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वाह एसपी साब!

.छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित वरिष्ठ पत्रकार संजय दीक्षित का लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश

वाह एसपी साब!
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संजय के. दीक्षित

तरकश, 27 फरवरी 2022

सूबे में पोस्टेड एक एसपी साब शौकीन मिजाज के माने जाते हैं। महंगी जगहों पर छुट्टियां मनाना...महंगा शौक फरमाना उनका प्रिय शगल हैं। एसपी साब के बारे में माना जाता है कि वे जहां भी पोस्ट होते हैं, सबसे पहिले एसपी बंगले को अपने अंदाज में रिनोवेट कराते हैं। मगर इस बार उन्होंने ऐसा इंटीरियर करवा डाला कि आरआई माथा पकड़ लिया। पूरे 55 लाख का बिल। आरआई बिल लेकर साब के पास गया तो जमकर झाड़ मिल गई। ठीक भी है, आरआई को कप्तान का लिहाज करना चाहिए न। एसपी के संरक्षण में आरआई लाइन में बैठकर कागजों में किराये की गाडियां दौड़ाकर लाखों का खेल करते है...तमाम धतकरम भी...फिर भी कप्तान से बिल पास करने की उम्मीद। ऐसे में भला किस कप्तान को गुस्सा नहीं आएगा।

सिकरेट्री भी

ऑल इंडिया सर्विस के अफसरों को तीन चीज का बड़ा चार्म रहता है। बढ़ियां पोस्टिंग, बढ़ियां बंगला और और कम-से-कम तीन बढ़ियां गाड़ी। एक अपने लिए, एक वाइफ और एक बच्चों के लिए। ये तीन चीजें गर मिल गइ, तो उनके आईएएस बनने का उद्देश्य पूरा। बहरहाल, उपर में बात बंगले की हो रही है थी तो बता दें कि कुछ साल पहले एक महिला आईएएस को राजधानी के देवेंद्र नगर आफिसर्स कालोनी में बंगला अलाट हुआ था। उन्होंने रिनोवेशन के लिए विभाग के ठेकेदार से इतना तोड़-फोड़ करवा दी कि बात कालोनी में फैल गई। सरकार ने उनका विभाग बदल दिया था।

पैसा बड़ा या कैरियर

सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश की बात है....ऑल इंडिया सर्विस के कई अच्छे अधिकारी इसी पोस्टिंग, बंगला और गाड़ियों के फेर में अपना अच्छा-खासा कैरियर खराब कर लेते हैं। सेंट्रल डेपुटेशन में डायरेक्टर पर कोई गाड़ी नहीं मिलती। यहां के सिकरेट्री वहां ज्वाइंट सिकरेट्री होते हैं, उनके पास भारत सरकार से सिर्फ एक गाड़ी होती है। यही वजह है, अधिकांश ब्यूरोक्रेट्स सेंट्रल डेपुटेशन से परहेज करते हैं। असल में, राज्यों में प्रोबेशन में ही इतना तामझाम मुहैया हो जाता है कि दिल्ली उनके लिए दूर हो जाती है। छत्तीसगढ़ में आईएएस, आईपीएस को प्रोबेशन में ही इनोवा मिल जाती है। भारत सरकार में डिप्टी सिकरेट्री याने कलेक्टर लेवल के अधिकारियों को शेयर की गाड़ी में दफ्तर आने की मजबूरी। वैसे, स्मार्ट आईएएस, आईपीएस अपने स्टेट में भी काम कर लेते हैं और डेपुटेशन भी कर आते हैं।

अफसर बड़े या सरकार?

