छात्र जीरो, टीचर 12 हजार! मध्य प्रदेश के खाली स्कूलों में तैनात शिक्षकों पर फूंके जा रहे करोड़ों रुपये, CAG रिपोर्ट ने खोली पोल
मध्य प्रदेश में 6,954 स्कूलों में छात्र शून्य या बेहद कम, फिर भी 11,995 शिक्षक पदस्थ। CAG रिपोर्ट में 10 अरब से ज्यादा वेतन खर्च का खुलासा, भोपाल में 108% नियुक्ति और ग्रामीण क्षेत्रों में 15% पद खाली।

भोपाल। मध्य प्रदेश की स्कूल शिक्षा व्यवस्था पर एक ऐसा खुलासा हुआ है, जिसने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आमतौर पर तबादलों और पदस्थापना की गड़बड़ियां सुर्खियों में नहीं आतीं, लेकिन इस बार मामला सीधे हजारों करोड़ के संभावित दुरुपयोग से जुड़ा है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India) की ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि प्रदेश के हजारों स्कूलों में छात्र ही नहीं हैं, फिर भी वहां हजारों शिक्षक पदस्थ हैं — और उन्हें नियमित वेतन दिया जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 6,954 प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल ऐसे पाए गए जहां छात्र संख्या शून्य या बेहद कम है, लेकिन वहां 11,995 शिक्षक तैनात हैं। यदि एक शिक्षक का औसत वेतन ₹70,000 प्रतिमाह माना जाए, तो इन शिक्षकों पर एक वर्ष में ₹10 अरब (1000 करोड़ रुपये) से अधिक का खर्च हुआ। सवाल यह है कि जब पढ़ाने के लिए छात्र ही नहीं थे, तो यह वेतन किस काम का?
एक तरफ 1 लाख शिक्षकों की कमी, दूसरी तरफ अतिरिक्त नियुक्ति
रिपोर्ट का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जहां प्रदेश में 1 लाख से अधिक शिक्षकों की कमी बताई गई है, वहीं राजधानी भोपाल जैसे शहरी क्षेत्रों में स्वीकृत पदों के मुकाबले 108 प्रतिशत नियुक्तियां दर्ज की गईं. यानी 8 प्रतिशत अधिक शिक्षक। इसके विपरीत भोपाल के ग्रामीण क्षेत्रों में 15 प्रतिशत पद खाली पाए गए। यह असंतुलन स्पष्ट करता है कि शिक्षक तैनाती नीति में गंभीर खामियां हैं।
नियमों की अनदेखी और प्रोबेशन में तबादले
CAG ऑडिट में पाया गया कि शिक्षकों के स्थानांतरण और पदस्थापना बिना समुचित युक्तिकरण (Rationalization) के किए गए। सरकारी आदेशों का उल्लंघन करते हुए प्रोबेशन अवधि में ही स्वैच्छिक तबादलों की अनुमति दी गई, जबकि नियमों के अनुसार शिक्षकों को कम से कम तीन वर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देना अनिवार्य था। इसका परिणाम यह हुआ कि शहरी क्षेत्रों में शिक्षकों का जमावड़ा बढ़ता गया और ग्रामीण स्कूलों में रिक्तियां बनी रहीं।
आठ वर्षों से लंबित युक्तिकरण
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि पिछले आठ वर्षों से पदों का व्यापक युक्तिकरण नहीं किया गया। अतिशेष (Surplus) शिक्षकों को समायोजित किए बिना ही नई भर्तियां जारी रहीं। शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद शहरी क्षेत्रों से शिक्षकों को ग्रामीण स्कूलों में स्थानांतरित नहीं किया गया।
‘नो वर्क, नो पे’ पर सवाल
राज्य सरकार कई मामलों में हाई कोर्ट में ‘नो वर्क, नो पे’ सिद्धांत का समर्थन करती रही है, लेकिन इस मामले में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया।
सिस्टम पर गंभीर प्रश्न
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का भी उदाहरण है। खाली स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती और जरूरतमंद स्कूलों में रिक्त पद यह स्थिति दर्शाती है कि संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा।CAG ने अपनी रिपोर्ट में सुधारात्मक कदम उठाने के सुझाव दिए हैं, लेकिन अब सबकी नजर राज्य सरकार पर है कि क्या इन सिफारिशों पर अमल होगा या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
