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यहां का मैं कलेक्टर

छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित वरिष्ठ पत्रकार संजय के. दीक्षित के लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश

यहां का मैं कलेक्टर
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संजय के. दीक्षित

तरकश, 19 जून 2022

नए जिलों के कई ओएसडी कलेक्टर बनने से पहले ही गुल खिलाने लगे हैं। पिछले तरकश में हमने कुछ वाकयों का जिक्र किया था। उनमें एक ये भी...एक ओएसडी ने रजिस्ट्री से पहले जमीन की चौहदी लिखवाना अनिवार्य कर पटवारियों की कमाई का एक और रास्ता ओपन कर दिया। तरकश के इस खबर पर वहां के कलेक्टर ने रजिस्ट्री अधिकारी को फोन पर क्लास लिया। पूछा, किसने आदेश दिया तुम्हें। रजिस्ट्री अधिकारी ने कहा, ओएसडी साब ने कहा था। बोले...यहां का कलेक्टर अब मुझे ही समझो। इस पर कलेक्टर विफर पड़े...जिला बना नहीं और वो कलेक्टर कैसे बन गया...यहां का अभी मैं कलेक्टर हूं...पटवारी से चौहदी वाला इमिडियेट बंद करो। पता चला है, कलेक्टर की फटकार के बाद चौहदी लिखवाने वाला क्लॉज हटा दिया गया है। अब बिना चौहदी लिखवाए जमीनों की फिर से रजिस्ट्री होने लगी है। अब पटवारी बिलबिला रहे हैं, ओएसडी साब के पीछे इतना खरचा-पानी किए, सब बेकार गया।

छत्तीसगढ़ के पटवारी

पिछले हफ्ते जांजगीर से खबर थी....तीन पटवारी रंगरेलिया मनाते धरे गए। पकड़ने वाले भी कोई और नहीं, उन्हीं में से एक पटवारी की पत्नी थी। पति के बारे में जैसे ही पता चला, आस-पड़ोस के लोगों को लेकर धमक गई महिला के घर। वहां एक नहीं, तीन पटवारी पाए गए। तीनों की जमकर धुनाई हुई। हालांकि, बात ये भी सही है...छत्तीसगढ़ में पटवारी इतना पईसा पिट रहे...आखिर उसे खर्च कहां करें।

वेटिंग कलेक्टर, एसपी

जाहिर है, जनगणना के लिए प्रशासनिक सीमाओं को फ्रीज करने की सीमा 30 जून तय की गई थी। याने इसके बाद जिलों के स्वरूप में कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। ऐसे में, छत्तीसगढ़ सरकार ने पांच नए जिलों का ऐलान किया है, उसे 30 जून से पहले हर हाल में अमल में लाना पड़ता। मगर अब प्रशासनिक सीमाओं को फ्रीज करने की मियाद 31 दिसंबर तक बढ़ा दी गई है। याने सरकार को अब नए जिलों के गठन की कोई हड़बड़ी नहीं। अब 31 दिसंबर तक के लिए वो फ्री है। मगर पांचों जिलों के वेटिंग कलेक्टर और वेटिंग एसपी की बेचैनी समझी जा सकती है। जिले का गठन होगा, तभी कलेक्टर, एसपी बन पाएंगे। लेकिन, अब लगता है, दिल्ली अभी दूर है।

एसपी के घर चोरी

छत्तीसगढ़ के एक पुलिस कप्तान के पैतृक घर में पिछले हफ्ते चोर घुस गए। कप्तान के पैरेंट्स अंबिकापुर में रहते हैं। पारिवारिक शादी में वे बाहर गए थे, तभी चोरों ने धावा बोल दिया। इसमें खबर यह नहीं है कि एसपी के घर चोरी हो गई। खबर यह है कि चोरों को मायूस होकर हाथ मलते लौटना पड़ा। असल में, सूबे में इक्के-दुक्के ही सही, कुछ आईपीएस हैं, जो वर्दी और ओहदे का मान बचाकर रखे हुए हैं। तीन जिले के एसपी रहने के बाद भी कभी उंगली नहीं उठी। ऐसे एसपी के घर भला क्या मिलेगा।

व्हाट एन आइडिया!

छत्तीसगढ़ में एक ऐसा जिला है, जहां शहर के लगभग हर थाने में आपको फ्रीज मिल जाएगा। फ्रीज इसलिए कि जिले के कप्तान साब चिल्ड बियर पीने के शौकीन हैं। गश्त में भी उनकी गाड़ी में रोस्टेड काजू, बादाम रखा होता है। थानेदारों को कभी भी फारमान....10 मिनट में भिजवाओ। अब गरमी के दिन में शराब दुकानों में चिल्ड बियर कहां संभव है। सो, थानेदारों ने साब को खुश करने का रास्ता निकाला....थाने में फ्रीज और उसमें दर्जन भर बियर के कैन। साब के यहां फोन आता है और चिल्ड आइटम हाजिर। थानेदारों को सैल्यूट करना चाहिए और एसपी साहब को भी...क्या आइडिया निकाला। ़

इधर भी राहुल, उधर भी...

