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एसपी बड़े या सरकार...?

एसपी बड़े या सरकार...?
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तरकश, 17 अक्टूबर 2021

छत्तीसगढ़ पुलिस के पुलिस अधीक्षकों ने अजीब परंपरा शुरू कर दी है। इन दिनों वे अपने हिसाब से सीएसपी को थाने का बंटवारा करने लगे हैं। जबकि, एसपी को ये अधिकार ही नहीं है। सीएसपी की पोस्टिंग मुख्यमंत्री के अनुमोदन से गृह विभाग करता है। पोस्टिंग आदेश में साफ तौर पर लिखा होता है सीएसपी फलां। याने कार्यक्षेत्र का नाम। लेकिन, कुछ दिनों से सरकार के आदेश को ओवरलुक करते हुए एसपी चहेते अफसरों को अपने हिसाब से लगे हैं रेवड़ी बांटने। यही नहीं, एसपी साहबानों की शह पर सीएसपी आजकल मानिटरिंग नहीं, बल्कि थानेदारी करने लगे हैं। अब सीएसपी और डीएसपी खुद ही थानेदारी करने लगे तो वही होगा जो राज्य में हो रहा है। पोलिसिंग का कबाड़ा। कोंडागांव में इसकी झलक दिखी। एसडीओपी की जमकर पिटाई हो गई। ये पुलिस पर उठते विश्वास का प्रतीक है। वरना, पहले कभी ऐसा देखा, सुना नहीं गया कि डीएसपी, सीएसपी की पिटाई होने लगे। मगर ये छत्तीसगढ़ में हो रहा है। और ये हो रहा तो सीधे तौर पर एसपी साहब लोगों की ये कमजोरी से हो रहा। जिले का कप्तान अगर टाईट हो जाए, तो मजाल है कानून-व्यवस्था में सेंध लगाने की कोई सोच लें। सरकार को 22 अक्टूबर को एसपी कांफ्रेंस में इस पर बात करनी चाहिए।

ब्यूरोक्रेसी पटरी पर

ढाई-ढाई साल की सियासी झंझावतों के बीच सांस रोककर शुतुरमुर्ग की मुद्रा में दुबकी छत्तीसगढ़ की नौकरशाही अब फिर से एक्टिव होने लगी है। मंत्रालय, इंद्रावती भवन में बैठकों का दौर शुरू हो चला है...तीन महीने से ठहरी फाइलें अब दौड़ने लगी है। जिलों के कार्यालयों में भी अब चहल-पहल दिखाई पड़ने लगी है। कलेक्टर-एसपी भी अब खोल से बाहर निकल आए हैं। वाकई, तीन महीने छत्तीसगढ़ के लिए बड़ा बुरा रहा। तेजी से बदले सियासी घटनाक्रम की वजह से सरकारी कामकाज एकदम से ठहर-सा गया था।

राहुल का छत्तीसगढ़ दौरा

खबर है, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस महीने के अंत में छत्तीसगढ़ आ सकते हैं। छत्तीसगढ़ दौरे में वे बस्तर और सरगुजा जाएंगे या नहीं, ये अभी क्लियर नहीं हुआ है। मगर आदिवासी महोत्सव में वे शिरकत कर सकते हैं। इस महोत्सव में सभी 28 राज्यों से आदिवासियों का सांस्कृतिक जत्था रायपुर आएगा। तीन दिन का ये महोत्सव 28 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 30 अक्टूबर तक चलेगा। इसके बाद एक नवंबर को राज्योत्सव है। पहले सुनने में आया था कि वे राज्योत्सव के चीफ गेस्ट होंगे। लेकिन, राज्य के बने दो दषक से ज्यादा समय हो जाने की वजह से अब सरकार राज्योत्सव को बहुत ग्लेमराइज नहीं करना चाह रही। आदिवासी महोत्सव बड़ा कल्चरल इंवेट हैं। लिहाजा, राहुल इसमें आ सकते हैं।

