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जय और वीरू की जोड़ी!

तरकश, 12 जुलाई 2020
संजय के दीक्षित
छत्तीसगढ़ की राजनीति में आजकल जय-वीरू की जोड़ी हाॅट टाॅपिक है। मगर बात जब जय-वीरू की आती है तो बरबस ब्यूरोक्रेसी की भी एक जोड़ी जेहन में आ जाती है। आईएएस आरपी मंडल और आईपीएस अशोक जुनेजा की। इस जोड़ी को लोग भूले नहीं हैं। दोनांे बिलासपुर में कलेक्टर, एसपी रहे। इसके बाद दोनों की जोड़ी रायपुर में भी हिट रही। रायपुर में कलेक्टर, एसपी के रूप में दोनों जहां भी निकलते…एक साथ। किसी पर्सनल फ्रेंड के घर जाते तो साथ और दौरे में जाए तो साथ। याद होगा, 2005 में इस जोड़ी को जय-वीरू कहा जाने लगा था। तभी लोग कहने लगे थे कि एक दिन दोनों चीफ सिकरेट्री और डीजीपी बनेंगे। लेकिन, वक्त की बात है। आरपी मंडल पर साईं बाबा की कृपा रही…वे ब्यूरोके्रसी के शीर्ष पद तक पहुंच गए। लेकिन, जुनेजा जनवरी 2019 में ड्यू होने के बाद भी डीजी प्रमोट नहीं हो पा रहे। डीजीपी तो उसके बाद की बात है। जुनेजा की पोस्टिंग हालांकि, वजनदार है। आर्म फोर्सेज के चीफ के साथ एडीजी नक्सल। लेकिन, डीजी नहीं बन पा रहे। जाहिर है, ऐसे में सवाल तो उठेंगे ही, वीरू के लिए जय क्या कर रहे हैं….उनकी वो सीएस और डीजीपी वाली जोड़ी बन पाएगी?

कप्तानी का रिकार्ड

बात अशोक जुनेजा की कप्तानी की निकली तो आईपीएस अजय यादव का जिक्र लाजिमी है। अजय छत्तीसगढ़ के दूसरे आईपीएस हैं, जिन्हें सूबे के तीनों बड़े जिले रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग के एसपी रहने का मौका मिला। उनसे पहिले जुनेजा ने तीनों जिलों में कप्तानी की है। हालांकि, जुनेजा का ब्रेक नहीं हुआ। बिलासपुर के बाद वे दुर्ग और फिर वहां से रायपुर आए थे। अजय को इस दौरान कठिन समय का सामना करना पड़ा। बिलासपुर जैसे बड़े जिले के एसपी रहने के बाद उन्हें जांजगीर का एसपी बना दिया गया। वो भी तब जब उनसे छह साल जूनियर बिलासपुर का एसपी था।

बीजेपी में बगावत?

15 साल सत्ता में रहने के बाद 15 सीटों पर सिमट आई भाजपा के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद पार्टी में असंतोष की खाई और चैड़ी हो गई है। इसकी एक ट्रेलर हाल ही में दिखा…राजधानी में पिछले हफ्ते बीजेपी के कुछ असंतुष्ट नेताओं की बैठक हुई। इनमें पिछली भाजपा सरकार के चार पूर्व मंत्री, तीन विधायक भी शामिल हुए। बताते हैं, वरिष्ठ नेताओं ने तय किया कि मरवाही विधानसभा उपचुनाव में वे कोई जिम्मेदारी नहीं उठाएंगे। नेताओं में इस बात का गुस्सा था कि उन्हें यूज एन थ्रो की तरह इस्तेमाल किया जाता है। पद देने का समय आता है तो वरिष्ठ नेताओं को कोई पूछता नहीं। और चुनाव में उपयोग करने प्रभारी बना दिया जाता है। चुनाव के नतीजे अगर पार्टी के पक्ष में रहा तो विजय रैली में बड़े नेता पहुुंच जाते हैं और अगर हार गए तो फिर प्रभारियों पर ठीकरा फोड़ दिया जाता है। दंतेवाड़ा और चित्रकोट विधानसभा उपचुनाव में ऐसा ही हुआ। बस्तर के नेताओं को छोड़कर शिवरतन शर्मा और नारायण चंदेल को प्रभारी बनाकर भेज दिया गया। बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि अब ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। अगर वास्तव में ऐसा हुआ तो मरवाही चुनाव में पार्टी की मुश्किलें बढ़ जाएगी।

ताबड़तोड़ छापे

ईओडब्लू, एसीबी में कोरोना और कुछ इंटरनल कारणों के कारण कुछ दिनों से छापे की कार्रवाई थमी हुई थी। इस बीच ईओडब्लू के चीफ भी बदल गए हैं। पता चला है, कुछ दिनों में भ्रष्ट अधिकारियों, कर्मचारियों के यहां ताबड़तोड़ छापे की कार्रवाई शुरू हो सकती है। ईओडब्लू, एसीबी चीफ आरिफ शेख को सरकार ने फ्री हैंड दे दिया है। इसके बाद एजेंसी के अफसरों ने होम वर्क शुरू कर दिया है।

डीपीसी में पेंच

लंबे समय से लटके डीजी की डीपीसी में लगता है अभी और वक्त लगेगा। बताते हैं, निलंबित आईपीएस मुकेश गुप्ता ने गृह विभाग को नोटिस दे दी है, डीपीसी में उन्हें भी शामिल किया जाए….भले ही प्रमोशन देने के बाद उनका नाम लिफाफा में बंद कर दिया जाए। सरकार अब लीगल ओपिनियन ले रही है। इसके बाद ही डीपीसी हो पाएगी। तब तक संजय पिल्ले, आरके विज और अशोक जुनेजा को डीजी बनने के लिए प्रतीक्षा करनी होगी। क्योंकि, अगर डीपीसी में मुकेश गुप्ता का नाम शामिल किया गया तो फिर अशोक जुनेजा के लिए पद नहीं बचेगा। डीजी के तीन ही पद हैं। अगर मुकेश गुप्ता का नाम डीपीसी से बाहर हुआ, तभी जुनेजा का नम्बर लग पाएगा।

