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छत्तीसगढ़ का प्रयाग "राजिम": चार धाम की यात्रा का पुण्य एक साथ यहीं आकर प्राप्त कर लीजिए, देखिए प्रसाद की थाली पर भगवान विष्णु के हाथों की छाप

छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम: चार धाम की यात्रा का पुण्य एक साथ यहीं आकर प्राप्त कर लीजिए, देखिए प्रसाद की थाली पर भगवान विष्णु के हाथों की छाप
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By NPG News

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राजिम... छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में सोंढूर-पैरी-महानदी के संगम पर बसे इस नगर को "छत्तीसगढ़ का प्रयाग" भी कहा जाता है। कहते हैं कि अगर आप चार धाम की यात्रा नहीं कर पा रहे हैं तो यहां चले आएं क्योंकि यहां आने पर चारों धाम की यात्रा एक साथ हो जाती है। राजिम की शान है राजीव लोचन मंदिर। त्रिवेणी संगम पर स्थित राजीव लोचन मंदिर के चारों कोनों में भगवान विष्णु के चारों रूप दिखाई देते हैं। कहते हैं कि इस मंदिर में भगवान विष्णु सुबह बाल्‍यवास्‍था में, दोपहर में युवावस्‍था में और रात्रि में वृद्धावस्‍था में द‍िखाई देते हैं। और तो और वे अब भी यहां विश्राम करने आते हैं। उनके लिए बनाए गये शयन कक्ष की चादरों में पड़ी सिलवटें इसकी गवाह हैं। साथ ही प्रसाद की थाली में उनके हाथों की छाप भी साफ नज़र आती है। राजिम में प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक व‍िशाल मेले का आयोजन होता है।पवित्र स्नान में शामिल होने के लिए साधु-संत और आमजन दूर-दूर से राजिम आते हैं। आइए राजिम को और करीब से जानते हैं।

कैसे पड़ा इस नगर का नाम 'राजिम'

कहते हैं कि इस नगर में राजिम नामक एक गरीब धार्मिक स्वभाव की तेलिन महिला थी।

एक दिन तेल बेचने जाते वक्त एक पत्थर से उसका पैर टकरा गया और उसके सिर पर रखा तेल का पात्र गिरने से तेल बह गया। वह भगवान से प्रार्थना करने लगी कि सास और पति के प्रकोप और दंड से उसकी रक्षा करें। तभी उसने देखा कि पात्र फिर तेल से लबालब भरा गया हो। इसके बाद उसने स्थान को सावधानीपूर्वक खोदकर पत्थर को भूमि से ऊपर निकाला तो क्या देखा कि वह पत्थर तो भगवान विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमा है। उसने वापस लौटकर वह प्रतिमा अपने कमरे में प्रतिष्ठित कर दी और रोज उनकी पूजा करने लगी।

एक दिन यहाँ के शासक विलासतुंग को स्वप्न में आदेश हुआ कि राजिम में भगवान विष्णु का भव्य मंदिर निर्माण करवाएं। राजा ने बड़े जतन से मंदिर बनवाया। तब लोगों ने उन्हें बताया कि राजिम तेलिन के घर में एक मूर्ति पहले से विराजमान है और उनके आशीर्वाद से तेलिन का जीवन बदल गया है। राजा को भी लगा कि सचमुच इस मंदिर के लायक वही मूर्ति हो सकती हैं जो पहले से ही सजीव है, जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष है। राजा स्वर्ण मुद्राओं का थाल भरकर राजिम के पास गया लेकिन राजिम मूर्ति देने को राजी नहीं हुईं। राजा के बहुत आग्रह पर तेलिन ने कहा कि मुझे धन-सम्पत्ति का लोभ नहीं। आप पूर्ण श्रृद्धा से मंदिर में प्रतिमा स्थापित करा दें। हाँ यदि हो सके तो भगवान के इस तीर्थ के साथ मेरा नाम भी कहीं जुड़ जाए तो अच्छा हो। उनकी इच्छा के अनुरूप राजा ने इस तीर्थ नगर का नाम "राजिम " रखना नियत किया। भगवान विष्णु की प्रतिमा के साथ वह मंदिर राजीव लोचन के नाम से विख्यात हुआ।

