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सरकारी अंग्रेजी स्कूल बेसिक शिक्षा के लिए मील का पत्थर

स्कूली शिक्षा और मीडिया की भूमिका विषय पर 'छत्तीसगढ़ पावर गेम' का वेबिनार

सरकारी अंग्रेजी स्कूल बेसिक शिक्षा के लिए मील का पत्थर
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By NPG News

NPG मीडिया समूह की पत्रिका 'छत्तीसगढ़ पावर गेम' द्वारा स्कूली शिक्षा और मीडिया की भूमिका विषय पर आयोजित वेबिनार में यह बात निकल कर आई कि सरकारी अंग्रेजी स्कूल बेसिक शिक्षा के लिए मील का पत्थर साबित होगा। अधिकांश वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि ये और पहले हो जाना चाहिए था।

'छत्तीसगढ़ पावर गेम' के पांचवीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित वेबिनार में अमेरिका गवर्नमेंट के साफ्टवेयर इंजीनियर विश्वनाथ, दिल्ली इंजीनियरिंग कालेज के प्रोफेसर डॉ. नवकांत देव, सर्वशिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष विवके दुबे, पत्रकार और हाईकोर्ट वकील ब्यास मुनी द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार प्रभु पटेरिया, प्रायमरी शिक्षा के जानकार और सहायक शिक्षक प्रदीप पाण्डेय, शिक्षक अरबिंद दुबे और प्रवीण पाण्डेय ने हिस्सा लिया। छत्तीसगढ़ पावर गेम के संपादक संजय दीक्षित ने वेबिनार को होस्ट किया।


प्रयोगशाला बन चुके सरकारी

स्कूल: विवेक दुबे

वेबिनार के विशय पर प्रारंभिक प्रकाश डालते हुए शिक्षक नेता विवेक दुबे ने कहा कि जो व्यक्ति सरकारी नौकरी में चयनित नहीं हो पाता वह प्राइवेट नौकरी में जाता है फिर वह उससे बेहतर कैसे हो सकता है और वह व्यक्ति जिसने हजारों लाखों व्यक्तियों को हराकर सरकारी नौकरी हासिल की हो वह योग्य नहीं हो, ऐसा कैसे हो सकता है। दरअसल, इसके लिए आपको यह समझना होगा कि दोनों जिन परिस्थितियों में काम करते हैं उसमें कितना अंतर है । सरकारी स्कूलों में हमेशा आधे संख्या में ही शिक्षक होते हैं। कई बार तो क्लर्क और चपरासी तक नहीं होते और उनका भी काम शिक्षकों को ही करना पड़ता है। इसके बाद जनगणना का काम, इलेक्शन का काम, विभिन्न प्रकार के सर्वे का काम तो पहले से ही था अब तो तेंदूपत्ता की गिनती से लेकर चेकपोस्ट तक की ड्यूटी शिक्षकों के भरोसे ही हो गई है। हजारों बार विरोध के बाद भी जब भी किसी काम में ड्यूटी लगाने की बात हो तो सरकारी शिक्षकों को ही झोंका जाता है। इसके बाद प्रयोगशाला बन चुके सरकारी स्कूलों से आप प्राइवेट स्कूलों जैसे रिजल्ट की उम्मीद लगा रहे है तो ये गलत है ।

सरकारी स्कूलों में आठवीं तक पास करने की बाध्यता है चाहे बच्चा स्कूल आए या न आए, थोड़े बहुत अच्छे बच्चे जो होते हैं वह नवोदय और राष्ट्रीय प्रतिभा खोज में चले जाते हैं। बच्चों के घर का माहौल भी ऐसा है कि उनके परिजन अपने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दे ही नहीं पाते कई बार तो पैसों का इतना अधिक अभाव होता है कि वह सामान्य जूते तक नहीं खरीद पाते। चूंकि वह खुद पढ़े-लिखे नहीं होते इसलिए घरों में भी पढ़ाई लिखाई का माहौल नहीं होता, कक्षा में स्टूडेंट कितने रहेंगे उसका भी कोई पैमाना तय नहीं है जितने भी बच्चे आ जाए उन्हें एडमिशन देना है भले ही बैठने की जगह कम पड़ जाए ऐसे में एक कक्षा में 100-120 बच्चे वाले सरकारी स्कूलों की तुलना आप प्राइवेट स्कूलों में सीमित संख्या वाले कक्षाओं और पर्याप्त मात्रा में टीचर क्लर्क चपरासी और संपूर्ण संसाधन के बाद शाम को ट्यूशन की सुविधा पाने वाले बच्चों से करेंगे तो यह तुलना बेमानी नहीं तो और क्या है। प्राइवेट स्कूलों में जितना अधिक ध्यान दिया जाता है उससे अधिक तो उनके मां-बाप व्यक्तिगत तौर पर अपने बच्चों के लिए देते हैं। आपको हर प्राइवेट स्कूल का बच्चा ट्यूशन पढ़ता हुआ नजर आ जाएगा। अगर वहां की पढ़ाई इतनी ही अच्छी है तो सुबह 7 से 3 बजे तक लगने के बाद भी ट्यूशन पढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ती है।