लाल बत्ती की लाटरी

निगम, मंडलों की बंटने वाली रेवड़ी को लेकर कांग्रेस नेताओं की उत्सुकता चरम पर पहुंच गई है। हर आदमी जानने को उत्सुक है कि पहली सूची में किन-किनकी लाटरी लगती है। दरअसल, कांग्रेस पार्टी के बारे में धारणा है कि इसमें कुछ भी हो सकता है। नामंकन के आखिरी दिन बी फार्म तक बदल जाता है। 2018 के विधानसभा चुनाव के समय टिकिट वितरण में भी ऐसा ही हुआ था। कई दावेदारों को टिकिट मिलते-मिलते कट गई थी। इसलिए, लाल बत्ती के लिए जिसका नाम फायनल बताया जा रहा, वो भी पूरी तरह से अश्वस्त नहीं हैं। हां, ये जरूर संकेत मिल रहे हैं कि सब कुछ ठीक रहा तो दो-एक दिन में लिस्ट जारी हो सकती है।

12 संसदीय सचिव

निगम-मंडलों के साथ ही अब यह निश्चित हो गया है कि 12 संसदीय सचिव भी अपाइंट किए जाएंगे। उन्हें 12 मंत्रियों के साथ अटैच किया जाएगा। हालांकि, कांग्रेस संसदीय सचिवों के कंसेप्ट का विरोध करती रही है लेकिन, पार्टी के सामने मजबूरी यह है कि चुनाव में बम्पर मेजाॅरिटी आ गया। जितना सोचे, उससे कहीं अधिक। 90 में से 69 विधायक। इनमें कई मंत्री बनने की योग्यता रखते हैं। मगर मंत्री तो 12 ही हो सकते हैं। उससे अधिक नहीं। इसलिए, 12 विधायकों को संसदीय सचिव से संतुष्ट किया जा सकता है। वैसे भी मंत्रियों के लिए 12 ओएसडी के पद क्रियेट किए गए हैं। उनके पास पहले से एक-एक ओएसडी हैं ही। सरकार चाहे तो नए ओएसडी के पदों को संसदीय सचिवों को दिया जा सकता है। इससे संसदीय सचिवों के पद का वजन बढ़ जाएगा।

अब गुड़ गोबर नहीं

बड़ा प्रचलित मुहावरा था…बचपन से सुनते आए थे…गुड़ गोबर हो गया। लेकिन, छत्तीसगढ़ के संदर्भ में इसे बदलना पड़ेगा। अब गोबर पैसे में बिकेगा। मंत्रियों की समिति ने इसका रेट तय कर दिया है। और सीएस की अध्यक्षता में सचिवों की कमेटी फारमेट तैयार कर रही है। समझा जा सकता है, इससे गोबर की अहमियत। बीजेपी के लोग भी मान रहे हैं कि राजनीतिक तौर पर इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा।

वीरता को नमन

आज 12 जुलाई है….जुलाई का यह तारीख हर साल दिमाग में कौंध जाता है। 2009 में इसी दिन राजनांदगांव के जांबाज पुलिस कप्तान विनोद चौबे मदनवाड़़ा के माओवादी हमले में शहीद हो गए थे। बात सिर्फ शहादत की नहीं, और न ही यह कि नक्सली अटैक में वीरगति प्राप्त करने वाले विनोद चौबे देश के पहले एसपी थे। महत्वपूर्ण यह है कि विनोद ने जिस अदम्य वीरता का प्रदर्शन करते हुए नक्सलियों से लोहा लिया….अपने जवानों के साथ मोर्च पर डटे रहे, उसे आज भी लोग भूले नहीं है। एंबुश में उनके ड्राईवर को गोली लग गई थी। उन्होंने खुद गाड़ी चलाते हुए ड्राईवर को हेल्थ सेंटर तक पहुंचा आए। दूसरा कोई एसपी होता तो एंबुश में दोबारा नहीं लौटता। मगर विनोद ड्राईवर को छोड़कर फिर गाड़ी चलाते हुए घटनास्थल पर पहुंच गए, जहां उनके जवान एंबुश में फंसे हुए थे। अपनी जान की परवाह किए बिना कर्तव्य पथ पर शहीद हो जाने वाले विनोद चौबे की 10 बरस बाद पिछले साल उनकी जन्म स्थली बिलासपुर में वहां की नगर निगम ने आगे बढ़कर एक प्रतिमा स्थापित की। इसके अलावा और कहीं और कुछ नहीं। कायदे से स्कूली पाठ्यक्रम में उन पर चेप्टर होना चाहिए। ताकि, नौनिहालों को पता चले कि छत्तीसगढ़ में ऐसे बहादुर पुलिस अधिकारी भी थे। सभी जिलों की पुलिस लाईनों में उनकी प्रतिमा स्थापित करना चाहिए,…पुलिस के अधिकारी और जवान उसे देखकर गर्वान्वित महसूस कर सकें। सरकार को इस पर सोचना चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या लाल बत्ती देने के साथ ही मंत्रिमंडल में भी कोई बदलाव हो सकता है?
2. क्या गोबर खरीदी के फैसले से किसानों के साथ-साथ सरकार को साफ्ट हिन्दुत्व का लाभ मिलेगा?

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