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Bombay High Court: घर में 'क्रॉस' या ईसा मसीह की मूर्ति रखना धर्म परिवर्तन नहीं, पढ़ें हाई कोर्ट का पूरा वर्डिक्ट

Bombay High Court का बड़ा फैसला! अकोला के एक छात्र के SC सर्टिफिकेट केस में कोर्ट ने कहा- घर में क्रॉस या जीसस की फोटो रखना ईसाई धर्म अपनाने का सबूत नहीं। जानें फैसले के मायने।

Bombay High Court: घर में
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फोटो AI जेनरेटेड

By Ragib Asim

नागपुर 7 March 2026: क्या किसी व्यक्ति के घर में ईसा मसीह (Jesus Christ) की मूर्ति या क्रॉस (Cross) मिलने का मतलब यह है कि उसने हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया है? बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) की नागपुर बेंच ने इस सवाल पर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति मुकुलिका जावलकर और नंदेश देशपांडे की खंडपीठ ने कहा है कि घर में सिर्फ धार्मिक प्रतीक होने से किसी के 'धर्म परिवर्तन' (Religious Conversion) का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

पूरा विवाद अकोला (Akola) के एक कॉलेज छात्र से जुड़ा है। छात्र ने अनुसूचित जाति (SC) प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था जिसे अकोला की जाति जांच समिति (Caste Scrutiny Committee) ने खारिज कर दिया। समिति का तर्क था कि छात्र के घर में क्रॉस और ईसा मसीह की तस्वीरें मिली हैं। साथ ही 1962 के एक स्कूल रिकॉर्ड का हवाला दिया गया जिसमें उसके परिवार को 'ईसाई' (Christian) बताया गया था। समिति ने इस से नतीजा निकाला कि परिवार ने ईसाई धर्म अपना लिया है, इसलिए छात्र SC स्टेटस का हकदार नहीं है।

याचिकाकर्ता (छात्र) की दलील

छात्र ने हाई कोर्ट में बताया कि उसके परिवार ने कभी भी औपचारिक (Formal) रूप से धर्म परिवर्तन नहीं किया है। 1962 के स्कूल रिकॉर्ड को लेकर उसने साफ किया कि उस दौर में जातिगत भेदभाव (Caste Discrimination) से बचने के लिए उसके दादा ने स्कूल में खुद को 'ईसाई' लिखवाया था लेकिन असल में कोई धर्मांतरण (Religious Conversion) नहीं हुआ था। उसने अपने बचाव में कई सरकारी दस्तावेज और रिश्तेदारों के वैध SC सर्टिफिकेट भी पेश किए।

हाई कोर्ट का फैसला और अधिकारियों को फटकार

छात्र के दस्तावेजों और दलीलों की जांच के बाद हाई कोर्ट ने जिला अधिकारियों के तर्कों को पूरी तरह 'निराधार और त्रुटिपूर्ण' (Flawed) बताया। कोर्ट ने जाति जांच समिति के आदेश को रद्द करते हुए प्रशासन को तुरंत छात्र को SC प्रमाण पत्र (SC Certificate) जारी करने का निर्देश दिया।

क्या हैं इस फैसले के मायने?

इस लीगल वर्डिक्ट के कई बड़े सामाजिक और कानूनी मायने हैं:

ठोस सबूत (Documentary Proof) अनिवार्य: कोर्ट ने क्लियर कर दिया है कि धर्म परिवर्तन के दावों को साबित करने के लिए 'बपतिस्मा' (Baptism) अनुष्ठान या बपतिस्मा प्रमाण पत्र जैसे ठोस लीगल डॉक्युमेंट्स होने चाहिए।

अधिकारों की सुरक्षा: केवल 'संदेह', छिटपुट पुराने रिकॉर्ड्स या किसी दूसरे धर्म के प्रतीक घर में रखने के आधार पर किसी भी व्यक्ति से उसके संवैधानिक जातिगत अधिकार (Caste Rights) नहीं छीने जा सकते।

निजी आस्था की आजादी: भारत में किसी भी व्यक्ति को अपने घर में किसी भी धर्म के प्रतीक रखने की आजादी है इसे कानूनी तौर पर 'धर्मांतरण' का सबूत नहीं माना जा सकता।

Ragib Asim

Ragib Asim is a seasoned News Editor at NPG News with 15+ years of excellence in print, TV, and digital journalism. A specialist in Bureaucracy, Politics, and Governance, he bridges the gap between traditional reporting and modern SEO strategy (8+ years of expertise). An alumnus of Jamia Millia Islamia and Delhi University, Ragib is known for his deep analytical coverage of Chhattisgarh’s MP administrative landscape and policy shifts. Contact: [email protected]

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