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Cherchera Punni Mela in Turturiya : छत्तीसगढ़ में यहाँ लगता है छेरछेरा पुन्नी मेला, जानिए क्या है यहाँ की खासियत और महत्ता

Cherchera Punni Mela in Turturiya : यह मेला संतान प्राप्ति की कामना के लिए प्रसिद्ध है, जहां प्रदेश भर से लाखों श्रद्धालु माता गढ़ के पहाड़ी मंदिर में दर्शन करने पहुंचते हैं।

Cherchera Punni Mela in Turturiya : छत्तीसगढ़ में यहाँ लगता है छेरछेरा पुन्नी  मेला, जानिए क्या है यहाँ की खासियत और महत्ता
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By Meenu Tiwari

Cherchera Punni Mela in Turturiya : छत्तीसगढ़ में आज जोर-शोर से छेरछेरा पुन्नी तिहार मनाया जा रहा है. आज के दिन छत्तीसगढ़ में धान के फसल की कटाई के बाद धान के घर आने की खुशी में त्यौहार मनाया जाता है. इन्हीं सब के बीच छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले के कसडोल विकासखंड में स्थित तुरतुरिया मेला हर वर्ष पौष पूर्णिमा के दिन आयोजित किया जाता है। यह मेला संतान प्राप्ति की कामना के लिए प्रसिद्ध है, जहां प्रदेश भर से लाखों श्रद्धालु माता गढ़ के पहाड़ी मंदिर में दर्शन करने पहुंचते हैं।


मान्यता है कि इस स्थान पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था और यह लव-कुश की जन्मस्थली भी मानी जाती है। यहां बहने वाली बलभद्र नदी के ऊपर मातागढ़ की पहाड़ी में स्थित मंदिर में लोग पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना करते हैं।

संतान प्राप्ति की कामना से आते हैं लोग

यह मेला न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को भी संजोए हुए है। श्रद्धालु अपनी संतान प्राप्ति की कामना से यहां आते हैं और माता रानी के दर्शन कर अपनी मन्नतें पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। वर्षों पुरानी इस धार्मिक परंपरा के चलते तुरतुरिया मेला हर साल श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है।

यहाँ स्थित है तुरतुरिया


तुरतुरिया बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 29 किमी की दूरी पर स्थित इस स्थल को सुरसुरी गंगा के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थल प्राकृतिक दृश्यों से भरा हुआ एक मनोरम स्थान है, जो कि पहाड़ियों से घिरा हुआ है। सिरपुर- कसडोल मार्ग से ग्राम ठाकुरदिया से 6 किमी पूर्व की ओर तथा बारनवापारा से 12 किमी पश्चिम की ओर स्थित है.




इसलिए पड़ा तुरतुरिया नाम


त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं पर था और लवकुश की यही जन्मस्थली थी। इस स्थल का नाम तुरतुरिया पडऩे का कारण यह है कि बलभद्री नाले का जलप्रवाह चट्टानों के माध्यम से होकर निकलता है तो उसमें से उठने वाले बुलबुलों के कारण तुरतुर की ध्वनि निकलती है। जिसके कारण उसे तुरतुरिया नाम दिया गया है। इसका जलप्रवाह एक लम्बी संकरी सुरंग से होता हुआ आगे जाकर एक जलकुंड में गिरता है, जिसका निर्माण प्राचीन ईटों से हुआ है। जिस स्थान पर कुंड में यह जल गिरता है वहां पर एक गाय का मुख बना दिया गया है, जिसके कारण जल उसके मुख से गिरता हुआ दृष्टिगोचर होता है। गोमुख के दोनों ओर दो प्राचीन प्रस्तर की प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो कि विष्णु जी की हैं। इनमें से एक प्रतिमा खडी हुई स्थिति में है तथा दूसरी प्रतिमा में विष्णुजी को शेषनाग पर बैठे हुए दिखाया गया है। कुंड के समीप ही दो वीरों की प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं बनी हुई हैं, जिनमें क्रमश: एक वीर एक सिंह को तलवार से मारते हुए प्रदर्शित किया गया है, तथा दूसरी प्रतिमा में एक अन्य वीर को एक जानवर की गर्दन मरोड़ते हुए दिखाया गया है। इस स्थान पर शिवलिंग काफी संख्या में पाए गए हैं, इसके अतिरिक्त प्राचीन पाषाण स्तंभ भी काफी मात्रा में बिखरे पड़े हैं जिनमें कलात्मक खुदाई किया गया है।

प्रचलित कथा


तुरतुरिया के बारे मे कहा जाता है, कि भगवान श्री राम द्वारा परित्याग करने पर वैदेहि सीता को फिंगेश्वर के समीप सोरिद अंचल ग्राम के (रमई पाठ ) मे छोड़ गये थे वहीं माता का निवास स्थान था। सीता की प्रतिमा आज भी उस स्थान पर है। जब सीता के बारे मे महर्षि वालमिकी को पता चला तो उन्हें अपने साथ तुरतुरिया ले आये और सीता यही आश्रम में निवास करने लगी ,यहीं लव कुश का जन्म हुआ।

Meenu Tiwari

मीनू तिवारी 2009 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और प्रिंट व डिजिटल मीडिया में अनुभव रखती हैं। उन्होंने हरिभूमि, पत्रिका, पेज 9 सहित क्लिपर 28, लल्लूराम, न्यूज टर्मिनल, बोल छत्तीसगढ़ और माई के कोरा जैसे प्लेटफॉर्म्स पर विभिन्न भूमिकाओं में काम किया है। वर्तमान में वे एनपीजी न्यूज में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं।

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