उलझन में कलेक्टर

पहले कलेक्टर काफ्रेंस रखा गया था 22 अक्टूबर को और एसपी, आईजी काफ्रेंस उससे एक रोज पहले 21 को। मगर 21 अक्टूबर को षहीदी दिवस के चलते सरकार ने डेट एक्सचेंज करके 21 को कलेक्टर और 22 को एसपी, आईजी कांफ्रेंस कर दिया। लेकिन, अब कलेक्टरों के लिए उलझन ये हो गई है कि शहीदी दिवस में वे कैसे जा पाएंगे। राजधानी में मुख्यमंत्री, चीफ सिकरेट्री, डीजीपी समेत सीनियर अधिकारी शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने शिरकत करते हैं तो जिलों में कलेक्टर-एसपी। अब 21 अक्टूबर को कलेक्टर नहीं जा पाएंगे श्रद्धांजलि देने। दरअसल, पहले 5 अक्टूबर को रखा गया था एसपी कांफ्रेंस और 18 को कलेक्टर कांफ्रेंस। लेकिन, 5 को मुख्यमंत्री का लखनऊ जाने का कार्यक्रम आ गया। लिहाजा, एसपी कांफ्रेंस को स्थगित करना पड़ा। और कलेक्टर कांफें्रस इसलिए आगे बढ़ाना पड़ा क्योंकि 19 अक्टूबर तक विभिन्न तीज-त्यौहार हैं। बार-बार डेट इधर-उधर खिसकाने की बजाए सरकार ने अब 21 और 22 अक्टूबर का डेट फायनल कर दिया है।

छोटी लिस्ट

कलेक्टर, एसपी कांफ्रेंस के बाद एक छोटी लिस्ट निकलने की खबर है। बताते हैं, मुख्यमंत्री भूपेष बघेल की क्लास में जिन कलेक्टर्स, एसपीज के पारफारमेंस ठीक नहीं आएंगे, उनकी कुछ घंटे बाद छुट्टी कर दी जाएगी। पता चला है, मुख्यमंत्री सचिवालय ने कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों का अपने सोर्सेज के आधार पर एक रिपोर्ट कार्ड तैयार करके रखा है। पारफारमेंस और रिपोर्ट कार्ड के आधार पर कुछ कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों के भविष्य तय होंगे। हालांकि, कलेक्टर, एसपी काफ्रेंस ट्रांसफर का कोई मापदंड नहीं है। मगर पहले कई मौकों पर ऐसा हो चुका है। अब चूकि सरकार के पास समय नहीं है। डेढ़ साल बचा है विधानसभा चुनाव में। लिहाजा, हो सकता है सरकार कोई मरौव्वत न करें।

गजब सर्जरी

उद्योग विभाग में इस हफ्ते हुई सबसे बड़ी सर्जरी में अपर संचालक से लेकर सीजीएम, जीएम, मैनेजर, लिपिक समेत 48 लोगों के ट्रांसफर हो गए। राज्य बनने के बाद उद्योग विभाग में पहली बार इतना व्यापक तबादला हुआ होगा। उद्योग विभाग में पूरे राज्य में अधिकारी, कर्मचारी मिलाकर करीब 600 को अमला है। इसमें से 48 को इधर-से-उधर कर दिया गया। यानि करीब 10 परसेंट एकमुश्त। इनमें से 80 फीसदी से ऐसे अधिकारी, कर्मचारी ऐसे थे, जो फील्ड में थे, तो कई साल से फील्ड में और जो हेड क्वार्टर में थे वो हेड क्वार्टर में। मुख्यालय वालों का राजधानी में कंफर्ट लेवल इतना बढ़ गया था फील्ड की कमाईदार पोस्टिंग भी उन्हें रास नहीं आ रही थी। लेकिन, सरकार ने अब कंफर्ट लेवल खतम कर दिया है।

