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छत्तीसगढ़ में रेशम के धागे ग्रामीणों के आजीविका के साधन बने, महिलाएं हो रही आत्मनिर्भर...

छत्तीसगढ़ में रेशम के धागे ग्रामीणों के आजीविका के साधन बने, महिलाएं हो रही आत्मनिर्भर...
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By Gopal Rao

रायपुर 23 जून 2023। छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने अब आजीविका आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का लक्ष्य तैयार किया है। इसके नतीजे भी हर गांव में नजर आने लगे हैं। सरगुजा में रेशम उत्पादन के कारोबार से करीब 14 गांवों की महिलाओं के समूह के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराया गया है, जिससे वे आर्थिक तौर पर सशक्त बन रही हैं। इस कार्य से एक महिला धागा प्रसंस्करण इकाई में अगर 25 दिन काम करती है तो उसकी मासिक आय 5000-7000 रुपए बड़ी आसानी से हो रही है। पूरे राज्य में इस कारोबार से 50 हजार से ज्यादा लोगों को जोड़ा जा चुका है। छत्तीसगढ़ को रेशम की दो प्रजाति टसर और मलबरी रेशम के लिए जाना जाता है। टसर वन सिल्क कहलाता है, जिसका राज्य के वनांचल में बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है।


मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने रेशम उत्पादन को आजीविका से जोड़कर इसे ग्रामोद्योग तक सीमित रखने के बजाए फैलाने पर जोर दिया था। अब इस कारोबार को उत्पादन तक सीमित करने के बजाए धागा और कपड़ा बनाने तक बढ़ाया जा रहा है। यह कारोबार प्रदेश के सभी जिलों में जोर पकड़ चुका है। ग्रामोद्योग विभाग गांवों में रह रहे कृषक परिवारों को उन्हीं के क्षेत्रों में रेशम से जुड़े कारोबार के माध्यम स्वरोजगार उपलब्ध करवा रहा है। इसके लिए कई योजनाओं को संचालित किया जा रहा है। राज्य सरकार द्वारा टसर रेशम विकास एवं विस्तार योजना के अंतर्गत कृमि पालकों को टसर स्वस्थ डिम्ब समूह सहायता और टसर ककून के उत्पादन के लिए 423 केन्द्र संचालित हैं। विभाग एवं अन्य योजना मद और प्राकृतिक वन खंडों में 10 हजार 486 हेक्टेयर टसर खाद्य पौधारोपण उपलब्ध है। नैसर्गिक टसर कोसा उत्पादन योजना के अंतर्गत बस्तर संभाग के सात जिलों में साल बहुल वन खंडों में ककून का उत्पादन होता है। इस योजना के तहत वर्ष 2022-23 में 100 नैसर्गिक कैंपों का आयोजन किया गया, जिसमें 514.59 लाख नग कोसा का संग्रहण किया गया है जिसमें 18 हजार 359 हितग्राही लाभान्वित हुए। जिसमें 1826 अनुसूचित जाति एवं 11125 अनुसूचित जनजाति के संग्राहकों को लाभ मिला है।

ये है टसर स्वस्थ समूह

सहायता योजना

टसर स्वस्थ समूह सहायता योजना अंतर्गत कृमि पालकों को दो रुपए प्रति टसर स्वस्थ डिम्ब (अंडाशय) रियायती दर पर उपलब्ध कराया जाता है। पालित टसर रेशम विकास एवं विस्तार योजना के अंतर्गत 23 लाख 29 हजार टसर स्वस्थ डिम्ब समूह का कृमि पालन किया गया, जिसमें 751.48 लाख नग टसर ककून का उत्पादन हुआ। इसे सात हजार 803 कृमि पालक हितग्राहियों द्वारा तैयार किया गया। जिसमें से 753 अनुसूचित जाति एवं 4819 अनुसूचित जनजाति के हितग्राही टसर ककून का उत्पादन कर लाभान्वित हुए है। पालित प्रजाति के टसर समूह उत्पादन करने वाले प्रमुख जिले रायगढ़ 123 लाख नग, कोरबा 121 लाख नग, जशपुर 105 लाख नग, जांजगीर 86 लाख नाग, अंबिकापुर 66 लाख नग, जगदलपुर 56 लाख नग, बिलासपुर 49 लाख नग, बलरामपुर 29.60 लाख नग, कोरिया 21.27 लाख नग और रायपुर संभाग के सभी जिलों में 31.78 लाख नग टसर ककून का उत्पादन हुआ है।