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के लिए गया सप्ताह काफी हैट्रिक रहा। भेंट-मुलाकात कार्यक्रम भी एक दिन के लिए सिर्फ पत्थलगांव विधानसभा का हो पाया। जशपुर का केंसिल करना पड़ा। दरअसल, राहुल गांधी से ईडी की पूछताछ के सिलसिले में उन्हें दो बार दिल्ली जाना पड़ा। तो उधर, पिहरीद में मिशन सेव राहुल ने भी सिस्टम को खूब छकाया। चार दिन और चार रात के बाद राहुल को बोरवेल से बाहर निकाला जा सका। सीएम इस पर लगातार नजर रखे रहे। वे खुद जिला प्रशासन के अधिकारियों के संपर्क में रहे तो राहुल के माता-पिता से वीसी के जरिये बात कर हौसला बढ़ाया। दिल्ली से लौटने पर राहुल को देखने वे रायपुर एयरपोर्ट से सीधे बिलासपुर गए। अगले दिन उन्होंने राहुल के बचाव कार्य में लगे लोगों को सम्मानित किया। तो उधर दिल्ली में राहुल के बचाव में उन्होंन सड़क पर धरना दिया। एक राहुल अपनी जीवटता और सरकार की मुस्तैदी से बच गया। अब देखना है, दिल्ली के राहुल ईडी से छुटकारा कैसे पाते हैं।

मीडिया माइलेज

राहुल गांधी से ईडी की पूछताछ के खिलाफ दिल्ली में कांग्रेस के बड़े नेताओं का जमावड़ा लगा, उसमें सीएम भूपेश बघेल को खासा मीडिया माइलेज मिला। दरअसल, कांग्रेस के पास सीनियर नेता ज्यादा बचे नहीं हैं। और जो हैं, उनमें पहले जैसे दमखम नहीं। कांग्रेस के पास इस वक्त दो ही मुख्यमंत्री हैं। अशोक गहलोत और भूपेश बघेल। गहलोत सीनियर हो चुके हैं, फ्रंटफुट पर खेलने वाले बचे भूपेश। यही वजह है, नेशनल मीडिया में सिर्फ भूपेश बघेल को सबसे अधिक वेटेज मिला। वो ईडी दफ्तर तक मार्च हो या फिर धरना स्थल, फोकस में भूपेश रहे। दिल्ली पुलिस ने भूपेश के काफिले को सड़क पर रोका, उस पर भी जमकर बवाल हुआ...केंद्र के खिलाफ उन्होंने तीखे तेवर दिखाए। कह सकते हैं, ईडी के खिलाफ प्रदर्शन से कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में भूपेश का वजन बढ़ा है।

कैडर रिव्यू

आईएएस का कैडर रिव्यू प्रपोजल भारत सरकार को चला गया है। अब आईपीएस की बारी है। आईपीएस का कैडर रिव्यू मई 2017 में हुआ था। सो, पांच बरस हो गया है। पता चला है, पीएचक्यू ने कैडर रिव्यू की फाइल तैयार कर ली है। एकाध हफ्ते में गृह विभाग को प्रपोजल भेज दिया जाएगा। गृह विभाग फिर उसे मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर को भेजेगा। छत्तीसगढ़ में अभी आईपीएस के 142 का कैडर है। इनमें डीजी के दो, एडीजी के सात, आईजी के 11, डीआईजी के 12 पद शामिल हैं। अब पांच जिले और बढ़ गए हैं। यानी पांच एसपी के पद चाहिए। नक्सल प्रभावित स्टेट और पांच नए जिले का हवाला देते हुए पुलिस मुख्यालय अबकी कैडर की संख्या 200 से ज्यादा करने की मांग करेगा। सीधा सा हिसाब है 200 की डिमांड होगी तो पौने दो सौ के करीब मिल जाएगा।

पुरंदेश्वरी का हंटर

पुरंदेश्वरी पिछले साल छत्तीसगढ़ बीजेपी की प्रभारी बनी थी तब भाजपा के भीतर ही दावे किए गए थे, अमित शाह ने पार्टी को ठीक करने भेजा है, अब सब कुछ बदल जाएगा। पुरदेश्वरी ने तब तेवर भी दिखाईं थीं। जगदलपुर चिंतन शिविर में हारे हुए मंत्रियों और बड़े नेताओं की इंट्री नहीं होने दी। इसके बाद फिर राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिवप्रकाश आए। शिवप्रकाश की अनुशासन की खूब दुहाई दी गई। मगर पार्टी की स्थिति वही...ढाक के तीन पात वाली ही है। राजधानी में हुई कार्यसमिति की बैठक में शिवप्रकाश और पुरंदेश्वरी की मौजूदगी में नेताओं की तल्खी फ्लोर पर आ गई। अब बीजेपी कार्यकर्ता पूछ रहे हैं, किधर हैं पुरंदेश्वरी के हंटर...? पुरंदेश्वरी के हंटर की स्थिति ये है कि विस चुनाव हारे हुए गौरीशंकर अग्रवाल को जगदलपुर चिंतन शिविर में प्रवेश नहीं मिला। मगर बाद में वे सबसे ताकतवर कोर कमेटी के मेम्बर बन गए।

डीआईजी की नौकरी

20 हजार रुपए के सागौन लकड़ी के चक्कर में बेचारे केंद्रीय सुरक्षा एजेंसी के एक डीआईजी को नौकरी गंवानी पड़ गई। छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाके में पोस्टेड डीआईजी साहब घर के लिए सागौन का फर्नीचर बनवाना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए ट्रक लेकर जवानों को नक्सल इलाके में किसी ठेकेदार के डिपो में भेज दिया। इसकी शिकायत हो गई। यह भी कि चार जवानों की जान आपने खतरे में डाला। नोटिस को देखकर डीआईजी साब समझ गए कि नौकरी गई। उन्होंने फौरन वीआरएस के लिए अप्लाई कर दिया। उपर वालों ने भी इस मामले में सदाशयता दिखा दी। वरना, वीआरएस भी संभव नहीं होता।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या राष्ट्रपति चुनाव में छत्तीसगढ़ से भी कोई प्रत्याशी हो सकता है?

2. आम आदमी पार्टी में छत्तीसगढ़ के एक बड़े नेता की इंट्री की खबर में कितनी सत्यता है?

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