Poona Margam: संवाद, संवेदनशीलता और विकास से हिंसा का समाधान, मुख्यमंत्री विष्णुदेव के नेतृत्व में नक्सलवाद मुक्त छत्तीसगढ़ की सबसे मजबूत नींव बन रहा पूना मारगेम
Poona Margam: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार की नीति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बस्तर का भविष्य बंदूक से नहीं, बल्कि बातचीत, अवसर और मानवीय दृष्टिकोण से तय होगा।

Poona Margam: रायपुर। बस्तर अब केवल सुरक्षाबलों और नक्सल हिंसा की खबरों तक सीमित नहीं रह गया है। यह क्षेत्र धीरे धीरे संवाद, विश्वास और पुनर्वास की नई कहानी लिख रहा है। जिन इलाकों को लंबे समय तक डर, अविश्वास और हिंसा का प्रतीक माना गया, वहां अब सम्मानजनक जीवन, रोजगार और सामाजिक वापसी की राह खुल रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार की नीति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बस्तर का भविष्य बंदूक से नहीं, बल्कि बातचीत, अवसर और मानवीय दृष्टिकोण से तय होगा।
सुकमा जिले में पूना मारगेम पुनर्वास से पुनर्जीवन कार्यक्रम के तहत विभिन्न संगठनों से जुड़े 10 माओवादी कैडरों का आत्मसमर्पण इसी बदलाव का संकेत है। इनमें छह महिलाएं भी शामिल थीं, जिन पर कुल 33 लाख रुपये का इनाम घोषित था। यह सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि उस विचारधारा की पराजय है जो हिंसा को समाधान मानती थी। यह घटना बताती है कि बस्तर में भय और दबाव के बजाय अब विकास और विश्वास की जमीन मजबूत हो रही है। नक्सलवाद मुक्त छत्तीसगढ़ का सपना अब कागजों से निकलकर ज़मीनी हकीकत बनने लगा है। राज्य सरकार की पुनर्वास नीति का आधार केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहराई से मानवीय है।
आत्मसमर्पण करने वालों को अपराधी के रूप में नहीं, बल्कि भटके हुए नागरिक के रूप में देखा जा रहा है, जिन्हें समाज में सम्मान के साथ लौटने का अवसर दिया जाए। यह नीति स्पष्ट संदेश देती है कि हिंसा का रास्ता न वर्तमान सुरक्षित करता है, न भविष्य देता है। इसके विपरीत शिक्षा, कौशल, रोजगार और भरोसा ही स्थायी शांति की बुनियाद बन सकते हैं। पोलमपल्ली निवासी पोड़ियम भीमा, पुवर्ती की मुचाकी रनवती और डब्बमरका की गंगा वेट्टी जैसी कहानियां इस बदलाव की सच्ची तस्वीर पेश करती हैं।
कभी हिंसा के साए में जीने वाले ये लोग आज कौशल, खेल और रोजगार के जरिए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं। बस्तर में पुनर्वास का यह मॉडल दिखाता है कि संवेदनशील प्रशासन, स्पष्ट नीति और ईमानदार क्रियान्वयन मिलकर सबसे जटिल समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। कभी जिन हाथों में बंदूक थी, आज उन्हीं हाथों में औजार हैं। यही बस्तर की नई पहचान है और यही नक्सलवाद मुक्त छत्तीसगढ़ की सबसे मजबूत नींव।
धीरे-धीरे भरोसे में बदला अविश्वास
चांदामेटा, मुण्डागढ़, छिन्दगुर और तुलसी डोंगरी जैसे इलाके कभी नक्सली गतिविधियों के मजबूत गढ़ माने जाते थे। आज वही क्षेत्र विकास और शांति के उदाहरण बनते जा रहे हैं। जिन जंगलों में कभी संगठन के प्रशिक्षण शिविर लगते थे, वहां अब वन विभाग स्थानीय युवाओं को वानिकी कार्यों से जोड़ रहा है। मुण्डागढ़ क्षेत्र में बांस वनों के वैज्ञानिक उपचार से इस वर्ष करीब 20 लाख रुपये का तत्काल रोजगार सृजित हुआ है, जबकि आने वाले वर्षों में एक करोड़ रुपये से अधिक के अतिरिक्त रोजगार की संभावना बन रही है। यह बदलाव बताता है कि जंगल अब संघर्ष का नहीं, बल्कि आजीविका का साधन बन रहा है।
छिन्दगुर और चांदामेटा के पहाड़ी इलाकों में वन उपचार कार्यों के जरिए बीमार और मृत वृक्षों को हटाकर जंगल के संरक्षण का काम किया जा रहा है। इससे ग्रामीणों को तत्काल रोजगार मिला है और भविष्य में निरंतर आय के अवसर भी बनेंगे। वन विभाग और प्रशासन के लगातार संवाद ने वर्षों से चले आ रहे अविश्वास को धीरे धीरे भरोसे में बदला है। अब ग्रामीण विकास योजनाओं को शक की नजर से नहीं, बल्कि उम्मीद के रूप में देखने लगे हैं।
आत्मनिर्भरता और सम्मान से जुड़ता मिशन
पुनर्वास की यह प्रक्रिया केवल वन और कृषि तक सीमित नहीं है। बीजापुर और सुकमा जैसे जिलों में आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री, इलेक्ट्रीशियन, मैकेनिक और सिलाई जैसे व्यावहारिक कौशलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बीजापुर जिले में 30 युवाओं ने राजमिस्त्री का प्रशिक्षण पूरा किया है और वे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर निर्माण में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। जो युवा कभी हिंसा का हिस्सा थे, वही अब समाज के निर्माण में योगदान दे रहे हैं।
