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सरकार की मुश्किल

संजय के. दीक्षित
तरकश, 4 जुलाई 2021
छत्तीसगढ़ के सबसे सीनियर आईएएस और राजस्व बोर्ड के चेयरमैन सीके खेतान इस महीने 31 को रिटायर हो जाएंगे। खेतान के बाद इस पद पर किसे बिठाया जाए, सरकार को इसको लेकर अबकी किंचित परेशानी तो होगी। वजह है रेवन्यू बोर्ड चेयरमैन लायक अफसरों का बेहद कमी। यह पद चीफ सिकरेट्री के समकक्ष कैडर पोस्ट है। यानी एसीएस स्तर का। ये अलग बात है, पिछली सरकार में कई प्रमुख सचिवों को भी ये दायित्व सौंपा गया। बीएल अग्रवाल, केडीपी राव, अजयपाल सिंह, सभी प्रमुख सचिव थे। बहरहाल, सीनियर अफसर सरकार के पास हैं नहीं। एसीएस लेवल पर सिर्फ दो अफसर हैं। रेणु पिल्ले और सुब्रत साहू। सुब्रत चूकि सीएम के एडिशनल चीफ सिकरेट्री हैं इसलिए, उनका संभव नहीं। बचीं रेणु पिल्ले। उनके पास पंचायत विभाग है। प्रमुख सचिव में भी ज्यादा आप्शन नहीं है। मनोज पिंगुआ, गौरव द्विवेदी और मनिंदर कौर द्विवेदी। ये तीन ही पीएस हैं। सरकार अगर सिकरेट्री लेवल पर जाएगी तो एक नाम बिलासपुर कमिश्नर डाॅ0 संजय अलंग का हो सकता है। राजस्व बोर्ड का मुख्यालय भी बिलासपुर में ही है। वैसे, सरकार संविदा में भी किसी आईएएस की पोस्टिंग करने पर विचार कर सकती है। इसके लिए डायरेक्ट आईएएस से रिटायर में केवल एक नाम है…केडीपी राव। वहीं, प्रमोटी में कई हैं। वैसे, एक आप्शन रिटायर होने जा रहे सीके खेतान भी हो सकते हैं। हालांकि, रेवन्यू बोर्ड जमीन मामलों में फैसला देता है…उसका अपना कोर्ट होता है, लिहाजा संविदा का लोचा आ सकता है। फिर भी, सरकार कुछ भी कर सकती है। कुल मिलाकर शासन इन्हीं विकल्पों में से किसी नाम पर टिक लगाएगा।

किस्मत के धनी

सरकार ने बिलासपुर के प्रभारी आईजी रतनलाल डांगी को सरगुजा आईजी का एडिशनल प्रभार दिया है। वाकई इसे किस्मत ही कहना चाहिए। दीगर राज्यों में आईपीएस एक बार आईजी बनने के लिए टकटकी रहती है। और छत्तीसगढ ऐसा स्टेट बन गया है कि बिना आईजी बने डांगी अभी तक दुर्ग, सरगुजा, बिलासपुर के बाद अब बिलासपुर तथा सरगुजा की आईजीगिरी एक साथ। दरअसल, सरगुजा आईजी आरपी साय को हटाना था। और आईजी लेवल पर अफसरों का काफी टोटा है। ऐसे में, सरकार के पास कोई चारा नहीं था। अब अगले साल जनवरी में 2004 बैच जब आईजी प्रमोट हो जाएगा तब आईजी की काफी कुछ कमी दूर हो जाएगी। इस बैच में अजय यादव, नेहा चंपावत और संजीव शुक्ला हैं। बद्री मीणा और अभिषेक पाठक डेपुटेशन पर हैं। यदि ये दोनों लौट आए तो पांच आईजी हो जाएंगे। डाॅ0 आनंद छाबड़ा, सुंदरराज और रतनलाल डांगी हैं ही। तब ठीक-ठाक स्थिति बन जाएगी।