सरकार जमीनों का गाइडलाइन रेट तय करें और रजिस्ट्री अधिकारी उसे कम कर दें, आप विश्वास कर सकते हैं। बिल्कुल नहीं...किसी को भी विश्वास नहीं होगा। हमने राजस्व बोर्ड के एक सीनियर अधिकारी से पूछा, उनका जवाब भी यही था, बिल्कुल नहीं। जबकि, जबरिया न्यायालय बताकर सरकार के रेट को कम करने का ये खेल सालों से चला आ रहा है। रायपुर में एक सराफा व्यापारी ने इस महीने खुश होकर स्तंभकार को बताया...मैंने 35 फीसदी रेट कम करवा लिया, जबकि बाकियों का 25 फीसदी से अधिक कम नहीं होता। सरकार और राजस्व बोर्ड के अधिकारियों को जब नहीं मालूम तो व्यापारी को क्या पता...25 फीसदी नहीं, बड़े बिल्डर्स और भूमाफिया गाइडलाइन रेट से 50 से 75 परसेंट तक कम करवा लेते हैं। औद्योगिक भूमि कृषि में बदल जाता है। ऐसा नहीं होता तो बड़े-बड़े अरबपति बिल्डर रजिस्ट्री अधिकारियों की खुशामद में क्यों लगे रहते।

एमपी का वायरस

रजिस्ट्री विभाग से सरकार के खजाने में करीब दो हजार करोड़ राजस्व आता है। अगर जिला पंजीयक गाइडलाइन रेट कम नहीं करें तो है...तो एक मोटा अनुमान है यह राशि बढ़कर ढाई हजार करोड़ हो जाएगी। मगर न सरकार को पता है, न राजस्व बोर्ड को, इस बारे में जानकारी है। बताते हैं, सरकार के रेट को कम करने का ये वायरस मध्यप्रदेश से आया। 80 के दशक में एक रजिस्ट्री अधिकारी ने नियमों का गलत व्याख्या कर गाइडलाइन रेट को कम कर दिया। इस पर न किसी कलेक्टर ने ध्यान दिया और न राजस्व बोर्ड ने। इसके बाद रजिस्ट्री अधिकारी अपना अधिकार समझने लगे। जबकि, देश के किसी भी राज्य में गाइडलाइन रेट कम नहीं होता। सरकार चाहे तो ऑडिट करा कर जानकारी प्राप्त कर सकती है कि किस रजिस्ट्री अधिकारी ने रसूखदारों को कितना उपकृत किया। बता दें, इसकी मूल वजह जबरिया न्यायालय बताना है। सरकार के किसी भी नियम-कानून में रजिस्ट्री आफिस को कोर्ट नहीं माना गया है। मगर छत्तीसगढ़ में रजिस्ट्री अधिकारी अपना कोर्ट घोषित कर दिए हैं तो कोर्ट है।

कलेक्टरों पर सवाल

रजिस्ट्री विभाग को कलेक्टर आफ स्टांप कहा जाता है। मगर किसी भी कलेक्टर को सुध नहीं रहता कि उनकी नाक के नीचे रजिस्ट्री अधिकारी क्या गुल खिला रहे हैं। राजस्व विभाग भी चीफ सिकरेट्री को लिख चुका है कि रजिस्ट्री सिस्टम को ठीक करना है तो 50 लाख से उपर की जमीन या मकान की रजिस्ट्री का अनुमोदन कलेक्टर करें। लेकिन, कोई कलेक्टर ये करना नहीं चाहता, क्योंकि इसमें कलम फंसेगा। बिना कलम फंसे बड़े रजिस्ट्रियांं का हिस्सा पहंच जाता है तो फिर रिस्क क्यों लें।

ब्यूरोक्रेसी का कांफिडेंस

सरकार ने कोरबा में कलेक्टर और डीएफओ के बीच हुई तकरार के बाद डीएफओ को हटा कर वापिस मुख्यालय बुला लिया। बताते हैं, डीएफओ ने एकलव्य आवासीय विद्यालय के लिए लैंड देने से दो टूक इंकार कर दिया था। इससे पहिले मुंगेली में सीईओ रोहित व्यास के साथ महिला नेत्री की अभ्रदता की शिकायत पर भी सिस्टम रोहित के साथ खड़ा हुआ। महिला नेत्री के खिलाफ न केवल मुकदमा दर्ज किया गया बल्कि रोहित को प्रमोशन देकर जगदलपुर का सीईओ अपाइंट किया गया। 2005 बैच की आईएएस संगीता आर सरकार के शपथ लेते ही छुट्टी पर चली गई थीं। उनके बारे में आम चर्चा यह थी कि दुर्ग के कलेक्टर रहने के दौरान सरकार उनसे नाराज थी और छुट्टी से लौटने पर उन्हें जल्दी विभाग नहीं मिलने वाला। लेकिन, ज्वाईन करते ही उन्हें वन, वाणिज्य और उद्योग विभाग में पोस्टिंग मिल गई। जाहिर है, इन तीनों वाकयों से ब्यूरोक्रेसी का कांफिडेंस बढ़ा होगा।

