Madhya Pradesh High Court: पेन ड्राइव साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं, हाई कोर्ट ने कहा....
Madhya Pradesh High Court: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, ट्रायल में विलंब के दौरान इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में पेश किए गए पेन ड्राइव को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया है।

इमेज सोर्स- गूगल, एडिट बाय- NPG News
15 February 2026|जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, ट्रायल में विलंब के दौरान इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में पेश किए गए पेन ड्राइव को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया है।
याचिका की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा, किसी आपराधिक मुकदमे में ट्रायल में हो रहे विलंब के दौर में पेश किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य तभी स्वीकार किए जा सकते हैं, जब आरोपों से स्पष्ट प्रासंगिकता हो और उन्हें विधि के अनुसार सिद्ध किया जा सके। हाई कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ, मृतक मरीज की आवाज़ रिकॉर्डिंग वाली पेन-ड्राइव को रिकॉर्ड पर लेने से इंकार कर दिया है। याचिकाकर्ता मालिनी ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए चिकित्सक व संस्थान पर याचिक दायर की थी। छिंदवाड़ा के प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश के कोर्ट में साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत पेन-ड्राइव को रिकॉर्ड पर लेने की मांग की थी। जिसे प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश ने आवेदन को खारिज कर दिया था।
ये है मामला
चिकित्सक ने याचिकाकर्ता के पति के इलाज से संबंधित मेडिकल दस्तावेज़ों में जालसाज़ी की थी। इलाज के दौरान याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु हो गई। याचिकाकर्ता की शिकायत पर पुलिस ने 13 अक्टूबर 2021 को IPC की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत FIR दर्ज की थी। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा, मृत्यु से पहले उनके पति ने फोन पर परिवार के सदस्यों को बताया कि उन्हें समुचित इलाज नहीं मिल रहा है । कॉल रिकार्डिंग को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से उसे पेन-ड्राइव में सुरक्षित रखा है। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में पति के कॉल रिकार्डिंग से सबकुछ साफ हो जाएगा,आरोपी चिकित्सक ने अपनी लापरवाही छिपाने के लिए मेडिकल रिकॉर्ड को फर्जी बनाया। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा, ट्रायल कोर्टर् ने साक्ष्य की प्रासंगिकता पर विचार किए बिना ही आवेदन को खारिज कर दिया है। अस्पताल प्रबंधन ने याचिकाकर्ता द्वारा की गई मांग का विरोध करते हुए कहा,जांच के दौरान धारा 161 CrPC के तहत दर्ज किसी भी पारिवारिक सदस्य के बयान में इस तरह की फोन बातचीत का कोई ज़िक्र नहीं है। अस्पताल प्रबंधन ने कहा, घटना के तीन साल बाद पेन ड्राइव को साक्ष्य के तौर पर स्वीकार करने का आवेदन पेश किया है। सामग्री की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका को खारिज कर दिया है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्वीकार्य साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि रिकॉर्डिंग में सुनाई देने वाली आवाज़ वास्तव में मृतक की ही है। कोर्ट ने कहा, यदि पेन-ड्राइव को स्वीकार कर भी लिया जाए तो मृतक की आवाज़ की पहचान से संबंधित किसी निश्चित और स्वीकृत साक्ष्य के अभाव में अभियोजन उस बातचीत को सिद्ध नहीं कर पाएगा।
कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि कथित बातचीत का विषय मेडिकल लापरवाही से संबंधित है, जबकि अभियुक्तों के विरुद्ध केवल मेडिकल दस्तावेज़ों की जालसाज़ी के आरोप तय किए गए और मेडिकल लापरवाही का कोई आरोप नहीं है।
