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Bilaspur High Court: बड़ी खबर: राज्य सरकार को हाई कोर्ट का झटका: सारंगढ़ नगर पालिका अध्यक्ष को पद से हटाने के फैसले को किया रद्द

Bilaspur High Court: बिलासपुर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच के फैसले से राज्य सरकार को झटका लगा है। राज्य सरकार ने सारंगढ़ नगर पालिका अध्यक्ष को पद से हटाने के साथ ही पांच साल के लिए अयोग्य ठहरा दिया था।

Bilaspur High Court: बड़ी खबर: राज्य सरकार को हाई कोर्ट का झटका: सारंगढ़ नगर पालिका अध्यक्ष को पद से हटाने के फैसले को किया रद्द
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By Radhakishan Sharma

High Court Ka Faisla: बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच के फैसले से राज्य सरकार को झटका लगा है। राज्य सरकार ने सारंगढ़ नगर पालिका अध्यक्ष को पद से हटाने के साथ ही पांच साल के लिए अयोग्य ठहरा दिया था। डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार के फैसले को रद्द करने के साथ ही सिंगल बेंच के फैसले को खारिज कर दिया है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है,छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा 41-ए के तहत निर्वाचित नगरपालिका अध्यक्ष को हटाना और अयोग्य घोषित करना तब तक उचित नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि यह कार्रवाई व्यक्तिगत दोषसिद्धि के विशिष्ट निष्कर्षों के बिना सामूहिक निर्णयों पर आधारित हो। फैसले से पहले प्राकृतिक न्याय सिद्धांत का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है।

याचिकाकर्ता सोनी अजय बंजारे ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव श्रीवास्तव और अधिवक्ता जितेंद्र पाली के माध्यम से सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ नगर पालिका अधिनियम, 1961 की धारा 41-ए के तहत राज्य सरकार द्वारा 02 जुलाई 2025 को पारित आदेश को चुनौती देते हुए रिट याचिका की थी, जिसमें उसे सारंगढ़ नगर परिषद के अध्यक्ष पद से हटाया गया था और उन्हें अगले कार्यकाल के लिए उक्त पद धारण करने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद सिंगल बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया था। डिवीजन बेंच में दायर रिट याचिका में याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार की कार्रवाई को मनमाना बताते हुए कहा, 1961 के अधिनियम की वैधानिक योजना का उल्लंघन करती है और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का अवैध रूप से हनन करती है।

क्या है मामला

याचिकाकर्ता सोनी अजय बंजारे स्थानीय निकाय चुनाव में सारंगढ़ नगर परिषद की पार्षद चुनी गईं और उसके बाद 3 जनवरी 2022 से सारंगढ़ नगर परिषद की अध्यक्ष चुनी गईं। उनके कार्यकाल के दौरान, नगर परिषद के कामकाज का संचालन छत्तीसगढ़ नगर पालिका अधिनियम, 1961 और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के प्रावधानों के अनुसार किया गया। अध्यक्ष रहते हुए, सारंगढ़ नगर परिषद की सीमा के भीतर विभिन्न स्थानों पर स्थित नगर निगम की कुछ भूमि निजी व्यक्तियों को दुकानों के निर्माण या विस्तार के लिए पट्टे पर आवंटित की गई थी। ये आवंटन मौजूदा दुकानों से सटे छोटे भूखंडों से संबंधित थे और अध्यक्ष इन कौंसिल PIC के प्रस्तावों द्वारा अनुमोदित किया गया था, और बाद में नगर परिषद की आम सभा के समक्ष रखा गया था।