होते रहें वर्कशॉप और

सेमिनार: विश्वनाथ

अमेरिका से इस वेबिनार में जुड़े साफ्टवेयर इंजीनियर विश्वनाथ ने कहा कि शिक्षा को रोजगारोन्मुखी बनाने के लिए स्कूलों को आईटीआई से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी स्कूल सरकार का स्वागतेय कदम है इसे और पहले खुल जाना चाहिए था। उन्होंने बताया कि अमेरिका में स्कूल विशेष के लिए शिक्षकों की भर्ती होती है। यानी जिस स्कूल में शिक्षक भर्ती होता है, वहां से उनका ट्रांसफर नहीं होता। इसलिए, वे मानकर चलते हैं कि हमें इसी स्कूल में अब रिटायरमेंट तक रहना है। भारत में भी ऐसा किया जा सकता है। इससे ट्रांसफर की जरूरत नहीं पड़ेगी और न ही कोई ट्रांसफर कराने की कोशिश करेगा। विश्वनाथ ने कहा कि इस स्कूली शिक्षा को लेकर इस तरह के वर्कशॉप और सेमिनार होते रहना चाहिए। सरकारी स्कूल के शिक्षकों को निजी स्कूल के शिक्षकों की अपेक्षा अधिक वेतन मिलता है इसके बावजूद गुणवत्ता वैसी नहीं मिल पाता आखिर क्यों?

गुणवता सिर्फ शिक्षकों पर

निर्भर नहीं: प्रदीप पाण्डेय

इस प्रश्न का जवाब में शिक्षक प्रदीप पाण्डेय ने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता केवल शिक्षकों पर निर्भर नहीं होती। शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं जैसे की पाठ्यक्रम बच्चों का पाठ्यक्रम कैसा बनाया गया है? क्या बच्चों के गति और स्तर की अनुरुप उनका पाठ्यक्रम बनाया गया है? हर बच्चा अपने आप में यूनिक होता है बच्चों में भिन्नता होती है ऐसे में क्या बच्चों के गति और स्तर के अनुरुप बच्चों को सीखने को स्वतंत्रता हमारा सिस्टम देता है। प्रदीप पांडेय ने बताया कि छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति बहुत अलग है एक तरफ जहां बस्तर क्षेत्र में हल्दी, गोंडी, तेलुगु, बोली जाती है वही मध्य छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा का उपयोग होता है। उत्तर की ओर जाएं तो जशपुर सरगुजा में कुरुख, सदरी भाषा बोली जाती है। छत्तीसगढ़ में स्थानीय भाषा पर पाठ्य पुस्तकों को तैयार तो किया गया है किंतु वह पर्याप्त नहीं है फिर इन भाषाओं को जानने वाले शिक्षक भी होने आवश्यक है। प्राथमिक स्तर पर बच्चा हमेशा अपनी मातृ भाषा में समझता है इसलिए इन भाषाओं के पर्याप्त पाठ्य सामग्री और जानकार शिक्षक होने आवश्यक है तभी बच्चा सीख पाएगा। इसके अलावा घर का वातावरण, सामाजिक परिवेश, विद्यालय का भौतिक वातावरण, टीएलएम भी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती है इस तरह देखा जाए तो केवल शिक्षक मात्र ही नहीं है जो गुणवत्ता के लिए उत्तरदायी है।

