Mandiron ke upar jhanda kyon lagaya jata hai: मंदिरों के ऊपर झंडा क्यों लगाया जाता है? जानिए ध्वजा का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व साथ ही अनोखे ध्वजारोहण परंपराएं!
Mandiron ke upar jhanda kyon lagaya jata hai: भारत की प्राचीन संस्कृति में कई ऐसे सवाल छिपे हुए हैं जो हमारे सामने ही होते हैं पर हमें समझ में नहीं आते। ऐसा ही एक सामान्य सा सवाल है कि हम सभी मंदिरों के ऊपर झंडा(ध्वजा) जरूर देखते हैं लेकिन क्या आपको पता है कि यह झंडा लगाया क्यों जाता है?

Mandiron ke upar jhanda kyon lagaya jata hai: भारत की प्राचीन संस्कृति में कई ऐसे सवाल छिपे हुए हैं जो हमारे सामने ही होते हैं पर हमें समझ में नहीं आते। ऐसा ही एक सामान्य सा सवाल है कि हम सभी मंदिरों के ऊपर झंडा(ध्वजा) जरूर देखते हैं लेकिन क्या आपको पता है कि यह झंडा लगाया क्यों जाता है? पहले भी जब महारथी युद्ध करने के लिए जाते थे तो उनके रथों के ऊपर अलग अलग किस्म के झंडे लगे होते थे लेकिन क्या आपको पता है कि यह झंडा क्यों लगाया जाता था और आज भी इसे मंदिरों में क्यों लगाया जाता है? इन्हीं सब सवालों के जवाब आज हम इस लेख में जानने वाले हैं इसलिए इसे पूरा जरूर पढ़िए!
मंदिरों में ध्वज लगाने का इतिहास
मंदिरों के ऊपर ध्वज लगाना एक आध्यात्मिक प्रतीक का हिस्सा है। यह लहराता हुआ रंगीन ध्वज मंदिर में स्थापित भगवान की ही जानकारी ही नहीं देता बल्कि यह ऊपर से आने वाली अलौकिक शक्ति, दिव्य ऊर्जा और भगवान के बीच की कड़ी का कार्य करता है। मंदिरों के शिखर पर ध्वज लहराने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। आपने गौर किया होगा कि सभी मंदिरों में अलग-अलग किस्म के झंडे लगे होते हैं। मंदिर में स्थापित देवता के अनुसार झंडे का निर्माण किया जाता है, जो श्रद्धालुओं को मंदिर में आने पर उस विराजमान देवता की अलौकिक शक्ति का एहसास कराता है। गरुड़ पुराण के अनुसार बिना ध्वज के मंदिर को अधूरा बताया गया है और यह भी कहा गया है कि इसके बिना मंदिरों में नकारात्मक शक्तियों का वास हो सकता है क्योंकि ध्वज मंदिर के रक्षक होते हैं इसलिए इन्हें स्थापित करना बहुत ही जरूरी है।
विजय प्रतीक के रूप में झंडे का उपयोग
मंदिर के शिखर में झंडा लगाने से पहले इसका उपयोग विजय प्रतीक के रूप में महारथियों द्वारा किया जाता था। महाभारत यदि आपने देखा हो तो आपको पता होगा कि अर्जुन के रथ के ऊपर कपिध्वज बना हुआ था जिस पर हनुमान जी विराजमान थे। इसी तरह अन्य महारथियों के रथों पर भी ध्वज लगा हुआ था, जो यह दर्शाता है कि यह ईर्ष्या और अहंकार के विरुद्ध एक आध्यात्मिक लड़ाई है। यही आगे चलकर मंदिरों के शिखर में भी उपयोग होने लगा और इसे पवित्र स्थान का प्रतीक भी माना जाता है। ध्वज की एक और खासियत होती है कि यह हवा में फैली सकारात्मक ऊर्जा को पूरे वातावरण में फैलती है जिस कारण मंदिरों और पवित्र स्थलों के आसपास पवित्रता और शुद्धता का एहसास होता है।
हिंदू मंदिरों में केसरिया रंग के ध्वज का महत्व
झंडो में भी रंगों का बहुत महत्व है अक्सर हिंदू मंदिरों में केसरिया/भगवा रंग के झंडे, मुसलमानों में हरे रंग के झंडे अधिकतर देखे जाते हैं। साधू सन्यासियों व कठोर तपस्वियों द्वारा भी केसरिया रंग के ही वस्त्रो का धारण किया जाता है ऐसा इसलिए है क्योंकि यह रंग अग्नि तत्व का प्रतीक है, जो अंदर की बुराइयों को जलाकर अच्छाई सामने लाता है। साथ ही इस रंग को त्याग और वैराग्य का प्रतीक भी माना गया है।
ध्वज को लेकर भारतीय मंदिरों के अनोखे तथ्य
- जगन्नाथ मंदिर, पुरी– यहां ध्वज लहराने की प्रक्रिया किसी चमत्कार से कम नहीं है, जो विज्ञान को भी फेल कर देता है। इस मंदिर का ध्वज हवा की विपरीत दिशा में लहराता है जो पूरी तरह से आश्चर्य जनक है।प्राचीन समय से लेकर आज तक सूर्यास्त के पहले इस मंदिर के ध्वज को बदल दिया जाता है। 213 फीट के ऊंचे शिखर वाले इस मंदिर में बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के ध्वज बदलने की प्रक्रिया की जाती है।
- द्वारकाधीश मंदिर, गुजरात– यहां विराजमान द्वारकाधीश की मूर्ति को भगवान कृष्ण के पांच स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है जिस वजह से यहां दिन में पांच बार तक ध्वज बदला जाता है। यहां के ध्वज को पताका भी कहते हैं। इस मंदिर के शिखर पर स्थापित ध्वज दंड सोने से बना हुआ है।
- रामनाथस्वामी मंदिर, रामेश्वरम– भारत में चार धामों की यात्रा में इस मंदिर का विशेष स्थान है। इस मंदिर में ध्वज लहराने से पहले समुद्र देव की पूजा की जाती है।
- चिदंबरम मंदिर, तमिलनाडु– ध्वज फहराने के मामले में यह मंदिर काफी अनोखा है क्योंकि इस मंदिर में 15 अगस्त के दिन भारतीय तिरंगा झंडा लहराया जाता है,जो भारत की स्वतंत्रता को दर्शाने के लिए किया जाता है और ऐसा करने वाला यह पहला मंदिर है। इस मंदिर में भगवान शिव को नृत्य के देवता ”नटराज” के रूप में पूजा जाता है।
