डीजी के प्रमोशन

संजय दीक्षित
तरकश, 13 सितंबर 2020

डीजी के प्रमोशन

डीजी की डीपीसी के बाद सरकार ने आज प्रमोशन आदेश जारी कर दिए। पिछले दिनों डीजी के तीन पदो के लिए डीपीसी हुई थी। लेकिन, इसमें सबसे अधिक उत्सुकता तीसरे पद को लेकर थी। संजय पिल्ले और आरके विज के प्रमोशन में कोई अड़चन नहीं थी। वे बेचारे तो आलरेडी डीजी बन चुके थे। मगर वे किसी और के ग्रह-नक्षत्र र्के शिकार हो गए। तीसरे पद के लिए मुकेश गुप्ता और अशोक जुनेजा तगड़े दावेदार थे। दूसरी बार हुई डीपीसी में भी एक सदस्य ने अपनी तरफ से बात रखी भी कि मुकेश गुप्ता को नजरअंदाज करके अशोक जुनेजा को डीजी प्रमोट करने में वैघानिक दिक्कते आएगी। 2009 में संतकुमार पासवान को रमन सरकार ने स्पेशल डीजी बना दिया था। भारत सरकार की फटकार के बाद पासवान को फिर एडीजी डिमोट किया गया। लेकिन, तब की परिस्थितियां अलग थी। उस समय पोस्ट भी नहीं थे। फिर, सरकार, सरकार होती है। उसके पास असीमित पावर होते हैं। सरकार ने दम दिखाया…मुकेश गुप्ता का लिफाफा बंद किया और आदेश जारी कर दिया।

बीरु बन गया डीजी

एडीजी अशोक जुनेजा का प्रमोशन भी पिछले साल से ड्यू था। आरपी मंडल के सीएस होने के बाद भी जुनेजा का काम बन नहीं पा रहा था। जाहिर है, मंडल और जुनेजा में अच्छी ट्यूनिंग रही है। कई जगहों पर एक साथ वे पोस्टेड रहे। लोग उन्हें जय-बीरु बोलते थे। मंडल का पुराना सपना था कि एक दिन हम दोनों सीएस और डीजी बनेंगे। मंडल तो सीएस बन गए लेकिन, जुनेजा का मामला गड़बड़ा जा रहा था। सीएम ने डीपीसी को आज हरी झंडी देकर अब जुनेजा का रास्ता क्लियर कर दिया है।

हाॅटस्पाॅट क्यों?

राजधानी रायपुर में कोरोना से स्थिति चिंतनीय होती जा रही है। मंत्रालय समेत सरकारी कार्यालयों के हालत ठीक नहीं है। हर जगह कोरोना का संक्रमण बढ़ गया है। हैरत इस बात की है कि इंदौर, भोपाल जैसे शहरों ने हालत बेकाबू होने के बाद भी स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया। लेकिन, रायपुर में उल्टा हो रहा। सरकार में बैठे लोग भी मानते हैं कि कोरोना से जिस तरह निबटना था, वैसा हुआ नहीं। खासकर लाॅकडाउन खुलने के बाद। लाॅकडाउन के बाद तो लोग ऐसे सड़कों पर निकल पड़े कि कोरोना-वोरोना जैसा कुछ रह नहीं गया है। अफसरों ने भी गाइडलाइन जारी कर अपना कर्तव्य खतम समझ लिया। अरे भाई! ये इंडिया है। यहां जब तक कड़ाई नहीं होगी, तब तक लोगों को अपना नुकसान भी नहीं समझ में आता…आखिर, सरकार कुछ कह रही है तो उनके भले के लिए है। बात बड़ी सीधी सी है। राजधानी में अगर थोड़ी सी भी कड़ाई बरती गई होती तो आज ये हालत नहीं होते।

