सिकलसेल दिवस पर डाॅ0 आरएस दल्ला ने लोगों को किया आगाहः सिकलसेल से डरिये मत, इसे समझिए

इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि छत्तीसगढ़ में जानलेवा सिकलसेल के खिलाफ अलख जगाने कोई पहला आदमी खड़ा हुआ तो वे थे राजधानी के जाने-माने सर्जन डाॅ0 आरएस दल्ला। डाॅ0 दल्ला ने सिकलसेल के खिलाफ न केवल लोगों को जागृत करने का काम किया बल्कि इसके रोकथाम की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करने में भी उनका बड़ा रोल रहा। डाॅ0 दल्ला प्रोजेक्ट सिकल के अध्यक्ष रहने के साथ ही रेडक्राॅस सोसाइटी के चेयरमैन रह चुके हैं। 19 जून को वल्र्ड सिकलसेल दिवस है। इस मौके पर पढ़िये डाॅ0 दल्ला का विशेष आलेख-

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रतिवर्ष दिनांक 19 जून को पूरे विश्व में सिकल रोग जागरूकता दिवस मनाया जाता है, विश्व के पांच प्रतिशत लोग सिकल सेल रोग के वाहक है, दुर्भाग्यवश यह एक आनुवंशिक रोग है। सिकलसेल से प्रभावित लोग गरीब है, वंचित हंै और ऐसे विकासशील देशों के निवासी हैं, जहां विकास की किरण बहुत देर से पहंुती है। सिकलसेल रोग बहुतायत से अफ्रीका, केरेबियन देशों, अरब जगत एवं भारत में पाया जाता है।
यह चैंकाने वाला तथ्य है कि विष्व के सभी सिकलसेल रोगियों में से आधे रोगी भारत में रहते हैं। भारत में यह रोग गुजरात, मध्यप्रदेश, विदर्भ, ओड़िसा,झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों में व्याप्त हैं।प्रभावित जातियों में शिक्षा और जागरूकता का अभाव है। दुर्भाग्यवश एक लंबे समय तक यह व्याधि चिन्हित नहीं की जा सकी।
छत्तीसगढ़ प्रदेश में 70 प्रतिशत लोग आदिवासी, अनुसूचित जाति या पिछड़ी जातियों से संबंधित हैं। इन जनजातियों में सिकलसेल विकृति व्याप्त है, एक बड़ा इलाका मलेरिया की बीमारी से ग्रस्त हैं। रास्ते दुरूह है।दुरस्थ आदिवासी इलाकों में लोग छोटे-छोटे टोले-मंाजरों में रहते हैं। शिक्षा का अभाव है। गरीबी जानलेवा है। कुछ लोगों मंे सिकल रोगके संबंध में तरह-तरह की भ्रांतियां भी है। कुछ इसेे ईश्वर का अभिशाप मानते हैं। कुछ सोचते हैं कि पुरखों द्वारा मरे हुए पशु का मांस खाने से यह विकृति आई हैं। कुछ इलाकों में टोनही, काले जादू की भ्रांतियां है।बैगा-गुनिया इन भ्रांतियों को बढ़ावा देते हैं। ऐसे में सुदूर और दुर्गम इलाकों में स्वास्थ्य सेवायें पहुंचाना सरल नहीं है। फलस्वरूप यह स्वाभाविक है कि इस प्रदेश में 13 से 39 प्रतिशत लोग सिकल के वाहक चिन्हित होते है।
यद्यपि आधुनिक चिकित्सा में सिकलसेल जैसी वंशानुगत बीमारी को जड़ मूल से नष्टकरने की कोई दवा उपलब्ध नहीं है, तथापि अब यह रोग असाध्य नहीं हैै। इस रोग के समन्वित प्रबंधन से सिकल ग्रस्त रोगी 60 वर्ष से ऊपर की आयु प्राप्त कर एक सुखद जीवन प्राप्त कर सकता है। इस रोग से डरने की बजाय इसे समझने की आवष्यकता है।
रोग का प्रबंधन- 19 जून का दिवस जनजागरण दिवस के रूप में विशेष रूप से मनाया जाता है। इस दिन आम जनता को इस रोग को समझाने के साथ-साथ वह बतलाना आवष्यक है कि यदि सही उपाय किये जाये, तो इस रोग का प्रसार रोका जा सकता है, विवाह पूर्व परामर्श इसके प्रबंधन कामुख्य आधार है।
