Madhya Pradesh High Court: विवाह या गर्भावस्था शिक्षा में नहीं बन सकता बाधा: हाई कोर्ट ने जारी किया महत्वपूर्ण आदेश...
Madhya Pradesh High Court: हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, विवाह या गर्भावस्था शिक्षा में बाधा नहीं बन सकती। हाई कोर्ट ने याचिका को राहत देते हुए याचिकाकर्ता को उपस्थिति में छूट देने कॉलेज प्रबंधन को जरुरी निर्देश दिया है।

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15 February 2026|जबलपुर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विवाह और गर्भावस्था किसी महिला की उच्च शिक्षा में बाधा नहीं बन सकता। अदालत ने शैक्षणिक संस्थानों को निर्देश दिया कि वे छात्राओं को मातृत्व, चाइल्ड केयर अवकाश, उपस्थिति में छूट और आवश्यक शैक्षणिक सहयोग प्रदान करें। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा, कार्यस्थलों पर उपलब्ध मातृत्व संरक्षण का लाभ शिक्षा प्राप्त कर रही महिलाओं व युवतियों को समान रूप से मिलना चाहिए।
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा, अध्ययन के दौरान विवाह या गर्भावस्था उनके लिए शिक्षा पूरी करने में बाधा नहीं बननी चाहिए। बेंच ने कहा, याचिकाकर्ता को अंतिम परीक्षा में बैठने के लिए आवश्यक उपस्थिति प्रतिशत प्राप्त करने हेतु उन्हें सुविधा दी जानी चाहिए। डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा, गर्भावस्था या प्रसव के बाद छात्राओं को अतिरिक्त कक्षाएं, अध्ययन सामग्री और आवश्यक अकादमिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
क्या है मामला
याचिकाकर्ता रुमैसा अरवा, भोपाल स्थित हकीम सैयद ज़ियाउल हसन शासकीय स्वायत्त यूनानी कॉलेज की BUMS छात्रा है। प्रथम वर्ष की पढ़ाई पूरी कर ली है। दूसरे वर्ष में उनका विवाह हुआ और वे गर्भवती हो गईं। 20 नवंबर 2024 को उन्होंने शिशु को जन्म दिया और मातृत्व अवकाश की मांग की। कॉलेज ने केवल 10% उपस्थिति में छूट दी। 75% की अनिवार्य उपस्थिति के मापदंड पर उनकी उपस्थिति 56.64% होने के कारण परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया। कॉलेज प्रबंधन के इस निर्णय को चुनौती देते हुए अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने अंतरिम राहत प्रदान करते हुए परीक्षा में बैठने की अनुमति दी। हाई कोर्ट के निर्देश पर कॉलेज प्रबंधन ने याचिकाकर्ता को परीक्षा में बैठने की अनुमति तो दी, परीक्षा परिणाम को रोक दिया। कक्षा में कम उपस्थिति को कारण बताते हुए रिजल्ट जारी नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने UGC के 14 अक्टूबर 2021 के पत्र का हवाला देते हुए कहा, यूजीसी द्वारा जारी पत्र में सभी शिक्षण संस्थानों को छात्राओं के लिए मातृत्व/चाइल्ड केयर अवकाश नीति बनाने के निर्देश दिए गए थे। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसला का हवाला देते हुए डिवीजन बेंच को बताया कि दिल्ली हाई कोर्ट ने रेणुका बनाम UGC के मामले में फैसला दिया है, इसमें मातृत्व लाभ को महिलाओं के अधिकारों का हिस्सा माना गया है। याचिका की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए कॉलेज प्रबंधन को उपस्थिति में आवश्यक 75 प्रतिशत तक छूट का लाभ देते हुए परीक्षा परिणाम जारी करने का निर्देश दिया है।