एम्स पर दोहरी मार

कोरोना काल में कोई सबसे अधिक फेस कर रह है तो वे हैं एम्स के डायरेक्टर डाॅ0 नीतिन नागरकर। खाने-पीने की बढ़ियां व्यवस्था, बेहतर इलाज और वो भी बिना पैसे का। ऐसे में, रायपुर ही नहीं बल्कि सूबे के कोरोना संक्रमित हर आदमी का पहला प्रयास रहता है कि किसी तरह एम्स में भरती होने का जुगाड़ बैठ जाए। डाॅ0 नागरकर के सामने दिक्कत यह है कि किसकी सिफारिश ठुकराए। कांग्रेस के लोग बोलते हैं, हमारी सरकार में हमारी नहीं सुनी जाएगी तो फिर कईसे काम चलेगा। और, उधर भाजपाई बोलते हैं, एम्स तो भारत सरकार का है, इसलिए प्राथमिकता उन्हें मिलनी चाहिए। पूर्व हेल्थ मिनिस्टर और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहे हैं। सो, छोटे-बड़े लगभग सभी नेताओं के पास नड्डा जी और नड्डाजी के पीए का नम्बर है। लिहाजा, भाजपा के लोग सीधे दिल्ली फोन लगा दे रहे। इस सिचुएशन में समझा जा सकता है एम्स के डायरेक्टर की स्थिति क्या होगी। ऐसे में, वास्तविक लोगों को कोरोना का लाभ नहीं मिल पा रहा और जिन्हें कोई सिन्टम नहीं है, वे एम्स में भरती हो जा रहे। इसी चक्कर में राजधानी के एक युवा कांग्रेस नेता ने एम्स में अच्छा-खासा बवाल खड़ा कर दिया। ये अच्छा है कि सीएम भूपेश बघेल ने अब स्पष्ट आदेश दे दिया है कि सिफारिशों की जगह जरूरतमंदों को प्राथमिकता दिया जाए। सिस्टम को सीएम के इस आदेश को क्रियान्वित कराना चाहिए।

बड़ी देर कर दी

एसीएस रेणु पिल्ले ने हेल्थ विभाग की जिम्मेदारी संभाल ली है। उन्होेंने सिस्टम में कसावट लाने का प्रयास प्रारंभ कर दिया है। सुबह से लेकर देर रात वे अधिकारियों से फाॅलोअप ले रहीं हैं। लेकिन, ऐसे समय में वे हेल्थ की कमान संभाली हैं…जब मामला काफी आगे बढ़ गया है। ऐसा भी नहीं है कि हेल्थ में अफसरों की कमी है। सिकरेट्री से लेकर ओएसडी तक आधा दर्जन से अधिक आईएएस इस विभाग में हैं। डायरेक्टर आईएएस, एनआएचएम एमडी आईएएस और मेडिकल कारपोरेशन का एमडी भी आईएएस। इसके अलावा सरकार ने चार आईएएस को ओएसडी भी बनाया है। बावजूद इसके हेल्थ अफसरों में वो तालमेल दिखा नहीं। हेल्थ वालों ने किसी की सुनी भी तो नहीं। मंत्रालय में डाॅ0 आलोक शुक्ला जैसे आईएएस हैं, जो दो बार हेल्थ सिकरेट्री रह चुके हैं। ऐसा पता चला है कि उन्होंने दो-एक मौकों पर कुछ सलाह देने की कोशिश की तो उनकी बात को भी अनसूनी कर दी गई। अंबिकापुर मेडिकल कालेज को एमसीआई का परमिशन रुका पड़ा है। जबकि, आलोक के बैचमेट एमसीआई के सिकरेट्री हैं। लेकिन, इसमें भी मदद नहीं ली गई। हेल्थ विभाग के अधिकारी अपने मंत्री के क्षेत्र के काॅलेज को परमिशन नहीं दिला सकते तो फिर कोई मतलब ही नहीं है। हेल्थ विभाग के अधिकारियों की आत्ममुग्धता ने विभाग का बड़ा नुकसान किया।

किरण क्यों सहम गई…

राज्य महिला आयोग की चेयरमैन किरणमयी नायक पेशे से वकील हैं। तेज-तर्रार नेत्री भी। महापौर रहते भी उनके काम को लोगों ने देखा है। मगर हैरानी है कि रायपुर मेडिकल काॅलेज के एक सीनियर डाक्टर के खिलाफ वहीं की एक पीजी छात्रा ने यौन शोषण का कांप्लेन किया तो 24 घंटे तक उसकी खबर बाहर नहीं आ पाई। आई भी तो आयोग का कोई जिम्मेदार आदमी इस पर सीधे बात करने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। इतने गंभीर मामले पर चुप्पी क्यों? आखिर, क्या हो गया किरणमयी नायक को? ऐसी तो नहीं थी किरणमयी। कुर्सी मिलने के बाद प्रभाव बढ़ जाता है, ये तो उल्टा हो रहा है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. आईपीएस अशोक जुनेजा डीजी प्रमोट हो गए हैं, इसके आगे अब क्या होगा?
2. मोतीलाल वोरा और ताम्र्रध्वज साहू के कांग्रेस वर्किंग कमेटी से ड्राॅप करने और पीएल पुनिया को छत्तीसगढ़ प्रभारी रिपीट करने के क्या मायने हैं?

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