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युद्ध से छत्तीसगढ़ के प्लास्टिक सेक्टर में तनाव, सरकारी प्रोजेक्ट होंगे ठप, प्लास्टिक उद्योगों में कारखाने होने लगे बंद

ईरान- इजराइल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध का असर अब जाकर छत्तीसगढ़ के उद्योगों में साफ तौर पर दिखने लगा है। अब भी युद्ध नहीं थमा और तीन- चार सप्ताह तक लड़ाई चल गई तो फिर हालात नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ में रायपुर के उरला, सिलतरा और बिलासपुर के सिरगिट्टी- तिफरा औद्योगिक सेक्टर में सबसे कठिन दौर पर प्लास्टिक कारखाने गुजर रहे हैं। इन कारखानों में अब 24 घंटे उत्पादन का काम बंद कर दिया गया है और सिर्फ दो या तीन पालियों में काम लिया जा रहा है।

Chhattisgarh  Plastics Sector
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फोटो सोर्स- इंटरनेट, एडिट, npg.news

By Chitrsen Sahu

रायपुर 06 अप्रैल 2026, खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध के कारण पेट्रो केमिकल्स की सप्लाई कम हो रही है। प्लास्टिक उद्योग को पेट्रो केमिकल्स से ही कच्चा माल मिलता है। संकट होने के कारण दाम में बढ़ोतरी हो रही है और इसका सीधा असर प्लास्टिक उद्योगों पर दिख रहा है। प्लास्टिक से बने सामान और प्लास्टिक पैकेजिंग वाले सामानों का रेट बढ़ना तय है। दूसरी ओर प्लास्टिक कारखानों में कच्चे माल की आपूर्ति कम होने और रेट बढ़ जाने की वजह से उत्पादन भी लगातार कम हो रहा है। हालात यह है कि चौबीस घंटों को करने वाले कारखानों में अब दो या तीन पालियों में काम चल रहा है, कहीं- कहीं छोटे कारखानों में एक ही पाली में काम चलाया जा रहा है।

रायपुर और बिलासपुर के जानकार उद्योगपतियों का कहना है कि आपूर्ति घटने के कारण प्लास्टिक सेक्टर में करीब 50 प्रतिशत तक उत्पादन घट चुका है। युद्ध जारी रहा तो इसें और कटौती से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल कच्चे माल में दस से पंद्रह प्रतिशत तक का रेट बढ़ चुका है, जबकि कारखानों में उत्पादन कम हो रहा है। ऐसे में सामान का रेट बढ़ने के साथ कारखानों में काम नहीं होने से मजदूरों के सामने भी संकट खड़ा हो रहा है। विशेषकर दूसरे राज्यों या शहरों से आए मजदूरों के सामने आजीविका की स्थिति पैदा हो सकती है। फिलहाल उद्योगपति खुद ही इसे मैनेज करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे मजदूरों का नुकसान न हो। कारखानों को कुशल कारीगर मिलते नहीं हैं, इसे देखते हुए हर कारखाना मालिक किसी तरह इन्हें रोकना चाहत रहा है। इसके विपरीत युद्ध अब नहीं थमा तो कारखाना मालिकों के हाथ से भी नियंत्रण निकल सकता है।

सरकारी प्रोजेक्ट पर खतरा-

प्लास्टिक उद्योग चरमराने का सीधा असर उन सरकारी परियोजनाओं पर पड़ेगा, जहां प्लास्टिक का उपयोग ज्यादा होता है। इनमें से एक है जल जीवन मिशन। केंद्र सरकार की यह योजना छत्तीसगढ़ में भी चल रही है और राज्य सरकार इसमें अपने हिस्से का फंड लगा कर काम को आगे बढ़ा रही है। मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में पानी टंकियों के जरिए घर- घर पानी पहुंचाने का लक्ष्य लेकर काम किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में लगभग 90 प्रतिशत काम हो चुका है और इसे जून 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस प्रोजेक्ट में प्लास्टिक के पाइप का उपयोग ज्यादा होता है। ऐसे में दो तरह की दिक्कतें आएंगी। पहला तो रेट बढ़ जाने के कारण ठेकेदार इसकी खरीदी नहीं कर सकेंगे, क्योंकि जिस रेट पर टेंडर भरे हैं, उससे ज्यादा खर्च हो जाएगा। साथ ही सप्लाई कम होने से प्रोजेक्ट के लिए पर्याप्त मात्रा में पाइप लाइन भी नहीं मिल सकेगी। इसी तरह सिंचाई विभाग के प्रोजेक्ट पर भी इसका असर पड़ेगा। प्रदेश में बड़ी संख्या में प्रधान मंत्री आवास योजना के तहत शहरी और ग्रामीण घर बनाए जा रहे हैं। इन घरों में भी प्लास्टिक पाइप का उपयोग किया जा रहा है, साथ ही पानी की टंकी भी प्लास्टिक की ही होती है। ऐसे में कह पाना मुश्किल हो रहा है कि इन हालातों में मकान कैसे बन पाएगा।

दूसरे राज्यों से आए मजदूरों पर संकट-

कारखानों में लगातार उत्पादन कम होने से श्रमिकों के पास काम की गुंजाइश भी कम होती जा रही है। छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से ओडिशा, झारखंड और बिहार के मजदूर काम करते हैं। स्थानीय स्तर पर भी दूसरे शहरों के लोग रायपुर और बिलासपुर में काम कर रहे हैं। इस कारण अब कारखाना मालिकों के साथ मजदूर भी असमंजस में हैं। कुछ उद्योगपतियों का कहना है कि अगले 15- 20 दिनों में युद्ध नहीं थमा तो फिर भविष्य के लिए कुछ कहा नहीं जा सकता।

Chitrsen Sahu

मेरा नाम चित्रसेन साहू है, मै साल 2017 से जर्नलिज्म के फील्ड पर हूं। मैने कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता यूनिवर्सिटी से बैचलर डिग्री (BJMC) के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन (M.SC EM) किया है। MY NEWS 36, JUST 36 NEWS, RPL NEWS, INH24x7 NEWS, TV24 NEWS के बाद NPG NEWS में डेस्क एडिटर्स पर अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे क्राइम-राजनीतिक और टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों पर खास इंटरेस्ट है।

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