ऐसे भी मंत्री-1

चूकि, चर्चा उद्योग विभाग की हो रही, इसलिए अपने उद्योग और आबकारी मंत्री कवासी लखमा का स्मरण हो आया। कवासी भले ही पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन रुटीन के मामले में उनका अंदाज जुदा है। चार बजे उनकी सुबह हो जाती है। अगर वे रायपुर में हैं तो सुबह पांच बजे वे सड़क पर वॉॅक करते दिख जाएंगे। इसके बाद छह बजे तक तैयार होकर लोगों से मिलना षुरू। उन्हें जानने वालों को पता है कि मंत्रीजी से इस टाईम मिलना बेहद आसान है। तब उनके साथ कोई सरकारी अमले की रोक-टोक जैसी बंदिशें नहीं होती। तभी सुबह छह बजे से उनके बंगले में लोगों का जुटना शुरू हो जाता है।

ऐसे भी मंत्री-2

कवासी लखमा से उलट भूपेश बघेल कैबिनेट में एक ऐसे मंत्री भी हैं, जिनकी लेटलतीफी से अधिकारियों का समय काफी जाया होता है। उनके बारे में तरह-तरह के किस्से हैं। एक तो 11 बजे से पहले उनकी सुबह होती नहीं। दूसरा, कई बार मंत्रीजी दोपहर में अधिकारियों की मीटिंग रख लेते हैं। पर बंगले पहुंचने पर पता चलता है साब अभी तैयार नहीं हुए हैं। हालांकि, देर से उठने वाले मंत्री रमन सरकार में थे, लेकिन वे देर रात तक लोगों से मिलते-जुलते भी थे। ये वाले रात को जल्दी भीतर चले जाते हैं और सुबह बाहर आते भी हैं अपने टाईम से।

डीजीपी और काली मंदिर

डीजीपी डीएम अवस्थी आफिस रवाना होने से पहिले आकाशवाणी चौक स्थित काली मंदिर में माथा टेकना नहीं भूलते। उनके ड्राईवर को पता है...बंगले के गेट से गाड़ी निकालते ही वह काली मंदिर की ओर मोड़ देता है। ये सिलसिला आज से नहीं...लंबे अरसे से बना हुआ है। काली मंदिर के पुजारी याद करते हैं, साब जब आईजी रायपुर थे, उसके पहले से माई के दर्शन करने आ रहे हैं। फर्क यह है कि पहले कोई तामझाम नहीं होता था। और, अब चूकि डीजीपी हैं, इसलिए दो-चार जवान आसपास खडे हो जाते हैं। डीएम ने बंगला भी ऐसा अलॉट कराया है, जिसकी मंदिर से दूरी बमुश्किल 300 मीटर होगी। याने सीधे काली माई से शक्ति मिलती रहे। अध्यात्मिक मिजाज के डीजीपी वैसे महाकाल के भी परम भक्त हैं। वाकई उन पर महाकाल और काली माई की कृपा परिलक्षित भी हो रही है। आपको याद होगा...2018 में सरकार बदलने पर गिरधारी नायक इसलिए डीजीपी नहीं बन पाए कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक उनके रिटायरमेंट में छह महीने से कम समय बचा था। डीएम बन भी गए तो उसी दिन से भविष्यवाणियां चालू हो गई थी, बस साल भर। फिर हुआ सुप्रीम कोर्ट का दो साल की सर्विस की क्रायटेरिया पूरा होते ही। मगर कृपा देखिए, डीएम और पिच पर जमे हुए हैं। और, फिलहाल कोई खतरा भी नहीं दिख रहा। दिसंबर में उनका तीन साल हो जाएगा। ठीक ही कहा गया है, सब माथे पर लिखा होता है। खासकर, पीएम, सीएम, सीएस, डीजीपी, पीसीसीएफ तो बिल्कुल ही।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक मंत्रीजी का नाम बताएं, जो पूरे परिवार के साथ आत्मग्लानि व्यक्त करने दरबार में पहुंच गए?

2. एक ऐसे विधायक का नाम बताएं, जो अगला चुनाव बीजेपी के नाम पर लड़ने की मानसिकता में हैं?

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