सुकमा के पुनर्वास केंद्र में 75 आत्मसमर्पित युवाओं को 5ळ स्मार्टफोन और 25 युवाओं को मेसन किट दी गई है। स्मार्टफोन के माध्यम से वे डिजिटल शिक्षा, सरकारी योजनाओं और स्वरोजगार के अवसरों से जुड़ पा रहे हैं। आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड, राशन कार्ड और जॉब कार्ड जैसी सुविधाओं से उन्हें सामाजिक सुरक्षा भी मिल रही है। यह पुनर्वास को केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रखता, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान से जोड़ता है।
10 दुर्गम गांवों में आजादी के बाद पहली बार लहराया तिरंगा
बस्तर की सुदूर पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसे उन गांव जहाँ दशकों तक सिर्फ खौफ का साया था, आज राष्ट्रगान की गूँज सुनाई दी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व और गृहमंत्री विजय शर्मा के मार्गदर्शन में सुकमा जिले के 10 अति-संवेदनशील गांवों में आजादी के बाद पहली बार तिरंगा फहराया गया। यह केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि नक्सलवाद पर लोकतंत्र की निर्णायक जीत का शंखनाद है।
सुकमा के दुर्गम अंचलों के नियद नेल्लानार के गांव तुमालभट्टी, वीरागंगलेर, मैता, पालागुड़ा, गुंडाराजगुंडेम, नागाराम, वंजलवाही, गोगुंडा, पेदाबोडकेल और उरसांगल में पहली बार गणतंत्र दिवस का पर्व मनाया गया। सुरक्षा बलों की सतत तैनाती और नवीन कैंपों की स्थापना ने वह सुरक्षा घेरा प्रदान किया, जिसके कारण ग्रामीण दशकों के भय को त्यागकर मुख्यधारा से जुड़ने आगे आए।
प्रशासन की सक्रियता से इन गांवों में प्रशासन की पहुँच सुनिश्चित हुई है। बुजुर्गों से लेकर स्कूली बच्चों तक ने भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारों के साथ तिरंगे को सलामी दी। ग्रामीणों की आँखों में सुरक्षित भविष्य की चमक इस बात का प्रमाण है कि शासन की ‘विश्वास आधारित नीति’ रंग ला रही है। सुरक्षा कैंपों के माध्यम से जवानों ने न केवल क्षेत्र को सुरक्षित किया, बल्कि ग्रामीणों का मित्र बनकर उनका दिल भी जीता।
पूना मारगेम (नया रास्ता) से बदलता हुआ सुकमा
छत्तीसगढ़ सरकार का अभियान “पूना मारगेम (गोंडी भाषा में जिसका अर्थ है नया रास्ता) अब हकीकत बनता दिख रहा है। सुदूर वनांचलों में तिरंगे का लहराना इस बात की पुष्टि करता है कि अब सुकमा में बंदूक की गूँज नहीं, बल्कि विकास और शांति की लहर चलेगी। जिला प्रशासन और पुलिस बल की इस साझा प्रतिबद्धता ने बस्तर में विकास के एक नए अध्याय की शुरुआत कर दी है।
‘पुनर्वास से पुनर्जीवन’ की बड़ी सफलता, 81 नक्सलियों ने छोड़ा हिंसा का रास्ता
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक अभियान को एक ऐतिहासिक सफलता मिली है। ‘पूना मारगेम’ के अंतर्गत साउथ सब ज़ोनल ब्यूरो से जुड़े 52 माओवादी कैडरों ने हिंसा और हथियारों का रास्ता छोड़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा विकास की मुख्यधारा को अपनाया है। इन पर कुल ₹1.41 करोड़ का इनाम घोषित था, जिससे यह आत्मसमर्पण अभियान अब तक की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धियों में शामिल हो गया है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे हिंसा की विचारधारा पर विश्वास की निर्णायक विजय बताया और कहा कि 81 नक्सलियों का आत्मसमर्पण इस बात का स्पष्ट संकेत है कि माओवाद अब केवल कमजोर नहीं पड़ रहा, बल्कि पूरी तरह बिखर रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर में अब माओवादी संगठन के साथ-साथ उसकी विकृत विचारधारा और उसका पूरा सपोर्ट सिस्टम भी ध्वस्त हो चुका है। जहाँ कभी भय, भ्रम और दबाव का माहौल था, वहाँ अब शासन की सशक्त उपस्थिति, सुरक्षा बलों की सक्रियता और विकास योजनाओं की प्रभावी पहुँच ने लोगों में भरोसा पैदा किया है।
‘पुनर्वास से पुनर्जीवन’ अभियान के तहत सरकार उन सभी भटके युवाओं को सम्मानजनक जीवन, सुरक्षा और आजीविका के अवसर उपलब्ध करा रही है, जो हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, और यह व्यापक आत्मसमर्पण उसी भरोसे का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
मुख्यमंत्री साय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन को इस सफलता का आधार बताते हुए कहा कि 31 मार्च 2026 तक नक्सल-मुक्त भारत का संकल्प अब तेज़ी से निर्णायक लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री ने दो टूक कहा कि छत्तीसगढ़ में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कहा कि बस्तर में अब भय की जगह भविष्य आकार ले रहा है, जहाँ सड़कें, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएँ, आजीविका और शासन की पहुँच लगातार मजबूत हो रही है।
