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संसद में शोक संतप्त गणतंत्र की आवाज आपने सुनी क्या: देश की संसद को किसने कहा ”साझा माफ़ीनामा भेजिए उनके नाम जिनकी लाशें गंगा में तैर रही थीं…

नई दिल्ली,21 जुलाई 2021।कोरोना काल ने दो कैलेंडर वर्षों को ही जैसे ग़ायब कर दिया, जीवन ठहर गया तो कईयों का जिनकी संख्या करोड़ों में कितनी है इसका सही आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि “सिस्टम” में सही दर्ज नहीं है इसलिए बताया जाना संभव नहीं है, ऐसे कई करोड़ लोग दशकों या कि पूरी ज़िंदगी के लिए स्थाई शोक के साथ ज़िंदगी गुज़ारेंगे और वो ज़िंदगी भी कैसी होगी इसकी गारंटी नहीं है क्योंकि “सिस्टम” में ऐसा किसी व्यवस्था की एंट्री का कोई कॉलम तैयार नहीं है,इसलिए इसका ब्यौरा भी दर्ज नहीं है।मस्तिष्क में नदियों में बहता शव, ऑक्सीजन के लिए तड़पते मरीज, उनके लिए बिलखते परिजन, रिक्शे में मरणासन्न पति को मुंह से सांसे देकर ज़िंदा रखने की असफल कोशिश करती पत्नी, अस्पताल में बेड के लिए चीखते लोग, श्मशान में मुर्दों के जलने की इंतज़ार की कतार, लाशों का अधजला फेंकाना, कुत्तों का उन टूकडों को नोचना, अपने परिजनों को आख़िरी बार ना देख पाने की बेबसी,यह सब भयावह दु:स्वप्न की तरह दर्ज हो गया है, जो मिटाए नहीं मिट रहा है।
इनमें उनकी तो बात ही नहीं है जिनके रोज़गार ख़त्म हो गए,उनके भी आँकड़े उपलब्ध नहीं है, क्योंकि सिस्टम में ऐसा कोई कॉलम नहीं है। पर खुदकुशी और परिवार की हत्या की खबरें जरुर हैं और उनके आंकड़े जिन थानों में दर्ज हुए होंगे उसमें ब्यौरा क्या होगा यह अभी बता पाना मुश्किल है।

इन सबके बीच देश की संसद चल पड़ी है। देश की संसद में बहस मुबाहिसों का दौर गए दौर की बात है, आरोप प्रत्यारोप के शोर से संसद गुंज रही है। जिस त्रासदी से देश अब तक उबरा नहीं है उसे छोड़ देश की संसद के सामने चर्चा के लिए कई और मुद्दे चलायमान हैं जिन पर संसद व्यस्त है।
लेकिन इन सबके बीच देश की संसद में एक आवाज गुंजी है जिसने ध्यान खींच लिया है। यह आवाज दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे और राजग से राज्यसभा सदस्य प्रोफ़ेसर मनोज कुमार झा की आवाज है।

आठ मिनट और छ सेंकड का यह व्यक्तव्य है जो कि यह नहीं कहा जा सकता कि यह राज्यसभा में दिया भाषण है।यह व्यक्तव्य इस कदर प्रभावकारी है कि अब तक इसे लाखों लोग देख चुके हैं और देख रहे हैं। बग़ैर किसी आरोप प्रत्यारोप के प्रोफ़ेसर मनोज झा ने जो कहा है, वह करोड़ों करोड़ भारतीय अपनी आवाज़ मान रहे हैं।
प्रोफ़ेसर मनोज झा ने जो कहा वो इस खबर के साथ वीडियो में मौजुद है। पर उनकी कही बातों का कुछ अंश जो व्यवस्था पर करारा तमाचा है वो हम यहा लिख दे रहे हैं –
1-“कोई भाषण की शक्ल नहीं है,ये एक शोक संतप्त गणतंत्र का एक अदना नागरिक समझिए.. उसकी ओर से कुछ बातें कही जा रही हैं”
2-“माफी नामा उन तमाम लोगों को जिनकी मौत को हम एक्नॉलेज नहीं कर रहे हैं..जो हम जान ही रहे हैं कि वो मारे गए हैं”
3-“हम सबको एक साझा माफ़ीनामा उन लोगों के नाम भेजना चाहिए, जिनकी लाशें गंगा में तैर रही थीं”
4-“पीड़ा व्यक्तिगत है,आँकड़ा मैं नही कहना चाहता हूँ, यह मेरा आँकड़ा यह तुम्हारा आँकड़ा, अपनी पीड़ा में आँकड़ा ढूँढिए”
5-“हमको कौन सा आँकड़ा कोई बताएगा साहब!हमें देखना है कि जो लोग चले गए वो ज़िंदा दस्तावेज छोड़कर गए हैं हमारे फेलियर का..
6- मैं आपकी बात नहीं कर रहा हूँ साहब, आप कहेंगे सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ, मैं उसमें जाना ही नहीं चाहता ये कलेक्टिव फेलियर है..अब तक की सरकारों का।यह क्या बना दिया हमने
अरसा हुआ कि देश की संसद में जब कुछ कहा जाता था तो उसकी गंभीरता की गूंज दूर तक देर तक होती थी। उच्च मानदंडों को स्थापित करने वाली देश की संसद में अरसे बाद कोई आवाज़ ऐसी आई है जिसने देश का ध्यान फिर खींचा है।
राज्यसभा सदस्य प्रोफ़ेसर मनोज कुमार झा ने देश में राईट टू हैल्थ याने स्वास्थ्य का अधिकार क़ानून बनाने और लागू करने की बात कही है, इन शब्दों के साथ कि
बहुत बड़ी-बड़ी बातें नए नए क़ानूनों की हो रही हैं,राईट टू हैल्थ की बात क्यों नहीं करते हम लोग..स्वास्थ्य का अधिकार..उसमें कोई किंतु परंतु कुछ भी नही सीधे तौर पर स्वास्थ्य का अधिकार, कांस्टीट्यूशनली गारंटेड राईट टू लाईफ के साथ लिंक करिए.. किसी अस्पताल की मजाल नहीं होगी कि वो खिलवाड़ कर पाए उस राईट टू लाईफ का.. हम कर सकते हैं इस सदन में और उस सदन में…

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