Ujjain Mahakal Bhasm Aarti Today : महाकाल दरबार में भस्म आरती के साथ नए साल का आगाज, आप भी घर बैठे दर्शन के साथ करें दिन की शुरुआत
नए साल 2026 के स्वागत में आज पूरी दुनिया जश्न मना रही है, लेकिन बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन का नजारा कुछ निराला ही है।

Ujjain Mahakal Bhasm Aarti Today : महाकाल दरबार में भस्म आरती के साथ नए साल का आगाज, आप भी घर बैठे दर्शन के साथ करें दिन की शुरुआत
Mahakal Bhasm Aarti New Year 2026 : उज्जैन। 1 जनवरी : नए साल 2026 के स्वागत में आज पूरी दुनिया जश्न मना रही है, लेकिन बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन का नजारा कुछ निराला ही है। साल के पहले दिन, आज सुबह विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में अलसुबह भस्म आरती के साथ नव वर्ष का भव्य स्वागत किया गया। कड़ाके की ठंड और सुबह के कोहरे के बीच हजारों भक्तों ने कतारबद्ध होकर बाबा के दिव्य दर्शन किए। ढोल-नगाड़ों और शंखध्वनि के बीच जब गर्भगृह में भस्म रमाई गई, तो पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।
Mahakal Bhasm Aarti New Year 2026 : भस्म आरती में उमड़ा आस्था का सैलाब आज तड़के 3 बजे मंदिर के पट खुलते ही बाबा महाकाल का विशेष अभिषेक और श्रृंगार किया गया। भस्म आरती के दौरान बाबा को ताजे पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराया गया। इसके बाद भगवान शिव का भांग, चंदन और सूखे मेवों से मनमोहक दिव्य श्रृंगार हुआ। जब महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा को भस्म अर्पित की गई, तो भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा था। नए साल के पहले दिन बाबा के इस मंगलकारी स्वरूप के दर्शन कर भक्त भाव-विभोर हो गए।
आज दिनभर का आरती और दर्शन का शेड्यूल
अगर आप आज बाबा महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन पहुँच रहे हैं या घर बैठे मानसिक दर्शन करना चाहते हैं, तो मंदिर में दिनभर होने वाली प्रमुख आरतियों को भी जानें नैवेद्य आरती, भस्म आरती के बाद सुबह लगभग 7:30 से 8:15 बजे के बीच नैवेद्य आरती संपन्न होगी। भोग आरती, दोपहर 10:30 बजे बाबा को विशेष महाभोग लगाया जाएगा और भोग आरती होगी। संध्या पूजा और आरती, शाम 5:00 बजे संध्या पूजा शुरू होगी, जिसके बाद शाम 6:30 से 7:15 बजे तक संध्या आरती की जाएगी।शयन आरती, रात 10:30 बजे बाबा की अंतिम आरती यानी शयन आरती होगी, जिसके बाद साल के पहले दिन का समापन होगा।
भक्तों की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम
नए साल की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम किए हैं। भस्म आरती के लिए विशेष अनुमति और सुगम दर्शन के लिए चलित भस्म आरती की व्यवस्था भी की गई है। श्रद्धालुओं के लिए पेयजल और शेड्स की व्यवस्था की गई है ताकि कोहरे और ठंड में उन्हें परेशानी न हो। भगवान भोलेनाथ के भक्तों के लिए महाकाल लोक को भी भव्य रूप से सजाया गया है, जहाँ श्रद्धालु दर्शन के बाद नए साल की खुशनुमा यादें संजो रहे हैं।
जानें बाबा महाकाल मंदिर का गौरवशाली इतिहास, क्यों कहलाता है यह धरती का नाभि केंद्र
उज्जैन। भारत के सात मोक्षदायिनी नगरों में से एक अवंतिका यानी उज्जैन, भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री महाकालेश्वर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। महाकाल का अर्थ है समय के अधिपति। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान महाकाल को काल का भी काल माना गया है, जिनकी आज्ञा के बिना समय का चक्र भी नहीं हिलता। यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय संस्कृति और गौरवशाली वास्तुकला का अनुपम उदाहरण भी है।
सतयुग से जुड़ा है प्राचीन इतिहास
पुराणों के अनुसार, महाकाल मंदिर की स्थापना सतयुग में हुई थी। 'शिव पुराण' और 'स्कंद पुराण' के अवंतिका खंड में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि जब दूषण नामक राक्षस ने अवंतिका के ब्राह्मणों पर अत्याचार किया था, तब भगवान शिव धरती फाड़कर प्रकट हुए थे और उस दुष्ट का संहार किया था। भक्तों की प्रार्थना पर भोलेनाथ वहीं लिंग रूप में विराजमान हो गए, जिसे 'स्वयंभू' ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। खास बात यह है कि यह एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है, जिसे तंत्र साधना और मोक्ष की दृष्टि से अत्यंत फलदायी माना जाता है।
जब मुगलों ने किया हमला और मराठों ने किया पुनरुद्धार
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि महाकाल मंदिर ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 13वीं शताब्दी लगभग 1234-35 ई में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने उज्जैन पर हमला कर प्राचीन मंदिर को तहस-नहस कर दिया था। उस दौरान मंदिर के मूल शिवलिंग को बचाने के लिए उसे पास के ही कोटि तीर्थ कुंड में छिपा दिया गया था। लगभग 500 सालों तक मंदिर की स्थिति जर्जर रही। इसके बाद 18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य के पेशवा बाजीराव और उनके सेनापति राणोजी शिंदे ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया और इसे पुनः अपना खोया हुआ वैभव वापस दिलाया।
खगोल विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत संगम
महाकाल मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारत के विज्ञान का भी केंद्र रहा है। प्राचीन काल में उज्जैन को दुनिया की शून्य रेखा माना जाता था। खगोल शास्त्रियों के अनुसार, महाकाल मंदिर पृथ्वी के नाभि केंद्र पर स्थित है। यहाँ से कर्क रेखा गुजरती है। यही कारण है कि उज्जैन को काल गणना का मुख्य स्थान माना गया और यहाँ के राजा महाकाल को 'काल के अधिपति' के रूप में पूजा जाने लगा।
भस्म आरती और परंपराओं की विरासत
महाकाल मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा भस्म आरती है। कहा जाता है कि पहले यह आरती श्मशान की ताजी भस्म से की जाती थी, लेकिन अब गाय के गोबर से बने कंडे की भस्म का उपयोग होता है। मंदिर की संरचना तीन खंडों में विभाजित है, सबसे नीचे महाकालेश्वर, मध्य में ओंकारेश्वर और सबसे ऊपर नागचंद्रेश्वर विराजित हैं। नागचंद्रेश्वर के दर्शन साल में केवल एक बार नागपंचमी के दिन ही होते हैं, जो इस मंदिर के रहस्य और गौरव को और बढ़ाता है।
