Engineers Day 2025: जानें कौन थे सर एम. विश्वेश्वरैया, जिन्हें कहा जाता है 'आधुनिक भारत का भागीरथ' और क्यों मनाया जाता है 'इंजीनियर्स- डे'

(M. Visvesvaraya) NPG file photo
नई दिल्ली। हर साल 15 सितंबर को पूरा देश उन सभी इंजीनियर्स के सम्मान में इंजीनियर्स डे मनाता है, जो अपनी सोच और कड़ी मेहनत से हमारे राष्ट्र की नींव को मजबूत कर रहे हैं। यह दिन खास इसलिए है क्योंकि यह महान सिविल इंजीनियर और भारत रत्न से सम्मानित सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती है। आज से 164 साल पहले कर्नाटक के एक छोटे से गाँव में जन्मे इस शख्स ने भारतीय इंजीनियरिंग की दुनिया में ऐसी क्रांति ला दी कि उन्हें आज भी 'आधुनिक भारत का भागीरथ' कहा जाता है।
कौन थे सर एम. विश्वेश्वरैया?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को कर्नाटक के चिक्काबल्लापुर जिले के मुद्दनहल्ली गाँव में हुआ था। उनके पिता श्रीनिवास शास्त्री एक संस्कृत विद्वान थे, लेकिन बेटे ने अपनी राह चुनी और इंजीनियरिंग को अपना करियर बनाया।
पुणे के साइंस कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद, उन्होंने ब्रिटिश सरकार में असिस्टेंट इंजीनियर के तौर पर नौकरी शुरू की। उनकी प्रतिभा और दूरदर्शिता ने उन्हें जल्द ही अलग पहचान दिलाई। उन्होंने अपने पूरे जीवन में कई ऐसे अविश्वसनीय काम किए, जिन्होंने भारत के विकास की दिशा बदल दी।
राष्ट्र निर्माण में उनका योगदान
सर एम. विश्वेश्वरैया के योगदान को सिर्फ कुछ शब्दों में समेटना मुश्किल है। उन्होंने देश के लिए कुछ ऐसे काम किए, जो आज भी इंजीनियरिंग के क्षेत्र में मील का पत्थर माने जाते हैं:
कृष्णराज सागर बांध: कर्नाटक में कावेरी नदी पर बना यह विशाल बांध आज भी उनकी दूरदर्शिता का सबूत है। इस बांध ने न सिर्फ कृषि के लिए पानी की समस्या को हल किया, बल्कि मैसूर और आस-पास के इलाकों में बिजली की आपूर्ति भी सुनिश्चित की।
हैदराबाद बाढ़ नियंत्रण प्रणाली: 20वीं सदी की शुरुआत में मूसी और एसी नदियों की बाढ़ से हैदराबाद अक्सर तबाह हो जाता था। सर विश्वेश्वरैया ने एक ऐसी उन्नत बाढ़ नियंत्रण प्रणाली तैयार की, जिसने शहर को हमेशा के लिए बाढ़ के खतरे से मुक्त कर दिया।
स्वचालित स्लुइस गेट्स: उन्होंने बांधों में पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए एक स्वचालित स्लुइस गेट्स प्रणाली का आविष्कार किया। इसका इस्तेमाल आज भी कई जगहों पर किया जाता है।
आधुनिक मैसूर के निर्माता: 1912 से 1918 तक मैसूर रियासत के दीवान के रूप में, उन्होंने शिक्षा, रेलवे और उद्योगों को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से ही मैसूर में कई फैक्ट्रियां और शैक्षणिक संस्थान स्थापित हुए, जिसके कारण उन्हें 'आधुनिक मैसूर का पिता' भी कहा जाता है।
उनके इन सभी कामों के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1955 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा।
इंजीनियर्स डे का इतिहास
भारत में इंजीनियर्स डे की शुरुआत 1968 में हुई थी, जब भारत सरकार ने सर एम. विश्वेश्वरैया के सम्मान में इस दिन को मनाने की घोषणा की। इसका मुख्य उद्देश्य देश के इंजीनियर्स के योगदान को पहचानना और युवाओं को विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित करना है।
इस साल, इंजीनियर्स डे की थीम है "डीप टेक और इंजीनियरिंग उत्कृष्टता: भारत के टेकेड को आगे बढ़ाना" (Deep Tech & Engineering Excellence: Driving India’s Techade)। यह थीम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में भारत को वैश्विक नेतृत्व दिलाने पर जोर देती है। यह युवा इंजीनियर्स को नई तकनीकों को अपनाने और देश को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
एक सदी से भी ज़्यादा लंबा जीवन
सर विश्वेश्वरैया 102 साल की लंबी उम्र तक जीवित रहे। उन्होंने अपने जीवन का हर पल देश को समर्पित किया। उनका निधन 1962 में हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी हमारे देश की सड़कों, पुलों, बांधों और इमारतों में ज़िंदा है।
उनका जीवन और कार्य हमें यह सिखाता है कि, इंजीनियर सिर्फ मशीनें या इमारतें नहीं बनाते, बल्कि वे एक राष्ट्र का भविष्य भी गढ़ते हैं। यही वजह है कि 15 सितंबर का दिन सिर्फ एक छुट्टी नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के प्रति सम्मान का प्रतीक है जो अपनी सोच और पसीने से हमारे देश को बेहतर बनाने में लगा हुआ है।
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