Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ के इंजीनियरिंग, बीएड, नर्सिंग, फार्मेसी इंट्रेंस एग्जाम के 3 लाख अभ्यर्थियों के साथ गजब मजाक! आरक्षण के कारण व्यापम परीक्षा लेने में हिचकिचा रहा

Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ के इंजीनियरिंग, बीएड, नर्सिंग, फार्मेसी इंट्रेंस एग्जाम के 3 लाख अभ्यर्थियों के साथ गजब मजाक! आरक्षण के कारण व्यापम परीक्षा लेने में हिचकिचा रहा
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इमेज सोर्स- NPG News

छत्तीसगढ़ में इंजीनियरिंग में करीब 20 हजार, बीएड में 14 हजार, नर्सिंग में सात हजार और फार्मेसी में करीब 10 हजार सीटें हैं। सब मिलाकर करीब 51 हजार।

Chhattisgarh News: रायपुर। छत्तीसगढ़ के इंजीनियरिंग, बीएड, नर्सिंग, फार्मेसी में दाखिला के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा भी आरक्षण से प्रभावित हो रही है। पिछले साल अभी तक प्रवेश परीक्षा का कार्यक्रम घोषित होने के बाद फार्म भरना प्रारंभ हो गया था। मगर अभी तक व्यापम में इन चारों बड़ी परीक्षाओं को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं है। इन प्रवेश परीक्षाओं में प्रदेश में तीन लाख से अधिक छात्र हिस्सा लेते हैं। ये चारों व्यवासायिक कोर्स हैं। 12 वीं पास होने के बाद इन डिग्री और डिप्लोमा कोर्स करने के बाद रोजगार के अवसर खुल जाते हैं, लिहाजा स्कूली परीक्षा पूरी करने वाले छा़त्र-छात्राओं में इन परीक्षाओं को लेकर काफी उत्सुकता रहती है।

पिछले साल 8 अप्रैल को व्यापम ने परीक्षा कार्यक्रम घोषित कर दिया था। इस बार आरक्षण के लोचा के चलते स्थिति ऐसी है कि व्यापम के जिम्मेदार लोग भी कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं हैं। एनपीजी न्यूज ने व्यापम के एक वरिष्ठ अधिकारी से इस संबंध में बात की। उन्होंने माना कि इन प्रवेश परीक्षाओं में विलंब हो रहा है। मगर उपर से कोई क्लियरिटी नहीं है।

बता दें, छत्तीसगढ़ में इंजीनियरिंग में करीब 20 हजार, बीएड में 14 हजार, नर्सिंग में सात हजार और फार्मेसी में करीब 10 हजार सीटें हैं। सब मिलाकर करीब 51 हजार। जाहिर है, अभी तक एग्जाम का कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है, तो परीक्षा में भी विलंब होगा। इससे सत्र बाधित होगा। जानकारों का कहना है कि व्यापम का काम सिर्फ परीक्षा लेना है। व्यापम परीक्षा लेकर केटेगरी वाइज मेरिज लिस्ट तैयार कर संबंधित विभागों को सौंप देता है। उसके बाद विभाग और कालेज आरक्षण के हिसाब से प्रवेश देते हैं। याने आरक्षण का मामला प्रवेश के समय आता है। व्यापम को आरक्षण से कोई मतलब नहीं है।

क्या है आरक्षण विवाद

2012 में भाजपा सरकार ने आरक्षण को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 58 प्रतिशत कर दिया था। 2012 के संशोधन के अनुसार सरकारी नियुक्तियों और मेडिकल, इंजीनियरिंग तथा अन्य कालेजों में प्रवेश के लिए अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग का आरक्षण प्रतिशत 16 से घटाकर 12 प्रतिशत कर दिया गया था। वहीं, अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षण 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 32 फीसदी। जबकि, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण पहले की तरह 14 प्रतिशत यथावत रखा गया था। इसके खिलाफ मामला कोर्ट गया। कोर्ट ने सरकार के फैसले के खिलाफ फैसला देते हुए उसे खारिज कर दिया। मगर डबल बेंच ने उस पर स्टे मिल गया। उसके बाद से 58 प्रतिशत के हिसाब से सरकारी नियुक्तियां और प्रवेश परीक्षाओं में दाखिल मिल रहा था। भूपेश बघेल सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय को न केवल सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है बल्कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र में छत्तीसगढ़ आरक्षण संशोधन विधेयक पारित कर दिया। संशोधन विधेयक में अनुसूचित जनजाति को 32, अनुसूचित जाति को 13, अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 4 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। याने 76 प्रतिशत। विधानसभा में बिल पारित होने के बाद उसे राज्यपाल की मंजूरी के लिए राजभवन भेजा गया। मगर दिसंबर से वह लटका हुआ है। पूर्व राज्यपाल अनसुईया उइके ने स्पष्ट कर दिया था कि वे इस बिल को लेकर हड़बड़ी में नहीं हैं...विधिक सलाहकार से सलाह लेने के बाद ही वे कुछ फैसला लेंगी। अनसुईया उइके का मणिपुर ट्रांसफर हो गया। उनके बाद आए नए राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन ने भी इस पर अभी कोई फैसला नहीं लिया है।

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