ट्रेक पर होना महत्वपूर्ण

कुछ दिन पहले कलेक्टर और एसपी के व्यापक तबादले हुए। इसमें कुछ अधिकारियों को बड़ा जिला मिला तो कुछ को बहुत छोटा। ब्यूरोक्रेसी में माना जाता है, छोटा, बड़ा जिला की बजाए ट्रेक पर बने रहना ज्यादा इम्पाॅर्टेंट होता है। कई ऐसे उदाहरण हैं कि बड़े जिले के बाद छोटे में पोस्टिंग हुई और फिर बड़ा जिला मिल गया। मुंगेली और अंबिकापुर जिले की कलेक्टर रहने के बाद किरण कौशल को पिछली सरकार में बालोद भेज दिया गया था। लेकिन, फिर वे कोरबा की कलेक्टर बनीं। दुर्ग कलेक्टर डाॅ0 सर्वेश भूरे का पहला जिला मुंगेली था। मंुगेली से सीधे वे वीवीआईपी जिले में आ गए। सर्वेश की डिमांड बिलासपुर के लिए भी हो रही थी। आरिफ शेख जांजगीर और धमतरी के एसपी रहने के बाद बालोद के कप्तान बनाए गए। उसके बाद वे एरोप्लेन के टेकआॅफ के समान उन्हीं पोस्टिंग मिली। बालोद के बाद बलौदा बाजार, बस्तर, बिलासपुर और फिर रायपुर के एसएसपी बनें। वेटिंग डीआईजी जीतेंद्र मीणा ने भी बालोद से सीधे बस्तर का जंप लगाया। इस तरह कह सकते हैं, जिन्हें छोटा जिला मिला है, वे मायूस न हों। जाहिर है, पारुल माथुर को बेमेतरा, मुंगेली और जांजगीर जिला करने के बाद गरियाबंद भेजा गया है। वहीं सदानंद को बलरामपुर और सरगुजा के बाद बालोद। संतोष सिंह भी कोंडागांव, महासमुंद के बाद रायगढ़ गए थे। और अब कोरिया के एसपी बनाए गए हैं।

अब नम्बर आईएएस का?

ढाई बरस होने के बाद सरकार अब एक्शन में है। सीनियर आईपीएस जीपी सिंह के यहां रेड के बाद अब एक आईएएस अफसर भी एसीबी के निशाने पर हैं। सूत्रों की मानें तो एसीबी ने साक्ष्य जुटाने शुरू कर दिए हैं। वैसे, जीपी के यहां छापे के बाद आईएएस, आईपीएस सकते में हैं। छत्तीसगढ़ में किसी आईएएस, आईपीएस के यहां एसीबी रेड नहीं पडा था। अब आईपीएस का खाता खुल गया है। ऐसे में जाहिर है, आईएएस का खौफ। सूबे के ईमानदार से ईमानदार आईएएस, आईपीएस के यहां छापा पड़ जाए, तो शामत आ जाएगी। ये बात छिपी नहीं है कि नया रायपुर, बिलासपुर रोड, धमतरी रोड, आरंग रोड पर 80 फीसदी से अधिक आईएएस, आईपीएस के फार्म हाउसेज हैं। राजधानी के कई हाउसिंग प्रोजेक्ट में अफसरों के पैसे इंवेस्ट हुए हैं। पिछली सरकार में एसीबी ने इस पर काफी होम वर्क किया था। वो सारा रिकार्ड एसीबी में सुरक्षित है।

