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सीएस को एक्सटेंशन या बिदाई?

संजय के दीक्षित
तरकश, 22 नवंबर 2020
चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल के रिटायरमेंट में अब बमुुश्किल हफ्ता भर का वक्त बच गया है। 30 नवंबर उनका ड्यू डेट है। उस दिन रविवार है। याने भारत सरकार से अगर एक्सटेंशन नहीं मिला तो 29 को ही नए चीफ सिकरेट्री का आर्डर निकालना पड़ेगा। हालांकि, ब्यूरोक्रेसी को समझने वाले मंडल के एक्सटेंशन से इंकार नहीं कर रहे। इसकी तीन वजहें गिनाई जा रही है। पहला कोरोना का हवाला देकर भूपेश गवर्नमेंट ने छह महीने एक्सटेंशन का प्रपोजल केंद्र का भेजा था। तो कोरोना फिर से बढने लगा है। दूसरा, डीओपीटी मिनिस्ट्री ने छत्तीसगढ़ से अपने लेवल पर फीडबैक लिया है, वह मंडल के अनुकूल बताया जा रहा है। हालांकि, सुनील कुजूर के एक्सटेंशन के समय भी कुछ नेताओं से केंद्र सरकार ने फीडबैक मांगा था। लेकिन, कुजूर के बारे में मामला जरा गड़बड़ा गया। इस कारण उनका प्रस्ताव खारिज हो गया था। तीसरा जो सबसे महत्वपूर्ण है, केंद्र अभी तक किसी चीफ सिकरेट्री का एक्सटेंशन रोका नहीं है। राजस्थान के चीफ सिकरेट्री राजीव स्वरूप को भी कहते हैं, भारत सरकार ने तीन महीने के लिए एक्सटेंशन दे दिया था। आपको याद होगा, मीडिया में ये खबर चल भी गई थी। लेकिन, ऐन वक्त पर राज्य सरकार का मन बदल गया। राजस्थान के सीएम ने राजीव की जगह दलित आईएएस को CS बनाना ज्यादा मुनासिब समझा। तभी तो रात ढाई बजे नए मुख्य सचिव का आदेश निकाला गया। मतलब ये हुआ कि मंडल के एक्सटेंशन को सिरे से नकारा नहीं जा सकता। खासकर ऐसे में भी, जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इसी हफ्तें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर लौटे हैं। और, अगर नहीं हुआ तो अमिताभ जैन तो हैं ही।

सरकार भी चिंतित

चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल के रिटायर होने से राज्य सरकार भी चिंतित है। उसकी प्रमुख वजह अफसरों की कमी है। मंडल के जस्ट नीचे 89 बैच में सिर्फ एक आईएएस हैं। अमिताभ जैन। सबसे महत्वपूर्ण विभाग फायनेंस उन्हीं के पास है। वे अगर चीफ सिकरेट्री बन जाएंगे तो फायनेंस के लिए बड़ी दिक्कत हो जाएगी। हालांकि, सरकार ने सिकरेट्री अलरमेल मंगई को  फायनेंस सिकरेट्री बनाया है। लेकिन, फायनेंस ऐसा विभाग है कि ओवर नाइट या ओवर मंथ नहीं समझा जा सकता। उसे समझने के लिए कम-से-कम दो साल चाहिए। यही वजह है कि सरकार बदलने के बाद चीफ सिकरेट्री बदल जाता है, लेकिन फायनेंस सिकरेट्री नहीं। अमिताभ जैन भी नहीं चेंज हुए थे। वे पिछली सरकार में फायनेंस सिकरेट्री बनाए गए थे। और अभी भी हैं। रिटायर आईएएस डीएस मिश्रा करीब साढ़े आठ साल फायनेंस सिकरेट्री रहे थे। कुछ दिनों के लिए रमन सरकार ने उन्हें हटाकर कई अधिकारियों को अजमाया। लेकिन, बाद में फिर मिश्रा को ही कमान सौंप दिया था। सरकार का सोचना है, आरपी मंडल को अगर तीन महीने का एक्सटेंशन मिल गया तो फरवरी में सरकार का बजट निबट जाएगा।