एक गांव की 216 महिलाएं निकाल रहीं रेशम कोकून से धागा

सरगुजा जिले की ग्राम पंचायत बेलखरिखा के लक्ष्मीबाई ग्राम संगठन को राष्ट्रीय आजीविका मिशन के नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इस गांव की 216 महिलाएं रेशम कोकून से धागा निकालने के कारोबार से जुड़ी हैं। यहां कोसा कोकून का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है, जिसे बाहर के कारोबारी और विभाग खरीद लिया करते हैं। यहां वर्ष 2010 से गांव की महिलाएं रेशम धागा निकालने का काम कर रही हैं। धागे तैयार कर अपनी आजीविका चला रही हैं। इस कार्य से महिलाएं आर्थिक रुप से मजबूत बन रही हैं।





आत्मनिर्भरता का नया मंत्र

रेशम धागाकरण कार्य से श्रीमती सुलेखा यादव स्वावलंबन की राह पर बढ़ रही हैं। रेशम धागाकरण कार्य से उन्हें आर्थिक लाभ हुआ है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है। सुलेखा बताती हैं कि रेशम धागाकरण कार्य महिलाओं को रोजगार दिलाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान निभा रहा है। रेशम धागाकरण कार्य से जुड़कर वह अपने साथ-साथ अपने परिवार का सपना पूरा करने में सक्षम हुई हैं। अपने लिए खरीदा हार बेलखरिखा गांव की फरीदा बेगम ने बताया कि रेशम से धागा निकालने वाली महिलाएं सरकार के इस सहयोग से बेहद खुश हैं। इनका कहना है कि उन्हें पहले मटके से धागा निकालना पड़ता था, लेकिन नई स्पिनिंग मशीन मिल जाने से सब कुछ बहुत आसान हो गया है। समय की बचत हो रही है, साथ ही आमदनी भी बढ़ गई है। उन्होंने तो अपने लिए सोने का हार भी बनवाया है।

नए काम में पैसे ज्यादा

पुहपुटरा गांव की मीना राजवाड़ा ने बताया कि वे घरेलू काम किया करती थीं। दोपहर के बाद का समय खाली होता था। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पैसों की कमी के कारण उन्होंने इस काम में हिस्सा लेने का फैसला किया। विभाग की तरफ से ट्रेनिंग हुई और मशीन दी गई। अब मीना का कहना है कि रोजगार मिल गया है और आगे बढ़ने का मकसद भी। वो इस काम को आगे बढ़ाकर व्यवसाय शुरु करना चाहती हैं। इसी गांव की सूरजमणि बताती हैं कि हमने इससे पहले कई काम शुरु करने के प्रयास किए थे, लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई। हमारे पास घरेलू काम के अलावा कोई दूसरा हुनर नहीं है। ऐसे में यह काम नया है और इसमें पैसे भी अधिक मिलेंगे। दुलेश्वरी ने बताया कि उनके पास पहले पैसों का काफी अभाव रहता था, अपने छोटे-छोटे खर्च के लिए दूसरे के सामने हाथ फैलाना पड़ता था, लेकिन अब धागा निकालने का काम सीख लिया है। जिससे महीने में अच्छी कमाई हो जाती है और घर की आर्थिक स्थिति भी सुधर गई है। हम अपने परिवार की तरफ से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को धन्यवाद करते हैं कि हमे गांव में ही रोजगार दिला दिया है।

मलबरी रेशम के 606 एकड़

क्षेत्र में कीटों का पालन

शहतूत के पौधे पर पाले गए मलबरी किस्म के रेशम के कीड़े के द्वारा उत्पादित रेशम के धागे सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। इसका रंग पीला व सफेद होता है। राज्य में इसके विस्तार के लिए 68 केन्द्र महिला स्व सहायता समूहों के माध्यम से पौधे व कीटो के पालन का कार्य 606 एकड़ क्षेत्र भूमि में किया जा रहा है। वर्ष 2022-23 में 1 लाख 66 हजार से ज्यादा स्वस्थ कीट पालन कर 52 हजार 106 किग्रा मलबरी ककून का उत्पादन किया गया है। जिससे 1565 कीट पालक हितग्राहियों को लाभमिला है।