जात न पूछा वीसी की

हंगामा...वार-पलटवार के बाद आखिरकार इंदिरा गांधी कृषि विवि में वाइस चांसलर की नियुक्ति हो गई। राजभवन ने डॉ0 गिरीश चंदेल के नाम पर मुहर लगा दिया। मगर हैरानी की बात यह है कि चर्चा इस बात की नहीं हो रही कि चंदेल कितने काबिल हैं...कितने योग्य हैं। लोगों में ये जानने की दिलचस्पी ज्यादा है कि कुलपति ठाकुर हैं, कुर्मी या सोनी। वाकई ये पराकाश्ठा है...शिक्षक की कोई जाति थोड़ी ही होती है...शिक्षक सिर्फ शिक्षक होता है।

सब खुश

छत्तीसगढ़ में यह पहली बार हुआ कि किसी कुलपति की नियुक्ति से एक साथ कई वर्ग बड़ा खुश हुआ। छत्तीसगढ़ के लोग खुश हैं कि इंदिरा गांधी कृषि विवि को पहली बार छत्तीसगढ़िया कुलपति मिला। कुषि मंत्री रविंद्र चौबे को खुशी का ठिकाना नहीं। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने राज्यपाल अनसुईया उइके को थैंक्स दे डाला। उधर, ओबीसी वर्ग के लोग प्रसन्न हैं कि हमारे बिरादरी में कुलपति की संख्या में इजाफा हो गया। और भाजपा और जनसंघ वाले खुश हैं कि कुलपति अपने आदमी हैं। है न कमाल की बात।

डीपीसी पर ब्रेक

आईपीएस की डीपीसी हो गई। फाइल आगे के प्रॉसेज के लिए मुख्यमंत्री सचिवालय गई है। गृह विभाग ने कहा है कि डीपीसी प्रक्रिया में है, यथासमय आदेश निकलेगा। मगर लाख टके का सवाल यही है कब? पिछले साल भी गृह विभाग जल्दी में नहीं था। सो, नवंबर में आदेश निकला। पता चला है, दुर्ग के एसएसपी बद्री मीणा आईजी बनने वाले हैं। दुर्ग में वे चीजों को इस कदर ठीक कर दिए हैं कि उनका विकल्प गृह विभाग को सूझ नहीं रहा। ये सौ फीसदी सही है कि बद्री प्र्रमोशन के साथ ही एक हाई प्रोफाइल रेंज के आईजी बनेंगे। लेकिन, फिर वही सवाल...कब? चूकि गृह विभाग ने कहा है यथासमय आदेश निकलेगा। सो, गृह विभाग के एसीएस सुब्रत साहू से मालूम करना पड़ेगा। अगर पता चला तो अगले तरकश में हम बताएंगे।

सरकार का झंझट

सचिन पायलट के चक्कर में अपना नम्बर बढ़ाने के फेर में राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मुसीबत बढ़ा डाली। पुरानी पेंशन योजना लागू करने का ऐलान का क्या किया हर कर्मचारी संगठन सिर्फ पेंशन की बात कर रहा। पत्रों, ज्ञापनों और विज्ञप्तियों का दौर शुरू हो गया है। अब देखना है, सरकार इससे कैसे पार पाती है।

हफ्ते का व्हाट्सएप

'कोई तूझे छूकर तो दिखाए, सा...के हाथ-पैर तोड़ देंगे, ऐसा बोलकर बंदे की धुलाई के वक्त गायब हो जाने वाले दोस्त सिर्फ गली-मुहल्ले में नहीं होते, NATO में भी पाए जाते हैं।'

अंत में दो सवाल आपसे

1. जून में छाया वर्मा की खाली हो रही राज्यसभा सीट पर क्या कांग्रेस का कोई बड़ा नेता दिल्ली जाएगा?

2. सूबे के कुछ पुलिस अधीक्षकों को कैलकुलेटर वाला एसपी क्यों कहा जा रहा है?

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