घोटाले की शिक्षा: छत्तीसगढ़ का स्कूल शिक्षा विभाग बना" संगठित भ्रष्टाचार का अड्डा" करोड़ों हो रहे वारे-न्यारे, पढ़िए NPG की खास रिपोर्ट
NPG News

रायपुर। छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग के अंदर हुए घोटालों की परत दर परत जैसे पोल खोल रही है उसे लेकर उच्च अधिकारी भी सकते में है। एक के बाद एक मामला सामने आते जा रहा है अगर सरकार सही तरीके से सारे मामलों की जांच करा लें तो यह मामला कई सौ करोड़ में पहुंच सकता है। पढ़े कौन कौन से मामलों में है बड़ी जांच की जरूरत
एनपीएस घोटाला:- 2018 तक लगभग डेढ़ लाख शिक्षाकर्मी पंचायत और नगरीय निकाय विभाग के अंतर्गत कार्यरत थे और उनके खाते से वेतन की 10% की राशि की कटौती एनपीएस के रूप में होती थी नियमानुसार तो काटे जाने के बाद राशि एनपीएस खाते में पहुंचनी थी। लेकिन यह समय पर कभी पहुंची ही नहीं। तत्कालीन समय में जनपद और जिला पंचायत सीईओ इसे अपने पास रखे रहते थे और बाद में जब 2018 में संविलियन हुआ तो कई जिलों से यह राशि राज्य कार्यालय पहुंची नहीं। जशपुर जिले में इसे लेकर संसदीय सचिव यू डी मिंज खुद कई बार लेटर लिख चुके है। सवाल यह खड़ा होता है कि जब कर्मचारियों के खाते से राशि की कटौती हुई थी तो वह राशि सरकार के पास पहुंची क्यों नहीं। अगर सरकार इसकी भलीभांति जांच करा दे तो कई सौ करोड़ रुपए अभी भी सरकारी कोष में जमा हो जाएंगे। अब एनपीएस में राशि भेजने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि सरकार खुद वह राशि केंद्र सरकार से वापस मांग रही है।
वेतन एरियर्स घोटाला:- 2018 में जब शिक्षाकर्मियों का संविलियन हुआ तब उसकी आड़ में भी बड़ा खेल हुआ है। पंचायत के बाबुओं ने कई शिक्षकों से सांठगांठ करके उनके खाते में एरियर्स के नाम पर बड़ी राशि डाली और फिर बंदरबांट कर ली गई। चूंकि शिक्षक पंचायत/नगरीय विभाग से स्कूल शिक्षा विभाग में जा रहे थे ऐसे में उनकी कर्मचारी आईडी भी समाप्त हो गई और इसी के आड़ में अंतिम एरियर्स के नाम पर यह खेल खेला गया। 2018 में 1 लाख 10 हजार शिक्षाकर्मियों के संविलियन होने के बाद भी 38000 शिक्षाकर्मियों का संविलियन होना शेष था। इसलिए आबंटन राशि आते रहे और मामले का खुलासा ही नही हुआ। जब 2020 में अंतिम संविलियन 16278 शिक्षाकर्मियों का हुआ तो उस समय के सितंबर अक्टूबर माह के वेतन का भुगतान आज तक सैकड़ों हजारों शिक्षाकर्मियों को नहीं हुआ है और वह अपने तरफ से लगातार उच्च अधिकारियों को पत्राचार कर रहे हैं।
इधर राज्य कार्यालय द्वारा जब निचले कार्यालय में तकालिक समय का आय-व्यय का हिसाब मांगा जा रहा है तो दिया ही नहीं जा रहा है। क्योंकि जितनी राशि दी गई थी वह पर्याप्त राशि थी। दरअसल, बांटते समय इसका पूरा बंदरबांट किया गया है यही वजह है कि जिन का हक था उन्हें राशि मिली नहीं और जिन का हक नहीं था उन्हें अधिक राशि दे दी गई है। पंचायत विभाग ने तो अतिरिक्त राशि भी जारी की है लेकिन अब नगरीय निकाय ने पूरी तरह हाथ खड़े कर लिए हैं। ऐसा नही है कि सिर्फ बाबू ही लाल हुए हैं अधिकारी भी खूब मालामाल हुए हैं। कुछ समय पहले उछले सक्ती एरियर्स मामले में तो हालत यह है कि कर्मचारियों से मोटी रकम वसूल कर सेटिंग की गई और फिर जिला पंचायत द्वारा राशि सीधे शिक्षकों के खाते में डाली गई है जबकि नियमानुसार ऐसा संभव ही नहीं है राशि भुगतान के लिए बीइओ और जनपद सीईओ को चेकर मेकर पद्धति से अधिकृत किया गया था जिसका खुला उल्लघंन किया गया और जनपद सीईओ को सिस्टम में लिए बिना ही सारा खेल हो गया ।