शहतूत रेशम बाड़ी योजना

रेशम बाड़ी योजना अंतर्गत लघु एवं सीमांत किसानों की निजी भूमि पर 527 एकड़ क्षेत्र में उन्नत प्रजाति के शहतूत पौधारोपण किए जाने का लक्ष्य रखा है। जिसमें 527 हितग्राहियों को लाभान्वित करना है, अभी तक 98 लघु व सीमांत किसानों के यहां उन्नत प्रजाति का पौधारोपण किया जा चुका है।

मुख्यमंत्री रेशम मिशन

ग्रामीण व्यवस्था को दखे ते हुए प्रदेश के बस्तर संभाग एवं अन्य जिलों में 18 ककन बैंकों के माध्यम से पालित डाबा टसर ककन का धागाकरण करने के लिए 3 हजार 921 धागाकरण मशीनें हितग्राहियों को अलग-अलग योजनाओं के तहत दी गई हैं। जिसमें 1 हजार से ज्यादा हितग्राहियों को रोजगार से सीधे जोड़ा गया है। उन्होंने अब तक 155.56 लाख टसर ककून से 5 हजार 261 किग्रा टसर रील्ड एवं धागा का उत्पादन किया है। रेशम विभाग द्वारा संचालित एवं कियान्वित सभी योजनाओं से 50 हजार से ज्यादा हितग्राही एवं श्रमिक लाभान्वित हो रहे है। जिससे राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था तेजी से मजबूत हो रही है।

975 एकड़ में शहतूत रोपने की तैयारी

राज्य में सिल्क समग्र योजना-2 के तहत निजी क्षेत्र में किसानों की निजी भूमि पर रेशम विस्तार कार्य किया जा रहा है। वर्ष 2023-24 में सिल्क समग्र योजना के क्रियान्वयन के लिए कृषकों का चयन किया जा रहा है। लगभग 975 एकड क्षेत्र पर शहतूत पौधरोपण किये जाने की प्रारंभिक तैयारी प्रारंभ कर दी गई है। योजना में 53 लाख 62 हजार उन्नत प्रजाति के शहतूत पौधे तैयार किये जा रहे हैं, जिनका रोपण जुलाई-अगस्त में किया जायेगा।

नैसर्गिक टसर संग्रहण करने वाले जिले

  • जशपुर 79.60 लाख नग
  • जांजगीर 47.36 लाख नग
  • जगदलपुर 42.15 लाख नग
  • कोरबा 39.59 लाख नग
  • बलरामपुर 39.86 लाख नग
  • नारायणपुर 15.50 लाख नग
  • सुकमा 13.50 लाख नग
  • बस्तर संभाग 15 लाख नग

रेशम अधिकारियों को प्रशिक्षण

किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए रेशम पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है, छत्तीसगढ़ में इसके लिए सिल्क समग्र योजना-2 शुरू की गई है। इस योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए राज्य के 14 जिलों के रेशम अधिकारियों के तकनीकी उन्नयन के लिए केन्द्रीय रेशम बोर्ड बेंगलूरू और ग्रामोद्योग विभाग के रेशम प्रभाग के संयुक्त तत्वाधान में 5 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। प्रशिक्षण में अधिकारियों को किसानों को सहायता, कृषकों को प्रशिक्षण, विस्तार प्रबंधन, रेशम उत्पादन एवं व्यावसायिक उद्देश्य, क्लस्टर एप्रोच, शहतूती पौधों का विकास एवं प्रबंधन, रेशम विस्तार कृषकों के यहां बुनियादी सुविधाओं का विकास, अधोसंरचनाओं का निर्माण, शहतूत पौधों के रोग एवं कीट प्रबंधन, रेशम कीट पालन प्रबंधन एवं सावधानियां की जानकारी दी गई। इस प्रशिक्षण में जशपुर, सरगुजा, बलरामपुर, सूरजपुर, कोरबा, रायगढ़, जांजगीर-चांपा, रायपुर, मुंगेली, बिलासपुर, कांकेर, बस्तर, नारायणपुर, कोण्डागांव जिलों से जिला अधिकारी एवं प्रक्षेत्र अधिकारी शामिल हुए।

Gopal Rao

गोपाल राव: रायपुर में ग्रेजुएशन करने के बाद पत्रकारिता को पेशा बनाया। विभिन्न मीडिया संस्थानों में डेस्क रिपोर्टिंग करने के बाद पिछले 8 सालों से NPG.NEWS से जुड़े हुए हैं। मूलतः रायपुर के रहने वाले हैं।

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