आरोप है, राज्य सरकार की स्वीकृति प्राप्त करने से पहले और छत्तीसगढ़ नगरपालिका (अचल संपत्ति का हस्तांतरण) नियम, 1996 के तहत निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही नगरपालिका भूमि का कब्जा लाभार्थियों को सौंप दिया गया था। आवंटनों में प्रीमियम और किराए के भुगतान पर निर्दिष्ट अवधी के लिए नगरपालिका भूमि को पट्टे पर देना शामिल था। भूमि के अनियमित और अनाधिकृत आवंटन के आरोपों से संबंधित प्राप्त शिकायतों के आधार पर, शहरी प्रशासन एवं विकास विभाग द्वारा मामले की जांच की गई। परिणामस्वरूप, छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा 41-ए का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता को 12. मार्च 2025 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें उनसे यह स्पष्टीकरण देने को कहा गया कि वैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन में नगरपालिका भूमि के आवंटन के आरोप पर उन्हें अध्यक्ष पद से क्यों नहीं हटाया जाना चाहिए और अयोग्य क्यों घोषित किया जाना चाहिए।

नोटिस का जवाब देने के बाद राज्य सरकार ने की एकतरफा कार्रवाई

याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने कारण बताओ नोटिस के जवाब में आरोपों का खंडन करते हुए यह तर्क दिया कि आवंटन परिषद अध्यक्ष और नगर परिषद के प्रस्तावों के अनुसार किए गए थे, आवंटन का उद्देश्य नगर निगम के राजस्व को बढ़ाना था, और इसमें कोई दुर्भावना या व्यक्तिगत लाभ शामिल नहीं था। अपने जवाब में कहा कि निर्णय सामूहिक प्रकृति के थे और मुख्य नगर अधिकारी द्वारा लागू किए गए थे।

राज्य सरकार ने 02 जुलाई 2025 को एक आदेश पारित किया जिसमें यह माना गया कि नगरपालिका भूमि का आवंटन अनिवार्य वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना और सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना किया गया था। राज्य सरकार का यह मत था कि अपीलकर्ता का अध्यक्ष पद पर बने रहना जनहित में वांछनीय नहीं है, इसलिए उसने अधिनियम, 1961 की धारा 41-ए के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उन्हें पद से हटाने का आदेश दिया। राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता को अगले कार्यकाल के लिए भी अयोग्य घोषित कर दिया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दिया ये तर्क

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सीनियर एडवोकेट राजीव श्रीवास्तव ने डिवीजन बेंच के सामने पैरवी करते हुए कहा, कथित अनियमितताएं, यदि सच भी मान ली जाएं, तो भी अधिक से अधिक प्रक्रियात्मक या तकनीकी चूक ही है, जिनमें व्यक्तिगत लाभ, भ्रष्टाचार या जानबूझकर किए गए किसी भी प्रकार का कोई तत्व नहीं है। अधिवक्ता से सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला देते हुए कहा, निर्वाचित पदाधिकारी को पद से हटाना केवल छिटपुट या मामूली त्रुटियों के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है, और धारा 41-ए का प्रयोग केवल गंभीर, आदतन या दुर्भावनापूर्ण दुराचार से जुड़े मामलों में ही किया जा सकता है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में ये कहा

0 इस न्यायालय के समक्ष विचारणीय मुद्दा यह है कि क्या अधिनियम, 1961 की धारा 41-ए के तहत लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नगर पालिका अध्यक्ष को हटाने की असाधारण शक्ति का प्रयोग अधिनियम के अनुरूप किया गया है। वैधानिक जनादेश, प्रशासनिक कानून के स्थापित सिद्धांतों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार।

0 आरोप है कि परिषद अध्यक्ष द्वारा सामूहिक रूप से लिए गए और नगर परिषद द्वारा अनुमोदित निर्णयों के संबंध में अपीलकर्ता और अन्य पार्षदों को कदाचार का दोषी ठहराया गया था। जांच रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज केवल अपीलकर्ता को कारण बताओ नोटिस के साथ उपलब्ध कराए गए थे, जबकि अन्य पार्षदों को जानबूझकर इनसे वंचित रखा गया था।

