Madhya Pradesh High Court News: हाई कोर्ट का अहम फैसला, वोटर आईडी और आधार जन्मतिथि के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हो सकता,
Madhya Pradesh High Court News: जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया है, आधार कार्ड और वोटर आईडी में दर्ज जन्मतिथि, प्रमाण के लिए पर्याप्त नहीं है। स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज जन्मतिथि ही वास्तविक प्रमाण है।

Madhya Pradesh High Court News: जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया है, आधार कार्ड और वोटर आईडी में दर्ज जन्मतिथि, प्रमाण के लिए पर्याप्त नहीं है। स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज जन्मतिथि ही वास्तविक प्रमाण है। हाई कोर्ट ने साफ कहा कि आधार और वोटर आईडी में लिखे डेट ऑफ बर्थ प्रमाणिक नहीं माना जा सकता। इसमें दर्ज की गई सभी जानकारी खुद की घोषणा के आधार पर होती है। आधार और वोटर आईडी का उद्देश्य पहचान सुनिश्चित करना है, ना कि जन्म तिथि को प्रमाणिक करना।
मध्य प्रदेश के धार जिले के अतिरिक्त कलेक्टर ने आंगनबाड़ी सहायिका के पद से सेवानिवृत हुई हीरा बाई की अपील पर सुनवाई करते हुए उनकी सेवानिवृत्ति को गलत ठहराया। अतिरिक्त कलेक्टर के आदेश का परिपालन करते हुए विभागीय अधिकारी ने हीरा बाई की सेवानिवृति आदेश को रद्द करते हुए आंगनवाड़ी सहायिका के पद पर पुनः बहाल कर दिया। हीरा बाई की बहाली के साथ ही विभागीय अधिकारी ने रिक्त पद पर जिनकी नियुक्ति की थी उसे हटा दिया। कारण बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र में सहायिका का एक ही पद रिक्त था। विभाग के इस फैसले को चुनौती देते हुए सेवा से पृथक की गई महिला ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। याचिका में बताया कि पद रिक्त होने के बाद महिला एवं बाल विकास विभाग ने विधिवत विज्ञापन जारी कर चयन प्रक्रिया पूरी की थी। इसके बाद जून, 2018 में उसकी नियुक्ति की गई थी।
सेवानिवृति के तकरीबन दो साल बाद हीरा बाई ने अतिरिक्त कलेक्टर के कोर्ट में अपील कर गलत जन्मतिथि के आधार पर उसे रिटायर करने की जानकारी दी। हीराबाई ने बताया कि सेवा अभिलेखों में उसकी जन्मतिथि गलत दर्ज की गई है। बताया कि उसकी वास्तविक जन्मतिथि 5 मार्च 1955 नहीं, बल्कि 1 जनवरी 1964 है। दस्तावेज के रूप में हीराबाई ने वोटर आईडी और आधार कार्ड पेश किया।
अदालत ने कहा कि हीरा बाई 5 मार्च, 2017 को सेवा अभिलेखों में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर सेवानिवृत्त हुई थीं। हाई कोर्ट ने कहा, कर्मचारी के सेवा अभिलेखों में दर्ज जन्मतिथि ही प्रमाणिक रूप से मान्य होगी। उस प्रविष्टि को चुनौती नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने कहा, अपीलीय प्राधिकरण ने अपील में विलंब और लापरवाही के सिद्धांत को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, जो सेवा कानून में घातक माना जाता है। रिटायरमेंट के साथ ही नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध समाप्त हो जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद लंबे समय पश्चात पूर्व के मामलों को फिर से खोलना न केवल प्रशासनिक अस्थिरता पैदा करता है, बल्कि तीसरे पक्ष के साथ अन्याय करता है, जैसा कि इस मामले में हुआ। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में अपीलीय प्राधिकरण के फैसले को अवैध करार देते हुए निरस्त कर दिया है। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को आंगनबाड़ी सहायिका के पद पर पुन: बहाल करने का निर्देश जारी किया है।