शिक्षा रोजगार परक होनी

चाहिए: व्यासममुनि

हाईकोर्ट के अधिवक्ता व्यास मुनी द्विवेदी ने विद्यालयों में रोजगारोन्मुखी शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य मात्र नौकरी प्राप्त करना रह गया है ऐसे ने विद्यालयों में शिक्षा रोजगार परक होनी चाहिए एक निश्चित कक्षा के बाद बच्चों को व्यवसायिक शिक्षा वर्तमान समय में आवश्यक हो गया है जिससे शिक्षा पूरी करने के बाद बच्चे बेरोजगार ना घूमें बल्कि उनके पास ऐसी कोई हुनर हो जिससे उनके रोजगार की व्यवस्था हो सके। शिक्षक चयन की प्रक्रिया को लेकर उन्होंने कहा कि रिमोट एरिया में शिक्षकों की हमेशा कमी बनी रहती है। ऐसा नहीं है कि उस क्षेत्र में शिक्षकों की भर्ती नहीं हो रही है भर्ती तो होती है किंतु कुछ समय पश्चात अपने बच्चों की पढ़ाई आवश्यक सुविधा इत्यादि के नाम पर शिक्षक शहरों में अपना ट्रांसफर करवा लेते हैं। सरकार को चाहिए कि रिमोट एरिया में शिक्षक भर्ती परीक्षा स्थानीय लोगों को विशेष महत्व जाए ताकि वे लोग वहीं रह कर नौकरी करें साथ ही रिमोट एरिया में सुविधाओं का विस्तार भी होना चाहिए शिक्षकों के लिए रहने के लिए आवास की व्यवस्था और स्वास्थ्य सुविधाएं यदि होंगी तो इन क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी की समस्या को दूर की जा सकती है।

क्वालिटी एजुकेशन पर

जोर: डॉ. नवकान्त देव

दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफ़ेसर डॉक्टर नवकान्त देव के अनुसार शिक्षक भर्ती में शिक्षाकर्मी प्रथा ने शिक्षा की गुणवत्ता में भारी नुकसान पहुंचाया है। कभी पंचायतों की माध्यम से तो कभी किसी को अनुकंपा नियुक्ति के नाम पर ऐसे अनेक शिक्षकों की भर्ती की गई जिनमें शिक्षक के गुण नही थे इस व्यवस्था ने भी शिक्षा की गुणवत्ता को काफी प्रभावित किया है। मैं यह नहीं कहता कि सभी शिक्षाकर्मी अच्छे शिक्षक नही हैं। अधिकांश शिक्षाकर्मी बहुत पढ़े लिखे हैं और बहुत तन्मयता के साथ बच्चों को पढ़ा रहे हैं। नव कांत देव ने यह भी कहा कि हमें क्वालिटी एजुकेशन पर ध्यान देना होगा इसके लिए शिक्षकों की पर्याप्त प्रशिक्षण हो प्रशिक्षण के लिए यह ध्यान रखना जरुरी होगा कि प्रशिक्षण शिक्षकों की शैक्षिक आवश्यकता उनके अनुरुप हो अधिकांशतया यह देखा गया है कि उच्च स्तर पर प्रशिक्षण की रुपरेखा तैयार कर ली जाती है और चाहे अनचाहे शिक्षकों को वह प्रशिक्षण बेमन से लेना पड़ता है। डॉ. नवकांत देव ने कहा कि सरकारी अंग्रेजी स्कूल छत्तीसगढ़ के स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा।

शुरु किए जाएं छोटे सर्टिफिकेट

कोर्स: अरबिंद शर्मा

शिक्षक अरबिंद शर्मा और प्रवीण पाण्डेय ने सरकारी अंग्रेजी स्कूल खोलने के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा अंग्रेजी स्कूलों से छत्तीसगढ़ की स्कूल शिक्षा में आमूलचूल बदलाव आएगा। उन्होंने कहा कि स्कूल शिक्षा की बेहतरी के लिए सरकार स्तर पर काफी प्रयास किए जा रहे हैं। स्कूली शिक्षा में दसवीं के बाद छोटे-छोटे सर्टिफिकेट कोर्स प्रारंभ करना चाहिए। ताकि, जिसे आगे की पढ़ाई नहीं करनी, वह इन व्यवसायिक पाठ्यक्रम करके अपने पैरों पर खड़ हो सकें

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