Bastar pandum kya hota hai: ये है आदिवासियों की अनोखी परंपरा, जानिए पंडुम क्या है और इसे कैसे मनाते है...

Bastar pandum kya hota hai: छत्तीसगढ़ के आम जन जीवन में त्यौहारों का विशेष महत्व है और जब हम आदिवासियों की बात करते है तो यह और भी महत्पूर्ण हो जाता है। बस्तर क्षेत्र की आदिवासी संस्कृति में त्यौहारों के लिए पंडुम शब्द का प्रयोग किया जाता है। जनजातियां अपने समस्त उत्सवों को सामूहिक रूप से मनाती हैं। इन उत्सवों को गोंडी भाषा में पंडुम कहा जाता है। ये मुख्यत: कृषि कार्यों और ऋतुओं से जुड़े पर्व होते है। इस परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी आज भी पालन किया जा रहा है। इस लेख में हम आदिवासियों द्वारा मनाए जाने वाले पंडुम के बारे में बताने वाले है।
कारे पंडुम
बस्तर के आदिवासी परंपरागत रूप से स्थानांतरित कृषि करते आए हैं, जिसे स्थानीय भाषा में बेवार कृषि कहते हैं। इस कृषि पद्धति में सबसे पहले जंगल के एक हिस्से को साफ किया जाता है। वृक्षों को काटने और जलाने की इस प्रक्रिया के समय कारे पंडुम मनाया जाता है।
बोटिगटी पंडुम
जब खेत तैयार हो जाते हैं और बुवाई का समय आता है, तब बोटिगटी पंडुम का आयोजन होता है। यह बीज बोने का पर्व है। इस अवसर पर धरती माता की विशेष पूजा की जाती है और ग्राम देवताओं से अच्छी फसल के लिए प्रार्थना की जाती है।
अग्गि पंडुम
ये पंडुम भी कृषि प्रारंभ से संबंधित एक महत्वपूर्ण पर्व है। जब सूखे वृक्षों को आग लगाई जाती है तो यह पर्व मनाया जाता है। स्थानांतरित कृषि में यह एक आवश्यक प्रक्रिया है क्योंकि जले हुए वृक्षों की राख भूमि को उपजाऊ बनाती है। अग्नि को देवता का रूप मानकर उसकी पूजा की जाती है।
कप्पल पंडुम
बस्तर की दोरला जनजाति की महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला कप्पल पंडुम एक अत्यंत रोचक और अनूठा पर्व है। यह अच्छी वर्षा की कामना के लिए आयोजित किया जाता है। इस पर्व में महिलाएं मेंढक को पकड़कर लाती हैं और उसे घड़े में रखा जाता है फिर उस मेढक की पूजा की जाती है।
विज्जाय पंडुम
बुवाई के बाद जब बीज फूटने लगते हैं तो विज्जाय पंडुम मनाया जाता है। यह पर्व अप्रैल माह में आयोजित होता है। इस समय पृथ्वी और धान के बीज की विशेष पूजा की जाती है।
पच्चिग पंडुम
जब बीज अंकुरित होने लगते हैं तो पच्चिग पंडुम का आयोजन होता है। इसे बियासी का पर्व भी कहते हैं। यह वह समय होता है जब खेतों में नन्हे पौधे दिखाई देने लगते हैं। किसान इस अवस्था में फसल के स्वस्थ विकास के लिए देवताओं से आशीर्वाद मांगते हैं।
डेला पंडुम
खेती के कार्य में जुताई एक महत्वपूर्ण कार्य है। जून माह में जब जुताई का कार्य पूर्ण हो जाता है तो डेला पंडुम मनाया जाता है। यह पर्व कृषकों के कठिन परिश्रम के समापन का प्रतीक है।
तारेम पंडुम
जब फसल पूरी तरह से तैयार हो जाती है और कटाई का समय आता है तो तारेम पंडुम मनाया जाता है। इसे तारोल पंडुम के नाम से भी जाना जाता है। यह फसल कटाई का महत्वपूर्ण पर्व है।
कुरूम पंडुम
नई फसल आने पर उसे खाने से पहले देवताओं को अर्पित किया जाता है। कुरूम पंडुम वास्तव में नवाखानी के विभिन्न त्यौहारों का प्रकार है।
कोड़ता पंडुम
अक्टूबर माह में जब नया चावल तैयार होता है तो कोड़ता पंडुम का आयोजन होता है। यह नए धान का पर्व है। इस अवसर पर नए चावल के साथ नए कंद मूल, देवताओं को भोग लगाया जाता है।
जीर्रा पंडुम
जीर्रा पंडुम खट्टा भाजी से संबंधित पर्व है। आदिवासी समाज अपने भोजन में विभिन्न प्रकार की भाजियों का उपयोग करता है। खट्टा भाजी उनके भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके सेवन से पहले यह पर्व मनाया जाता है।
इक्किन पंडुम
महुआ, आदिवासी जीवन का एक अभिन्न अंग है। फरवरी माह में जब महुए के फूल गिरने शुरू होते हैं तो इर्क पंडुम या इक्किन पंडुम मनाया जाता है। इसे भीमिन पंडुम या उराऊ पंडुम के नाम से भी जाना जाता है। यह महुआ बीनने जाने से पहले का पर्व है।
बुर्री पंडुम
महुए के फूल से शराब बनाने की परंपरा आदिवासी समाज में प्राचीन काल से चली आ रही है। जब नई शराब तैयार होती है तो बुर्री पंडुम मनाया जाता है। यह नया शराब का पर्व है। देवताओं को पहले शराब अर्पित की जाती है और फिर ग्रामीण उसका सेवन करते हैं।
उगादि पंडुम
उगादि पंडुम या मामिड़ी पंडुम एक अत्यंत विशिष्ट पर्व है। यह भविष्य कथन का पर्व है और इसे नए वर्ष के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।
पीड़म पंडुम
पीड़म पंडुम गांव बांधने का पर्व है। जब किसी गांव में कोई आपत्ति, बीमारी या अनहोनी घटित होती है तो गांव को प्रतीकात्मक रूप से बांध दिया जाता है। यह एक सामाजिक और धार्मिक उपाय माना जाता है।
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