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प्रभारी सचिवों का औचित्य?

प्रभारी सचिवों का औचित्य?
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By NPG News

संजय के दीक्षित

तरकश, 25 अप्रैल 2021. बेकाबू हो रही कोरोना में जिलों के प्रभारी सचिवों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। छोटे-छोटे जिलों का हाल-बेहाल हो रहा…कलेक्टर संसाधनों के लिए मशक्कत कर रहे हैं मगर सचिवों का कोई पता नहीं है। शायद ही किसी सचिव ने किसी कलेक्टर को फोन लगाकर क्रायसिस के बारे में पूछा होगा। एक कलेक्टर ने बताया…उनके प्रभारी सचिव पिछले साल अक्टूबर में फोन लगाए थे, उसके बाद फिर कभी नहीं। जबकि, कोआर्डिनेशन के लिए सरकार ने सभी जिलों में प्रभारी सचिव बना रखे हैं। इसके तहत मंत्रालय के सचिवों को एक-एक, दो-दो जिलोें का प्रभार दिया गया है। पिछली सरकारें भी प्रभारी सचिवों को जिलों में महीने में एक बार विजिट करने के साथ ही हर तीन महीने में एक बार संबंधित जिलों में रात्रि विश्राम करने का आदेश कई बार दिया था। हुआ क्या…? एक भी सचिव अपने जिले में नहीं रुके। भूपेश बघेल सरकार में पिछले साल चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल ने सचिवों को हर महीने जिलों का दौरा कर रिपोर्ट मांगी थी। सरकार को पूछना चाहिए कि कितने सचिवों ने जिलों का दौरा किया और कब-कब रिपोर्ट सौंपी…कोरोना काल में उन्होंने कलेक्टरों को किस तरह मार्गदर्शन दे रहे हैं। फिर प्रभारी सचिवों का औचित्य सामने आ जाएगा।

ऐसा रिस्पांस

रेमडेसिविर इंजेक्शन की आपूर्ति के लिए सरकार ने दो आईएएस और एक आईएफएस समेत तीन अधिकारियों की ड्यूटी लगाई है। इनमें से दो अधिकारी मुंबई में कैम्प कर रहे ताकि जिलों को आसानी से इंजेक्शन की सप्लाई हो सकें। लेकिन हो क्या रहा….राजनांदगांव के एनएचएम के एक अधिकारी ने एक अफसर को मुंबई फोन लगाया तो अफसर ने मदद की बजाए चार कंपनियों के नम्बर दे दिए…लो इनसे बात कर लो। अब जब कंपनी से सीधे बात कर इंजेक्शन मंगाना है तो फिर इन अधिकारियों की नियुक्ति क्यों?

एयर एंबुलेंस…ढाई गुना रेट

कोरोना महामारी में कोई भी दुखियों की जेब काटने का मौका नहीं छोड़ रहा। अस्पतालों की तो पूछिए मत! कोरोना से बिलबिलाते मरीजों में इतनी ताकत कहां होती है कि डिस्चार्ज होते समय अस्पताल वालों से हिसाब पूछ पाए। उसकी कोशिश होती है किसी तरह अपने घर पहुंच जाए। हमारा इशारा अनाप-शनाप बिलिंग की ओर है। उधर, सामान्य मरीजों का दिल्ली, मंुबई, चेन्नई के लिए एयर एंबुलेंस का रेट पांच से छह लाख है, वहीं कोरोना मरीजों से 14 से 15 लाख लिए जा रहे हैं। रायपुर, बिलासपुर से लगभग हर रोज एक मरीज एयर लिफ्ट हो रहे हैं। बिलासपुर से रायपुर के लिए एंबुलेंस का किराया 10 से 12 हजार देना पड़ रहा। राजधानी में एक गरीब आदमी आॅटो से एम्स गया। वहां कहा गया काली बाड़ी से कोरोना का टेस्ट कराकर लाओ। एम्स से काली बाड़ी आने और फिर वहां से एम्स जाने का आॅटो वाले ने दो हजार रुपए झटक लिया। याने उपर से नीचे वाले….सभी आपदा में अवसर ढूंढने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

एम्स में एप्रोच नहीं

एम्स में पिछले साल कोरोना में वीआईपी से लेकर छुटभैये तक बेड का जुगाड़ कर लिया था। लेकिन, इस बार एम्स सख्त हो गया है। बताते हैं, पिछले साल एम्स में मची अफरातफरी को देखते वहां के डाक्टरों ने विरोध कर दिया था। दरअसल, पिछले साल मरीजों के क्राउड के चलते एम्स का सिस्टम ध्वस्त हो गया था। सबसे अधिक मौतें भी वहीं हुई थी। उसकी वजह यह थी कि वहां क्षमता से दस गुना मरीज हो गए थे। हर आदमी चाहता था कि किसी तरह एम्स में इंट्री मिल जाए। लेकिन, एम्स अबकी सतर्क है। वहां सिर्फ कोरोना के गंभीर मरीजों को ही भर्ती हो पा रही। वो भी रेफेरल केसेज। बीजेपी के नेताओं से जरूर एम्स वाले कुछ असहज महसूस कर रहे।

10 आईएएस, एक आईएफएस

कोरोना महामारी के मद्देनजर स्वास्थ्य विभाग फिहलाल सरकार के टाॅप प्रायरिटी पर है। तभी सरकार इस महकमे को लगातार मजबूत कर रही। हेल्थ में आईएएस अफसरों की संख्या अब तक 10 हो चुकी है। दो आईएएस और एक आईएफएस को सरकार ने इस विभाग की मदद करने में लगाया है। हेल्थ में इस समय रेणु पिल्ले एसीएस, शहला निगार सिकरेट्री, सीआर प्रसन्ना स्पेशल सिकरेट्री, नीरज बंसोड़ डायरेक्टर हेल्थ, डाॅ0 प्रियंका शुक्ला ज्वाइंट सिकरेट्री और एमडी एनएचएम, कार्तिकेय गोयल एमडी सीजीएमएससी, केडी कुंजाम कंट्रोलर ड्रग, डी. राहुल वेंकट ओएसडी हेल्थ के साथ आईएएस हिमशिखर गुप्ता, आईएएस भोस्कर विलास संदीपन और आईएफएस अरुण प्रसाद को रैमडेसिविर की सप्लाई का जिम्मा सौंपा गया है।

महामारी में पब्लिसिटी

कुछ अफसर इस विपदा के समय में भी पब्लिसिटी को ध्यान में रखते काम कर रहे हैं। ये उन सैकड़ों फ्रंटलाइन वारियर्स का अपमान होगा, जो सिर पर कफन बांध कर सुबह से लेकर देर रात तक ड्यूटी बजा रहे हैं। वास्तव में सैल्यूट के लायक अस्पताल के नर्स और छोटे स्टाफ हैं, जो मामूली वेतन में भी जान जोखिम में डालकर कोरोना वार्डों में सेवाएं दे रहे। कैमरे के लिए दो मिनट सड़क पर खड़े होकर वाहवाही बटोरने वाली महिला आफिसर कतई नहीं….फोटो में इंटरेस्ट रखने वाले कलेक्टर भी नहीं।

अंत में दो सवाल आपसे

इस खबर में कितनी सत्यता है कि कोरोना से संबंधित संसाधनों की आपूर्ति में प्रमोटी कलेक्टरों से भेदभाव किए जा रहे हैं?
दवाइयों की मारामारी को रोकने कुछ समय के लिए किसी दबंग सिकरेट्री या प्रिंसिपल सिकरेट्री को ड्रग कंट्रोलर का दायित्व नहीं सौंपा जा सकता?

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