राम राज-1

मध्यप्रदेश के समय से फायनेंस का रुल था कि ज्वाइंट सिकरेट्री से नीचे किसी अधिकारी को वाहन नहीं मिलेगा। तब के सीएम दिग्विजय सिंह ने वाहनों का खेल समझते हुए दस साल पुरानी गाड़ियों को बेचने का आदेश दे दिया था। उनका मानना था कि पुरानी गाड़ियों पर खर्चे के नाम पर बड़ा गोलमाल होता है। 97 में एक बार वे रायपुर आए तो एयरपोर्ट से नेताओं और मंत्रियों को छोड़ कलेक्टर की गाड़ी में बैठकर सर्किट हाउस रवाना हुए। रास्ते में उन्होंने कलेक्टर से पूछ लिया, कौन सी माॅडल की गाड़ी है। कलेक्टर ने यही कोई तीन-चार साल पहले का बताया था। तब दिग्गी राजा ने कहा था, गुड। बहरहाल, छत्तीसगढ़ बनने के बाद 2005 से वाहनों के मामले में फायनेंस की लिमिट टूटती चली गई। हालांकि, इसकी शुरूआत नौकरशाहों ने ही की। सीएम से स्पेशल परमिशन लेकर महंगी गाड़ियां खरीदनी शुरू कर दी। बाद में अफसरों को और लग्जरी गाड़ी की जरूरत पड़ने लगी तो फिर किराये का वाहन लेने का रास्ता निकाला गया। आज आलम ये है कि मंत्रालय और डायरेक्ट्रेट के अंडर सिकरेट्री, बाबू, पीए तक किराये की महंगी गाडियों में घूम रहे हैं। शायद ही कोई सिकरेट्री और कलेक्टर होगा, जिसके बंगले में कम-से-कम तीन गाड़ी खड़ी नहीं मिलेगी। ये सरकारी गाड़ी नहीं, किराये की गाड़ी होती है। अब आपके मन में उत्सुकता जगेगी कि आर्थिक संकट के समय इसका पैसा कहां से। तो ये भारत सरकार की योजनाओं या फिर निगम और बोर्ड के मदो ंसे गाडियां खरीदी जाती है। किसी अफसर को अगर कोई विभाग मिलता है तो सबसे पहले वह यही जानने की कोशिश करता है कि उसके विभाग के अंदर कितने बोर्ड और निगम है और उसमें कितनी गाड़ियों की गुंजाइश बन सकती है।

राम राज-2

छत्तीसगढ़ में रामराज इसलिए क्योंकि खासकर गाड़ियों के मामले में सूबे में बड़े-छोटे का कोई फर्क नहीं रह गया है। एसडीएम, असिस्टेंट कलेक्टर, नगर निगम कमिश्नर, सीईओ भी इनोवा या होंडा सिटी गाड़ियों में चल रहा और कलेक्टर एवं सीनियर सिकरेट्री भी। पुलिस विभाग के पास एक डीजी के पास होंडा एमेज है तो कल राजधानी में एमेज में सीएमओ नगरपालिका लिखा भी देखने को मिला। आखिर राम राज का मतलब ही ये होता है कि सब बराबर। ये संभव हुआ है किराये की गाड़ियों का खेल शुरू होने से। सरकार सभी बोर्ड और निगमों से सिर्फ किराये की गाड़ियों की संख्या तलब कर ले तो उसकी आंखे फटे रह जाएगी। उस पैसे में छत्तीसगढ़ के कई बेरोजगारों को रोजगार दिया जा सकता है।

पुलिस की भी सुन लीजिए

गाड़ियों के खेल में एसपी और आरआई के खेल को कोई पार नहीं पा सकता। बस्तर रेंज के कई एसपी की जांच इसलिए चल रही है कि वे एसआरई फंड याने सिक्यूरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर फंड से एक दिन में 4500 किलोमीटर गाड़ी कैसे दौड़ा दिए। 4500 का मतलब एक दिन में एक स्कार्पियो 45 सौ किलोमीटर चल गया। याने दिन भर में दो बार दिल्ली गया और दो बार लौटा। दरअसल, केंद्र सरकार नक्सल मूवमेंट में आए पैरा मिलिट्री फोर्स को गाड़ी और उसके ईंधन समेत चीजों के लिए पैसा भेजती है। इस पैसे में बड़ा गोलमाल होता है। हालांकि, इस खेल से गैर नक्सल जिलों का पुलिस विभाग भी अछूता नहीं है। वहां भी किराये की गाड़ियों में

अंत में दो सवाल आपसे

1. नया रायपुर में पाथवे पर लगा अच्छा खासा आगरा स्टोन को उखाड़कर पेवल लगाया जा रहा है। क्या इसमें एनआडीए द्वारा कोई खेल किया जा रहा है?
2. छत्तीसगढ़ के एक मंत्री का एक एनजीओ संचालिका से कनेक्शन के बारे में आपको कुछ पता है?

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