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इंदौर का भागीरथपुरा जल कांड : 16 मौतों के बाद भी प्रशासन मौन, क्या रसूखदारों को बचाने के लिए दबाई जा रही है हकीकत?

इंदौर का भागीरथपुरा जल कांड : दूषित पानी पीने से अब तक 16 मासूम जिंदगियां काल के गाल में समा चुकी हैं, लेकिन प्रशासन की सुस्ती और जांच की कछुआ चाल कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

इंदौर का भागीरथपुरा जल कांड : 16 मौतों के बाद भी प्रशासन मौन, क्या रसूखदारों को बचाने के लिए दबाई जा रही है हकीकत?
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इंदौर का भागीरथपुरा जल कांड : 16 मौतों के बाद भी प्रशासन मौन, क्या रसूखदारों को बचाने के लिए दबाई जा रही है हकीकत?

By Uma Verma

Indore Bhagirathpura News Update : इंदौर : मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर का भागीरथपुरा क्षेत्र आज एक ऐसे मातम के साये में है, जिसने पूरे शहर की सफाई और सुशासन के दावों की पोल खोल दी है। दूषित पानी पीने से अब तक 16 मासूम जिंदगियां काल के गाल में समा चुकी हैं, लेकिन प्रशासन की सुस्ती और जांच की कछुआ चाल कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर नलों में आने वाला पानी केवल 'गंदा' था या उसमें औद्योगिक क्षेत्र का जहरीला केमिकल मिला हुआ था?

Indore Bhagirathpura News Update : गटर का पानी या फैक्ट्रियों का जहर?

भागीरथपुरा क्षेत्र से सटा हुआ औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Area) कई छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों का गढ़ है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि पेयजल की पाइपलाइन में गटर के पानी के साथ-साथ फैक्ट्रियों से निकलने वाला रासायनिक कचरा (Chemical Waste) भी लीक होकर मिल गया था। यही कारण है कि पानी इतना घातक साबित हुआ कि इसने देखते ही देखते 16 लोगों की जान ले ली।

हैरानी की बात यह है कि औद्योगिक क्षेत्र में कई प्रभावशाली नेताओं और उनके करीबियों की फैक्ट्रियां संचालित हो रही हैं। चर्चा है कि रसूखदारों को बचाने और अधिकारियों के चक्कर में इस मामले को केवल सामान्य दूषित जल की घटना बताकर रफा-दफा करने की कोशिश की जा रही है।

एमजीएम मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट और हैजा का खौफ

एमजीएम मेडिकल कॉलेज की प्रारंभिक रिपोर्ट ने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, मृतकों और बीमारों में उल्टी-दस्त के तीव्र लक्षण पाए गए थे। पानी के सैंपल की जांच में हैजा के कीटाणु मिलने की पुष्टि हुई है। इसके बावजूद, नगर निगम और जिला प्रशासन ने अब तक कुछ निचले स्तर के अधिकारियों को हटाने के अलावा कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं की है।

आंकड़ों की बाजीगरी: निगम और हकीकत में अंतर

इस पूरे मामले में नगर निगम की भूमिका भी संदिग्ध नजर आ रही है। जहाँ क्षेत्र के लोग 16 मौतों का दावा कर रहे हैं, वहीं नगर निगम ने कोर्ट में केवल 4 मौतों की ही आधिकारिक पुष्टि की है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या को भी कम करके दिखाया जा रहा है ताकि मामले की गंभीरता को कम किया जा सके।

हाईकोर्ट में सुनवाई 6 जनवरी को : क्या मिलेगा न्याय?

प्रशासन की लीपापोती को देखते हुए अब यह मामला इंदौर हाई कोर्ट की दहलीज तक पहुँच गया है। इस प्रकरण में तीन अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में मांग की गई है कि: जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या (धारा 304) का मामला दर्ज किया जाए। प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाए। पानी के दूषित होने के असली स्रोत की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो। हाई कोर्ट में इन याचिकाओं पर अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 को होनी है। पूरा इंदौर अब कोर्ट की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है।

तंत्र की विफलता या सोची-समझी साजिश?

एक तरफ इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर होने का गौरव रखता है, वहीं दूसरी तरफ उसके एक हिस्से में दूषित पानी से 16 मौतें होना प्रशासनिक तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है। यदि यह वाकई औद्योगिक केमिकल का मामला है, तो दोषियों को बचाना मानवता के खिलाफ अपराध होगा। क्या इंदौर की जनता को यह जानने का हक नहीं है कि उनके अपनों की जान किसने ली?

Uma Verma

Uma Verma is a postgraduate media professional holding MA, PGDCA, and MSc IT degrees from PTRSU. She has gained newsroom experience with prominent media organizations including Dabang Duniya Press, Channel India, Jandhara, and Asian News. Currently she is working with NPG News as acontent writer.

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