कमजोर अफसर

राज्य पुलिस सेवा के लाख विरोध के बाद बीएसएफ से आए वायपी सिंह को आईपीएस अवार्ड हो गया। असल में, रापुसे का विरोध जुबानी जमा खर्च ज्यादा था। उन्हें 2005 बैच के राप्रसे अफसरों से टिप्स लेनी थी, किस तरह छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस का आर्डर पर वे सुप्रीम कोर्ट में रोक लगवा लिए। हरीश साल्वे जैसे देश के नामी वकील खड़े हुए। हरीश साल्वे के बारे में कहा जाता है, करोड़ से नीचे का वे कोई केस उनके पास जाता नहीं। राप्रसे अधिकारियों ने पिछले 10 साल में 10 करोड़ से ज्यादा फंड जुटाया। रायपुर से लेकर दिल्ली तक पैसा बहाया। रापुसे के अधिकारी यहीं पर गुटुर-पुटुर करते रह गए और धमंेंद्र छवई और वायपी सिंह दो सीट ले उड़े। अब पछताने से क्या होगा….?

व्हाट्सएप पर तलवारें

धमेंद्र और वायपी सिंह को डीपीसी में आईपीएस के लिए हरी झंडी मिलने की खबर जैसे ही बाहर आई, व्हाट्सएप ग्रुप में रापुसे अधिकारियों का गुस्सा फट पड़ा। वही….जुबानी जमा खर्च…मोबाइल पर कोई तलवार भांज रहा था तो कोई ग्रेनेड फेंक रहा था। उस दिन ऐसा लगा जैसे सारे रापुसे अधिकारी अब किसी को छोड़ेंगे नहीं, यूं दिल्ली गए और सुप्रीम कोर्ट से आर्डर ले आएंगे। अगले दिन सारा गुस्सा टांय-टांय फुस्स हो गया। मगर इसका एक फायदा अवश्य हुआ कि रापुसे के गुस्से की खबर उपर पहंुची और गृह विभाग ने अगले दिन डीएसपी से एडिशनल एसपी प्रमोशन की लिस्ट जारी कर दी।

लाल बत्ती फिर अटकी?

लाल बत्ती की दूसरी लिस्ट का ऐसा ग्रहण लगा है कि निकलते-निकलते अटक जा रही है। पिछले हफ्ते प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया के दौरे में लिस्ट फायनल होकर दिल्ली गई। लेकिन, एक बार कांग्रेस के लोग फिर आवाक हैं…आखिर ये हो कैसे जा रहा। सरकार के ढाई बरस निकल गए हैं। आचार संहिता के तीन महीने को छोड़ दें तो लगभग दो साल ही अब बचे हंै। लाल बत्ती के प्रबल दावेदारों की यह चिंता खाए जा रही है कि एक-एक दिन निकलता जा रहा है। जितना टाईम कम मिलेगा, कुछ कर गुजरने की संभावनाएं उतनी ही कम होती जाएंगी।

सस्पेंड क्यों नहीं?

डीजीपी डीएम अवस्थी के बेटे की शादी में 40 लोग जुटे। पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी की बेटी में गिनकर 15। विधानासभाध्यक्ष चरणदास महंत की बेटी की शादी कब हो गई, लोगों को पता भी नहीं चला। लेकिन, सूबे में कुछ ऐसे धनपशु हैं कि जिन्हें कोरोना गाइडलाइन से कोई वास्ता नहीं। बानगी है अंबिकापुर में शुक्रवार को हुई एक शादी। रिसेप्शन में गाड़ियों की एक किलोमीटर से ज्यादा लंबी कतार थी….दो हजार से अधिक लोगों की भीड़। सरगुजा में आज भी कोरोना के केस लगातार आ रहे है। ऐसे लोगों को मनमानी करने की छूट देने वाले अंबिकापुर के जिम्मेदार अफसरों को इसके लिए सस्पेंड क्यों नहीं कर देना चाहिए। तीसरी लहर से सूबे को बचाने कड़ा रुख अपनाना होगा, दरकार हो तो कौंवा मारकर भी टांगे। क्योंकि, जान बड़ी है….लोग बचेंगे तो वोट भी डालेंगे और सरकारें भी बनेंगी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. लाल बत्ती की लिस्ट अटकने के पीछे क्या वजह है?
2. एसपी के ट्रांसफर में सबसे अधिक फायदे में कौन आईपीएस रहा?

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