कैसा है राजीव लोचन मंदिर

आठवीं-नौवीं सदी के इस प्राचीन मंदिर में बारह स्तंभ हैं।आयताकार क्षेत्र के मध्य स्थित मंदिर के चारों कोण में श्री वराह अवतार, वामन अवतार, नृसिंह अवतार तथा बद्रीनाथ जी का धाम है। सुंदर नक्काशीदार पत्थर के स्तंभों पर अष्ठभुजा वाली दुर्गा, गंगा, यमुना और भगवान विष्णु के अवतार राम, नृसिंह भगवान के चित्र हैं।

गर्भगृह में पालनकर्ता लक्ष्मीपति भगवान विष्णु की श्यामवर्णी चतुर्भुजी मूर्ति है जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है। 12 खंभों से सुसज्जित महामंडप में श्रेष्ठ मूर्तिकला का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। आसन लगाकर बैठे भगवान श्री राजीवलोचन की प्रतिमा आदमकद मुद्रा में सुशोभित है।

शिखर पर मुकुट, कर्ण में कुण्डल, गले में कौस्तुभ मणि के हार, हृदय पर भृगुलता के चिह्नांकित, देह में जनेऊ, बाजूबंद, कड़ा व कटि पर करधनी का अंकन है। राजीव लोचन का स्वरूप दिन में तीन बार बाल्यकाल, युवा व प्रौढ़ अवस्था में समयानुसार बदलता रहता है। आपको बताएं कि मंदिर के अहाते में आज भी एक स्थान राजिम माता के लिए सुरक्षित है।

कुलेश्वर महादेव मंदिर-

यह एक द्वीप स्थल है जो कि पैरी और महानदी नदियों के संगम पर है,यहां के प्रसिद्ध शिव मंदिर का नाम कुलेश्वर महादेव मंदिर है। मंदिर एक अष्टकोणीय आकार के मंच पर बना हुआ है और इसकी ऊंचाई लगभग 17 फीट है। मंदिर की वास्तुकला अतुलनीय है। कहा जाता है कि वनवास काल में श्रीराम ने इस स्थान पर अपने कुलदेवता महादेवजी की पूजा की थी। कुलेश्वर महादेव मंदिर का न‍िर्माण 8-9 वीं शताब्दी में हुआ था। आपको जानकर हैरानी होगी वर्ष 1967 में राजिम में जब बाढ़ आई थी तब यह मंदिर पूरा डूब चुका था। केवल कलश भाग दिखाई देता था। लेकिन पानी नीचे उतरने के बाद देखा गया कि मंंद‍ि‍र को कोई नुकसान नहीं हुआ।एक और अचंभित करने वाला तथ्य यह है कि इस मंदिर के शिवलिंग में पैसा चढ़ाने पर वह नीचे चला जाता है और उसकी प्रतिध्वनि गूंजित भी होती है।

रामचंद्र मंदिर-भगवान

श्री राम को समर्पित इस मंदिर का निर्माण लगभग 400 साल पहले गोविंद लाल द्वारा किया गया था, जिन्हें रायपुर का एक बैंकर माना जाता था। बताया जाता है कि इस मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त सामग्री सिरपुर के मंदिर के खंडहरों की है।

आसपास देखने योग्य स्थान

चंपारण-यह शहर पहले चम्पारण्य नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ है चम्पक (चम्पा फूल) का अरण्य (जंगल)। यह चम्पक का अरण्य 18 एकड़ में फैला हुआ है। राजिम से यह 15 किमी की दूरी पर स्थित है।यहाँ चम्पकेश्वर महादेव का मंदिर है। चंपकेश्वर महादेव को तत्पुरुष महादेव भी कहा जाता है। चंपारण वैष्णव पीठ के लिए एक प्रसिद्ध स्थान है जो वास्तव में संत वल्लभाचार्य का जन्मस्थान है, मंदिर के शिलालेख संगमरमर से निर्मित हैं, शांति का अनुभव देने के लिए यह एक अद्भुत स्थान है।

