानिक अधिकार है और मैं इसे लेकर मंदिर जाऊंगा, तो मंदिर प्रबंधन उसे रोकेगा। एक व्यक्ति के अधिकार की आड़ में मंदिर से जुड़े लाखों लोगों की आस्था को आहत करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
शराब के प्रसाद का दिया उदाहरण
ASG ने कोर्ट को साउथ इंडिया के कुछ मंदिरों का भी उदाहरण दिया जहां शराब को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। उन्होंने कहा कि कल को कोई बाहर का व्यक्ति इस पर भी सवाल उठा सकता है कि शराब को प्रसाद कैसे माना जा सकता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हर संप्रदाय की अपनी अलग मान्यताएं और नियम होते हैं। यह अदालत कैसे तय कर सकती है कि कौन सा संप्रदाय किस परंपरा को मानेगा और किसे नहीं? इन मामलों में किसी भी बाहरी अदालत का दखल नहीं होना चाहिए।
जस्टिस बागची ने किया पलटवार: टकराव होने पर कोर्ट का दखल जरूरी
केंद्र सरकार की दलीलों पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जब किसी मान्यता को लेकर दो गुटों में टकराव की स्थिति पैदा होती है या उसी संप्रदाय का कोई व्यक्ति पूजा के तरीके को चुनौती देता है तो वहां कोर्ट का हस्तक्षेप करना जरूरी हो जाता है।
'कई मंदिरों में पुरुषों की एंट्री पर भी है बैन'
इस केस में सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने सबरीमाला में महिलाओं की रोक का बचाव करते हुए कहा कि देश में कई ऐसे मंदिर भी हैं जहां पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है। ऐसे नियमों को सिर्फ धार्मिक मान्यताओं के तौर पर देखा जाना चाहिए। इसे पुरुषों या महिलाओं के अपमान या भेदभाव से जोड़कर देखना गलत है।
Tags
-
Home
-
Menu
