क्या आपको पता है भगवान शिव की सवारी नंदी के पिता कौन है? जानिए नंदी को हमेशा शिव मंदिर में गर्भगृह के बाहर ही क्यों स्थापित किया जाता है?
नंदी हमेशा शिवलिंग के सामने और गर्भगृह के बाहर ही क्यों स्थापित किए जाते हैं और नंदी का मुख भगवान शिव के तरफ ही क्यों होता है। आज हम इन्हीं सभी रहस्यों से पर्दा उठाने वाले हैं।

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Shiv Mandir mein Nandi ko Bahar hi kyon sthapit Kiya jata hai: सनातन धर्म में भगवान शिव का विशेष स्थान है। देवों और दानवों से लेकर जानवरों तक सभी प्राणी शिव जी की आराधना करते है। जब भी आप कहीं शिव मंदिर जाए तो वहां आपको एक चीज जरूर दिखाई देगी वह है बैल रूपी नंदी की प्रतिमा, जो भगवान शिव के गर्भगृह के बाहर ठीक सामने विराजमान होता है। अधिकतर लोग भगवान शिव की पूजा करते हैं और फिर नंदी की पूजा करके घर चले आते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि नंदी हमेशा शिवलिंग के सामने और गर्भगृह के बाहर ही क्यों स्थापित किए जाते हैं और नंदी का मुख भगवान शिव के तरफ ही क्यों होता है। आज हम इन्हीं सभी रहस्यों से पर्दा उठाने वाले हैं।
कौन है नंदी और कहां से हुआ इनका जन्म
नंदी के जन्म को लेकर एक कथा काफी प्रचलित है। एक समय शिलाद (Shilada Rishi) नाम के महान ऋषि हुआ करते थे और वे अपने वंश के केवल एक ही व्यक्ति बचे थे, चूंकि वे ब्रह्मचारी ऋषि थे इसलिए उन्होंने विवाह व संतान न करने का प्रण किया हुआ था। उनके पूर्वजों द्वारा भी इस बात को लेकर उन्हें कई बार समझाया गया। फिर उन्होंने इस समस्या का हल निकालने के लिए भगवान इंद्र का अनुसरण किया और उनसे एक ऐसे बच्चों की मांग की जो जन्म–मृत्यु से परे हो। लेकिन भगवान इंद्र से संतुष्ट न होने पर वे भगवान शिव की कठोर तपस्या में लीन हो गए। इनकी तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने स्वयं को उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। इसी वरदान के फलस्वरुप धरती से एक दिव्य बालक का जन्म हुआ जिसे ऋषि ने नंदी नाम दिया।
नंदी कैसे बने भगवान शिव के वाहन
भगवान शिव का अंश होने के वजह से नंदी शुरुआत से ही आध्यात्मिक कार्यों में लीन रहता था। अपने पिता ऋषि शिलाद से उसने शिष्टाचार और वेदों का ज्ञान लिया। आश्रम में एक दिन ऐसी घटना घटी जो ऋषि और नंदी दोनों को चौंकाने वाली थी तो होता यह है कि आश्रम में दो महान ऋषि मित्र और वरुण पधारते है और उन्होंने नंदी को देखकर ही यह बता दिया कि इस धरती पर नंदी की आयु बहुत ही कम समय के लिए है। यह सुनकर ऋषि शिलाद काफी भावुक हो गए और नंदी को कहा कि जिस प्रकार से तुम्हारे प्राण भगवान शिव ने दिए हैं उसी प्रकार तुम्हारे प्राणों की रक्षा भी भगवान शिव ही करेंगे।
नंदी को भी यह बात समझ आ गई थी और उसने बिना देरी किए भगवान शिव की कठोर तपस्या शुरू कर दी। वर्षों की तपस्या के बाद भगवान शिव प्रसन्न हुए और नंदी से वरदान मांगने को कहा। वरदान मांगने के मामले में नंदी भी काफी चतुर निकले उन्होंने भगवान शिव से अपनी लंबी आयु नहीं मांगी बल्कि उन्होंने हमेशा के लिए भगवान शिव का साथ ही मांग लिया। उनका यह भाव देखकर भगवान शिव अति प्रसन्न हुए और नंदी को बैल का रूप देकर अपना वाहन व गणों का सेनापति भी बना दिया। इस तरह से नंदी बन गए भगवान नंदीश्वर, जो अजर, अमर और अविनाशी है। कुछ समय बाद भगवान शिव और माता पार्वती ने मरुतों की पुत्री सुयशा से नंदी का विवाह भी करवाया था।
शिवलिंग के सामने ही क्यों विराजते है नंदीश्वर
भगवान शिव द्वारा नंदी को यह भी वरदान दिया गया था कि जब भी किसी जगह मेरी प्रतिमा स्थापित की जाएगी वहां तुम्हें भी मेरे सामने स्थान दिया जाएगा। यही वजह है कि जब भी कोई शिव मंदिर बनाया जाता है तो गर्भगृह के सामने नंदीश्वर की मूर्ति जरूर बनाई जाती है। नंदी को भगवान शिव का परम मित्र माना जाता है और अपनी बात भगवान शिव तक पहुंचाने के लिए कई बार हम नंदी के कान में भी अपनी बातें कहते हैं।
नंदीश्वर की मूर्ति को हमेशा गर्भगृह के बाहर ही स्थापित किया जाता है ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान शिव अर्धनारीश्वर रूप में माता पार्वती के संग भी होते हैं इसलिए उन्हें भी एकांत समय देना आवश्यक है।