सिकासार जलाशय

सिकासार जलाशय जिला मुख्यालय से 50 किमी की दुरी पर स्थित है यहाँ पर सभी मौसम मे पहुच योग्य है । सिकासार जलाशय का निर्माण सन 1977 मे पुर्ण हुआ । सिकासार बाँध की लबाई 1540 मी. एवं बाँध मी अधिकतम उंचाई 9.32 मी. है।

भूतेश्वरनाथ मंदिर

गरियाबंद से 3 किलो मीटर दूर घने जंगलों के बीच बसा है ग्राम मरौदा। सुरम्य वनों एवं पहाडियों से घिरे अंचल में प्रकृति प्रदत्त विश्व का सबसे विशाल शिवलिंग विराजमान है।कहते हैं कि इस शिवलिंग का आकार हर साल और बढ़ जाता है। यह शिवलिंग प्राकृतिक रूप से निर्मित है। हर साल महाशिवरात्रि और सावन सोमवार को लंबी पैदल यात्रा करके कांवरिए यहां पहुंचते हैं।

आप इनका भी लुत्फ उठा सकते हैं -

राजिम लोचन महोत्सव

भगवान विष्णु को समर्पित यह महोत्सव राजीव लोचन मंदिर में हर साल आयोजित होता है।यह वार्षिक उत्सव माघ पूर्णिमा से पंचांग के अनुसार हिंदू कैलेंडर के अनुसार शिवरात्रि तक आयोजित किया जाता है। छत्तीसगढ़ के पर्यटन मंत्रालय द्वारा राजिम लोचन महोत्सव मेले का आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाता है, ताकि लोगों को राज्य की सर्वश्रेष्ठ वास्तुकला और संस्कृति की जानकारी मिल सके। यह मेला लोक कलाकारों के लिए भी पर्यटकों और स्थानीय लोगों के सामने अपनी प्रतिभा और कला दिखाने का एक बड़ा अवसर है। यहां, आप लोक नृत्य, संगीत, नाटक प्रदर्शन सहित बहुत कुछ देखेंगे।

पंचकोसी यात्रा-राजिम में पंचकोसी की यात्रा हर साल कार्तिक अग्राहन से पौष माघ तक चलती रहती है। यह पंचकोसी यात्रा कुलेश्वर नाथ मंदिर से शुरु होती है।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग- राजिम का निकटतम हवाई अड्डा स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डा ​​रायपुर है जो राजिम से सिर्फ 43 किलोमीटर दूर है।यहाँ से बस या टैक्सी से राजिम पहुंचना बहुत आसान है।

रेल मार्ग- राजिम रेलवे स्टेशन निकटतम रेलवे स्टेशन है,जो छत्तीसगढ़ राज्य के अन्य पड़ोसी क्षेत्रों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। अन्य निकटतम रेलवे स्टेशन रायपुर रेलवे स्टेशन है।

सड़क मार्ग-राजिम अच्छी तरह से विभिन्न शहरों से सड़कों से जुड़ा हुआ हैं।

कहाँ ठहरें

गरियाबंद में पीडब्ल्यूडी का सर्किट हाउस है। सरकारी रेस्ट हाउस और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट का रेस्ट हाउस भी है। अनेक निजी होटलों में से भी आप अपनी पसंद अनुसार चयन कर सकते हैं।

राजिम का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व पर्यटकों को अपनी ओर सहज ही खींचता है। मान्‍यता है क‍ि जगन्‍नाथपुरी की यात्रा उस समय तक संपूर्ण नहीं होती जब तक राज‍िम की यात्रा न कर ली जाए। आप भी राजिम की यात्रा का प्लान बना सकते है। अक्टूबर से मार्च का समय यहां की यात्रा के लिए सबसे अच्छा कहा जाता है। वैसे आप अपनी सुविधानुसार कभी भी राजिम जा सकते हैं।

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