9 साल की बच्ची की हार्ट अटैक से मौत, स्कूल में खेलते समय पड़ा दिल का दौरा... जानिए हार्ट अटैक आने पर क्या करें
Nagaur Girl Student Death News:

फोटो- इंटरनेट
नागौर: 26 फरवरी 2026, आजकल हार्ट अटैक एक गंभीर समस्या बन गयी है, जिसकी वजह से देशभर में लाखों लोग अपनी जान गंवा रहे हैं. ऐसी ही रूह कंपा देने वाला मामला राजस्थान से सामने आया है. 9 साल की छात्रा की हार्ट अटैक से मौत हो गई. स्कूल में खेलते खेलते बच्ची को हार्ट अटैक आया और उसकी मौत हो गयी.
9 साल की छात्रा की हार्ट अटैक से मौत
घटना, गोटन उपखंड क्षेत्र के टालनपुर कस्बे की है. मृतिका छात्रा का नाम 9 वर्षीय दिव्या है. वह गोटन इंटरनेशनल स्कूल में कक्षा 5वीं में पढ़ती थी. बुधवार, 23 फरवरी को छात्रा को हार्ट अटैक आया और उसकी मौत हो गयी.
छात्रा को कैसे आया हार्ट अटैक
जानकारी के मुताबिक़, दिव्या हमेशा की तरह बुधवार सुबह स्कूल गयी थी. प्रेयर के लिए सभी बच्चों के साथ वो भी स्कूल के ग्राउंड में थी. प्रेयर शुरू होने समय था. तो सभी बच्चे खेल रही थी. तभी खेलते खेलते दिव्या अचानक बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी.
स्कूल के स्टाफ ने इसकी सूचना तत्काल परिजनों को दी और बच्ची को गोटन के राजकीय हॉस्पिटल ले गए. जहाँ डॉक्टर ने जांच के बाद बच्ची को मृत घोषित कर दिया. डॉक्टरों के मुताबिक, कार्डियक अरेस्ट के बच्ची की मौत हुई है. पोस्टमॉर्टम के बाद ही स्पष्ट हो पायेगा.
4 महीने पहले छात्रा के बड़े भाई हुई थी मौत
बच्ची की मौत से परिजनों का रो रोकर बुरा हाल है. 4 महीने पहले छात्रा के बड़े भाई की ऐसे ही हार्ट अटैक से मौत हो गई थी. वहीँ, इस घटना का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. वीडियो में देखा जा सकता है छात्रा खेलते खेलते गिरी और उसकी मौत हो गयी.
हार्ट अटैक आने पर क्या करें
हार्ट अटैक एक गंभीर समस्या है. जिसकी वजह से देशभर में लाखों लोग अपनी जान गंवा देते हैं. यह स्थिति इतनी खतरनाक होती है कि कई बार मरीज को समय रहते इलाज नहीं मिल पाता. लेकिन डॉक्टर के आने से पहले प्राथमिक चिकित्सा देकर मरीज की जान बचाई जा सकती है. तो चलिए जानते हैं हार्ट अटैक आने की स्थिति में आप किन तरीकों से पेशेंट की जान बचाने की कोशिश कर सकते हैं.
पेशेंट को दें ये दवा
आमतौर पर लोग सिरदर्द के लिए घर में Disprin नाम की टेबलेट रखते हैं. यदि आपके घर में भी डिस्प्रिन है तो ऐसे समय में बहुत काम आएगी. ये दवा ब्लड की क्लाॅटिंग को रोकने के भी काम आती है. Ecosprin या Aspirin भी इसी तरह की दवाएं हैं। सीने में दर्द या दबाव की स्थिति में फौरन ये दवा पेशेंट को देनी चाहिए. इससे मृत्यु दर 15 प्रतिशत कम हो सकती है.
सीपीआर दे सकते हैं
आप ऐसे समय में पेशेंट को 'सीपीआर' देकर हाॅस्पिटल पहुंचने से पहले के क्रिटिकल समय में उनकी जान बचा सकते हैं।
सीपीआर कैसे देंते हैं
सीपीआर का मतलब कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन है. यह एक जीवन रक्षक तकनीक है, जो हार्ट अटैक जैसी आपात स्थिति में कारगर है. इसके जरिए रोगी के शरीर में रक्त और ऑक्सीजन का संचार किया जा सकता है जो मूलतः हार्ट का काम है और जो इस समय वह नहीं कर पा रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार सीपीआर देने की एक विशेष तकनीक है जो इस प्रकार है
सबसे पहले पेशेंट को पीठ के बल लिटा लेना है. अपनी हथेलियों को मरीज के सीने के बीचों बीच रखें. इसके लिए दोनों हाथों को इस प्रकार से जोड़ें कि एक हथेली का निचला हिस्सा छाती पर आए. ऊपरी हथेली की उंगलियों को नीचे वाली हाथ की उंगलियों से गूंथ लें. फिर हथेली को छाती के केंद्र के निचले आधे हिस्से पर रखकर दबाएं. प्रति मिनट आपको ऐसा करीब 100 से 120 बार करना होगा. ऐसा करके पूरे शरीर में रक्त के प्रवाह को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है. सही तरीके से यदि सीपीआर दिया जा सके तो मरीज की जान बच सकती है.
एक अन्य तरीके ये आप पेशेंट को मुंह से मुंह में सांस भी दे सकते हैं. इस प्रक्रिया के दौरान आपको पेशेंट की नाक को उंगलियों से दबाकर रखना है और अपने मुंह से कृत्रिम सांस देनी है. आपको गहरी सांस खींचकर पेशेंट के मुंह के माध्यम से शरीर के भीतर पहुंचानी हैं. ऐसा करने से आपकी सांसें तुरंत पेशेंट के फेफड़ों तक जाएंगी. और आपको जान बचाने के लिए कुछ समय मिल जाएगा.
एक घरेलू तरीका यह भी है कि यदि आप सीपीआर और मुंह से मुंह में सांस देकर स्थिति को संभालने में खुद को अक्षम पा रहे हैं तो आप पेशेंट को जमीन पर बिठा लें. घुटने मोड़कर सीने से लगाने और घुटनों को हाथों के घेरे में बांधने को कहें. अब एक से डेढ़ इंच अदरख का टुकड़ा पेशेंट को चबाने को दें. इसे इतनी देर तक चबाना है कि आंखों से आंसू आने लगें. 2-5 मिनट में ऐसा होगा. इससे क्लाॅटिंग खुल सकती है और आपको हाॅस्पिटल पहुंचने का समय मिल सकता है.
ये सभी विधियाँ प्राथमिक चिकित्सा हैं। जैसे ही एंबुलेंस आए आप तल्काल पेशेंट को हाॅस्पिटल ले जाएं। जहां उन्हें विशेषज्ञों की निगरानी में सही इलाज मिल सके।