जांच रिपोर्ट में प्रक्रियात्मक चूक, अनुमतियों के समय से पहले जारी होने, पट्टा विलेखों के दोषपूर्ण निष्पादन और वैधानिक औपचारिकताओं के अनुपालन न करने के लिए मुख्य नगर अधिकारी और राजस्व प्रभारी को विशेष रूप से जिम्मेदार ठहराए जाने के बावजूद, उनके खिलाफ कोई आनुपातिक या उचित कार्रवाई नहीं की गई है, जबकि केवल याचिकाकर्ता को ही पद से हटाने और अयोग्य घोषित करने की कड़ी सजा दी गई है।

0 समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार और व्यक्तिगत दोष सिद्ध किए बिना याचिकाकर्ता को अलग करना स्पष्ट रूप से एक पूर्व निर्धारित, भेदभावपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसका एकमात्र उद्देश्य याचिकाकर्ता को अध्यक्ष पद से हटाना है। यह आचरण न केवल प्राकृतिक न्याय, विधि के समक्ष समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, बल्कि छत्तीसगढ़ नगर पालिका अधिनियम, 1961 की धारा 41-ए के तहत अनिवार्य आवश्यकता का भी उल्लंघन करता है, जो राज्य सरकार को बाध्य करता है कि वह

0 डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा, हमें इस तर्क में भी दम लगता है कि धारा 41-ए के प्रावधान, जिसमें सुनवाई का उचित और प्रभावी अवसर अनिवार्य है, का उसके वास्तविक अर्थ में पालन नहीं किया गया है। उचित अवसर में अनिवार्य रूप से सभी प्रासंगिक सामग्री की उपलब्धता और बचाव पक्ष द्वारा उठाए गए तर्कों पर सार्थक विचार शामिल है। सिंगल बेंच यह ध्यान देने में विफल रहे कि जब तर्क यांत्रिक हो और निष्कर्ष पूर्व-निर्धारित हों, तो केवल सुनवाई की औपचारिकता वैधानिक आवश्यकता को पूरा नहीं करती है।

सिंगल बेंच के फैसले को डिवीजन बेंच ने किया निरसत

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा, सिंगल बेंच ने रिट याचिका को खारिज करने और विवादित आदेश को बरकरार रखने में विधिगत त्रुटि की है। 02.जुलाई 2025 वर्तमान मामले में धारा 41-ए के तहत शक्ति का प्रयोग मजबूत, बाध्यकारी और महत्वपूर्ण कारणों की वैधानिक सीमा को पूरा नहीं करता है, न ही यह कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के सख्त अनुपालन को दर्शाता है।परिणामस्वरूप, रिट अपील स्वीकार की जाती है। 19 दिसंबर 2025 को पारित निर्णय और 02. जुलाई 2025 का विवादित आदेश निरस्त किया जाता है।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में साफ कहा है, इस न्यायालय ने आरोपों की योग्यता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। राज्य सरकार को छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा 41-ए, लागू नियमों और सर्वोच्च न्यायालय और इस न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार, इस आदेश की प्राप्ति की तिथि से दो सप्ताह की अवधि के भीतर एक नया आदेश पारित करने का अधिकार सुरक्षित है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यदि ऐसी कार्यवाही शुरू की जाती है, तो अपीलकर्ता को सुनवाई का पूर्ण और प्रभावी अवसर प्रदान किया जाएगा और सभी वैधानिक सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन किया जाएगा।

Radhakishan Sharma

राधाकिशन शर्मा: शिक्षा: बीएससी, एमए राजनीति शास्त्र व हिन्दी साहित्य में मास्टर डिग्री, वर्ष 1998 से देशबंधु से पत्रकारिता की शुरुआत। हरिभूमि व दैनिक भास्कर में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया। 2007 से जुलाई 2024 तक नईदुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर व सिटी चीफ के पद पर कार्य का लंबा अनुभव। 1 अगस्त 2024 से एनपीजी न्यूज में कार्यरत।

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