सिकलसेल व्यक्ति दो तरह के होते हैं- (1) पहला सिकल ग्रस्त रोगी (एसएस), जिनमें माता-पिता के दोनों जीन्स सिकल ग्रस्त होते है इसे सिकल रोगी कहा जाता है। और (2)दूसरा सिकलसेल वाहक (ए.एस) जिसमें माता या पिता से एक जीन (अंश) सिकल ग्रस्त एवं दूसरा जीन सामान्य होता है। सिकल जैसी वंशानुगत बीमारी में यदि दो रोगी (एस.एस) आपस में विवाह करते है, तो उनकी संतान सिकल की रोगी होगी। उन्हें परिवार नियोजन केस्थायी उपाय की सलाह दी जाती है। इसके विपरीत यदि दो सिकल वाहक आपस में विवाह करते है, तो इस विवाह के फलस्वरूप 25 प्रतिशत बच्चे सामान्य, 25 प्रतिशत रोगी (एस.एस) और 50 प्रतिशत बच्चे सिकल के वाहक होते है। यहां यह जान लेना आवष्यक है कि सिकल वाहक को किसी इलाज की आवष्यकता नही होती है और वे साधारण सुखद सुखी-स्वस्थ जीवन प्राप्त करते है। यदि दो वाहक आपस मेे विवाह कर भी लेते हैं, तो उन्हें डरने की कोई आवष्यकता नही है। उन्हे गर्भधारण के शुरूआती महीनों में गर्भजल का परीक्षण करा लेना चाहिए, यदि गर्भस्थ शिशु सिकल ग्रस्त रोगी है, तो ऐसे अवांछित शिशु से गर्भपातकराकर छुटकारा पाना वैधानिक है।
यहां यह बात उल्लेखनीय है कि हमारे वर्तमान मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने आज से 14 वर्ष पूर्व 27 मई 2004 को छत्तीसगढ़ में सिकल सेल नियंत्रण के लिए विधानसभा में एक संकल्प रखा था जो सर्वसम्मति से पारित हो चुका है। विधानसभा के इस संकल्प के बाद सिकल के कार्यो में गाति आई और रायपुर में सिकल सेल इंस्टीटृयूट (संस्था) की स्थापना हुई।
आज 19 जून को विष्व सिकल दिवस पर जनजागरण और अपने स्वास्थ्य के लिए आवाज उठाने का दिन है। हमें इस कार्य मे एक समन्वित प्रयास करना होगा। अब सिकल रोग के इलाज के लिए नये अनुसंधान हो रहे है, हाइड्रोक्सीयूरिया जैसी दवाओं ने भी बहुत राहत दिलाई है।सिकलसेल के इलाज को सिकलसेल का प्रबंधन कहना ज्यादा उचित होगा। यहां यह जानना आवष्यक है कि सिकल ग्रस्त बच्चों को 3 माह की आयु से 6 वर्ष की आयु तक निरंतर पेनिसिलीन की गोलियां और निमोकोकस वेक्सीन का टीका लगाकर संक्रमण की रोकथाम की जाती है। अन्य देशों में इस उपाय से सिकल ग्रस्त बच्चों की मृत्यूदर में चमत्कारिक कमी देखी गई है। अब सिकल ग्रस्त व्यक्ति पूरी आयु पा सकता है। सिकल रोग में शरीर का कोई भी अंग प्रभावित हो सकता है। सिकलसेल विकृति में मस्तिष्क, गुर्दे, तिल्ली, हृदय, हाथ-पैर के बड़े-छोटे जोड़ और हड्डियां प्रभावित हो सकते हैं।इस विकृति में पित्ताशय में पथरी और पैरों में घाव होने का अंदेशा रहता है। इस रोग में मुख्य रूप से रक्त की कमी या एनीमिया की शिकायत रहती है, जिसके लिए निशुल्क रक्त प्रदाय का प्रावधान है। सिकल रोग से होने वालीउपरोक्त सभी उलझनों (काम्पलीकेशन) का इलाज या प्रबंधन आसानी से किया जा सकता है।अतएव यह उचित होगा कि सिकल सेल प्रबंधन की उपरोक्त सभी सुविधाएं सिकल सेल संस्थान रायपुर मेे एक छत के नीचे ही उपलब्ध कराई जाए।
यह हर्ष का विषय है कि केन्द्र शासन ने अब दिव्यांग (विकलांग) व्यक्तियों को दी जाने वाली सभी सुविधाएं सिकल सेल रोगियों को भी उपलब्ध कराने का प्रावधान किया है। सिकल सेल रोगियों को आने-जाने के लिए रेल्वे यात्रा में छूट (कन्सेशन) भीउपलब्ध है। छत्तीसगढ़ के सुदूर अंचलोेे मे मोटर बस से आने-जाने की यात्रा मे भी छूट या कन्सेशन उपलब्ध कराना उचित होगा।
छत्तीसगढ़ शासन का नेतृत्व संवदेनशील और सजग है। हमारे माननीय मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री ने इस समस्या का संज्ञान लिया है। निष्चित रूप से हम एक अच्छे भविष्य की ओर अगे्रषित हो रहे हैं।
आओं ! 19 जून, को विष्व सिकल दिवस के अवसर पर हम सब ‘‘सुखद दिन 365’’ का आहृवान करें।

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