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72 हजार वोट प्राप्त कर पिछला चुनाव जीते मनोज मंडावी आदिवासियों की मुखर आवाज़ रहे, जानिए कैसा रहा सियासी सफर

72 हजार वोट प्राप्त कर पिछला चुनाव जीते मनोज मंडावी आदिवासियों की मुखर आवाज़ रहे, जानिए कैसा रहा सियासी सफर
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manoj mandavi

By NPG News

दिव्या सिंह

रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा उपाध्यक्ष मनोज मंडावी का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया है। बताया जा रहा है कि मांडवी कांकेर से तड़के रायपुर आ रहे थे तब उन्हें दिल का दौरा पड़ा। मनोज मंडावी कांकेर जिले की भानुप्रतापपुर से विधायक थे। वे कुल तीन बार विधायक चुने गए। साल 2000 में प्रदेश के गृह राज्य मंत्री भी रहे । उन्हें आदिवासियों के प्रभावी नेता के रूप में जाना जाता था। आइए, मनोज मंडावी के जीवन व राजनैतिक सफर के बारे जानते हैं।

पारिवारिक जीवन:- मनोज मांडवी का जन्म 14 नवंबर 1964 को हरि शंकर मंडावी के घर हुआ था। वे छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के तेलगरा गांव के रहने वाले थे। उन्होंने 1986 में कला स्नातक की डिग्री के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की और 1988 में रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर से संबद्ध सरकारी डिग्री कॉलेज कांकेर से समाजशास्त्र में मास्टर ऑफ आर्ट्स की उपाधि प्राप्त की । मांडवी की शादी सावित्री मंडावी से हुई।

राजनीतिक कैरियर:- 1998 में मनोज मंडावी पहली बार म.प्र. विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। वे युवा कांग्रेस मध्य प्रदेश के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और महासचिव भी रहे। मंडावी ने 2003 में भानुप्रतापपुर निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के देव लाल दुग्गा से केवल 1379 मतों के अंतर से हार गए। 2008 के अगले विधानसभा चुनाव में, जब वे एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे, तब वे भाजपा के ब्रम्हानंद से 15479 मतों से हार गए। लेकिन 2013 में, मांडवी ने भानुप्रतापपुर निर्वाचन क्षेत्र में 64,837 मतों के साथ कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की। उन्होंने भाजपा के सतीश लतिया को हराया। उन्होंने 2018 छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में 72,520 वोटों के साथ इसे दोहराया। भाजपा के देव लाल दुग्गा को हराकर वे फिर विधानसभा पहुंचे। 30 नवंबर 2019 को, मंडावी ने चौथी छत्तीसगढ़ विधानसभा में उपाध्यक्ष पद के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया। वे 2 दिसंबर 2019 को सर्वसम्मति से इस पद के लिए चुने गए। मंडावी आदिवासियों की मुखर आवाज़ थे।उनकी पहचान अजीत जोगी के बेहद करीबी नेता के रूप में भी रही। वे सदन और सदन के बाहर भी बेबाक होकर छत्तीसगढ़ियों की आवाज़ उठाते रहे। राजनीति से इतर वे समाज सेवा, खेल, संगीत एवं आध्यात्मिकता की ओर भी प्रवृत्त रहे।

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