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Bharat ka rashtriya dhwaj kaha Print Hota hai: भारत का तिरंगा सिर्फ इसी एक गांव में क्यों बनता है? जानिए राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ा अनसुना सच!

Bharat ka rashtriya dhwaj kaha Print Hota hai: कई लोगों को यह बात नहीं पता होगी की आधिकारिक तिरंगे का निर्माण सिर्फ भारत के एक ही गांव में होता है। आईए जानते हैं इस गांव के बारे में!

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इमेज सोर्स- गूगल, एडिट बाय- NPG News

By Chirag Sahu

Bharat ka rashtriya dhwaj kaha banta hai: भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को डिजाइन करने का श्रेय स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया को जाता है। इन्होंने अपने अथक प्रयासों और 20 से भी अधिक देशों के झंडो का अध्ययन करके यह एक खास डिजाइन तैयार किया था और इसे बनाने का एक निश्चित आकार भी तय किया गया था जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। 1947 के बाद यानी भारत अपनी स्वतंत्रता के बाद से तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में आज तक फहराते हुए आ रहा है। लेकिन कई लोगों को यह बात नहीं पता होगी की आधिकारिक तिरंगे का निर्माण सिर्फ भारत के एक ही गांव में होता है। आईए जानते हैं इस गांव के बारे में!

कर्नाटक के बेंगेरी(Bengeri) गांव में होता है तिरंगे का निर्माण

कर्नाटक राज्य का बेंगेरी गांव एकमात्र ऐसा गांव है जहां तिरंगे झंडे का ऑफिशियल निर्माण होता है। यहां तिरंगे के निर्माण होने का कार्य एक स्वतंत्रता सेनानी वेंकटेश मगदी के वजह से हुई। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ(KKGSS) की स्थापना 7 नवंबर 1957 को की। यह संघ शुरुआत में केवल खाली कपड़े ही बनाता था लेकिन 2004 में इसे झंडे बनाने का कार्य भी दिया गया और 2006 में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने इसे एक आधिकारिक संस्था के रूप में मान्यता प्रदान की और तब से आज तक यही एकमात्र संस्था है, आपके पास तिरंगे बनाने का कानूनी अधिकार है।

शुरुआत में किस तरह से बनाए जाते थे तिरंगे

शुरुआत में कर्नाटक के तुलसीगेरी गांव के किसान और कारीगर कपास की खेती करते थे और इसी कपास के प्रसंस्करण के बाद वे शुद्ध सूती खादी को अपने हाथों से ही बुनते थे। इसमें किसी भी प्रकार की मशीनों का उपयोग नहीं किया जाता था। जब सूती को बुनते हुए पूरा कपड़ा तैयार हो जाता था तो वे इन कपड़ो को बेंगेरी गांव भेज दिया करते थे जहां तिरंगे का असली डिजाइन तैयार होता था। यहां पहले कपड़ों को तीन भागों में बांटा जाता था फिर उसमें तिरंगे के तीनों रंगों को रंगने का कार्य किया जाता जिसके तहत सबसे ऊपर का रंग केसरिया, बीच में सफेद और नीचे के कपड़े को हरा रंग से रंगा जाता था। फिर अंत में कपड़े के दोनों तरफ निरंतरता के प्रतीक अशोक चक्र को मुद्रित किया जाता था। यह काम बिना गलती के हाथों से ही पूरी सटीकता के साथ किया जाता है।

तिरंगा बनाते समय भारतीय ध्वज संहिता और भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा जारी दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन किया जाता था और यह भी ध्यान रखा जाता था कि तिरंगे की माप उसकी स्टैंडर्ड अनुपात में ही रहे साथ ही अशोक चक्र की स्थिति और रंगों की सटीकता भी बराबर रहे। इस तरह से मानक नियमों का पालन करते हुए 9 अलग-अलग आकार के झंडे बनाए जाते हैं जिनमें हाथ में पकड़ने के लिए छोटे झंडे से लेकर खंभों में फहराने वाले बड़े झंडे शामिल है। झंडे के निर्माण की एक और खासियत है कि इसे बनाने वाली संघ में 95% कर्मचारी महिलाएं हैं। यहां के बने हुए झंडे भारत के हर कोने तक पहुंचते हैं और आप इसे ऑनलाइन ऑर्डर भी कर सकते हैं।

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