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CM विष्णुदेव साय की मंशा से उत्तर छत्तीसगढ़ में खेल चेतना का नया अध्याय, बस्तर ओलंपिक के बाद सरगुजा ओलंपिक छत्तीसगढ़ में खेल संस्कृति को नई दिशा देने की पहल

सरगुजा ओलंपिक की प्रेरणा बस्तर ओलंपिक की सफलता से मिली। वर्ष 2024 में आयोजित बस्तर ओलंपिक में स्थानीय युवाओं, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के खिलाड़ियों और आत्मसमर्पित नक्सलियों की भागीदारी ने खेलों को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बना दिया था। उस आयोजन की देशभर में सराहना हुई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसकी प्रशंसा की थी

CM विष्णुदेव साय की मंशा से उत्तर छत्तीसगढ़ में खेल चेतना का नया अध्याय, बस्तर ओलंपिक के बाद सरगुजा ओलंपिक छत्तीसगढ़ में खेल संस्कृति को नई दिशा देने की पहल
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By Sandeep Kumar

रायपुर। छत्तीसगढ़ में खेल संस्कृति को नई दिशा देने की पहल के रूप में आयोजित सरगुजा ओलंपिक 2025–26 अब सफलतापूर्वक संपन्न हो चुका है। बस्तर ओलंपिक की उल्लेखनीय सफलता के बाद सरगुजा संभाग में आयोजित इस बड़े खेल आयोजन ने उत्तर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में खेल प्रतिभाओं को सामने लाने का सशक्त मंच प्रदान किया है। जनवरी 2026 में शुरू हुई यह प्रतियोगिता विकासखंड, जिला और संभाग स्तर की विभिन्न स्पर्धाओं के साथ आयोजित हुई, जिसमें हजारों खिलाड़ियों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी निभाई।

सरगुजा संभाग अनुसूचित जनजाति बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है, जहां युवाओं में खेलों के प्रति स्वाभाविक रुचि और उल्लेखनीय प्रतिभा मौजूद है। इन्हीं प्रतिभाओं को पहचान देने और उन्हें मुख्यधारा के खेल मंचों से जोड़ने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने इस आयोजन को व्यापक स्वरूप दिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मंशा और उपमुख्यमंत्री तथा खेल एवं युवा कल्याण मंत्री अरुण साव के मार्गदर्शन में आयोजित यह प्रतियोगिता क्षेत्रीय खेल प्रतिभाओं के लिए महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आई। सरगुजा ओलंपिक ने यह साबित किया है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। इस आयोजन ने न केवल खिलाड़ियों को मंच दिया, बल्कि समाज में खेलों के प्रति जागरूकता और उत्साह भी बढ़ाया है। समग्र रूप से सरगुजा ओलंपिक 2025–26 उत्तर छत्तीसगढ़ में खेल चेतना के नए युग की शुरुआत का प्रतीक बनकर उभरा है, जिसने हजारों युवाओं के सपनों को नई उड़ान देने का मार्ग प्रशस्त किया है।

बहुस्तरीय प्रतियोगिता में हजारों खिलाड़ियों की भागीदारी

सरगुजा ओलंपिक में कुल 12 प्रमुख खेल विधाओं को शामिल किया गया, जिनमें कबड्डी, खो-खो, तीरंदाजी, फुटबॉल, हॉकी, कुश्ती, एथलेटिक्स, बैडमिंटन, कराते, बास्केटबॉल, वालीबॉल और अन्य पारंपरिक खेल शामिल रहे। प्रतियोगिता का पहला चरण विकासखंड स्तर पर आयोजित हुआ, जिसके बाद चयनित खिलाड़ी जिला स्तरीय स्पर्धाओं में पहुंचे। जिला स्तर की प्रतियोगिताओं में संभाग के सभी जिलों से लगभग चार हजार खिलाड़ियों ने भाग लिया। व्यक्तिगत स्पर्धाओं में विजेता खिलाड़ियों को प्रथम स्थान पर 2000 रुपये, द्वितीय स्थान पर 1500 रुपये और तृतीय स्थान पर 1000 रुपये की नकद राशि तथा ट्रॉफी प्रदान की गई। टीम स्पर्धाओं में भी विजेता टीमों को सम्मानित किया गया। जिला स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी अंतिम चरण यानी संभाग स्तरीय प्रतियोगिता में पहुंचे, जहां सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया।

आदिवासी प्रतिभाओं के लिए खुला नया मंच

सरगुजा ओलंपिक का मुख्य उद्देश्य आदिवासी अंचल की खेल प्रतिभाओं को पहचान देना और उन्हें राज्य की खेल अकादमियों से जोड़ना रहा। प्रतियोगिता में दो आयु वर्ग निर्धारित किए गए थे, जिनमें 14 से 17 वर्ष और 17 वर्ष से अधिक आयु के महिला और पुरुष खिलाड़ी शामिल हुए। विजेता खिलाड़ियों को ‘यूथ आइकन’ के रूप में पहचान दी गई और उन्हें राज्य की प्रशिक्षण अकादमियों में प्रवेश का अवसर प्रदान किया गया। यह पहल केवल प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके माध्यम से युवाओं में खेलों के प्रति नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार भी हुआ। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के अनेक खिलाड़ियों ने पहली बार इतने बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

बस्तर ओलंपिक की सफलता से प्रेरित पहल

सरगुजा ओलंपिक की प्रेरणा बस्तर ओलंपिक की सफलता से मिली। वर्ष 2024 में आयोजित बस्तर ओलंपिक में स्थानीय युवाओं, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के खिलाड़ियों और आत्मसमर्पित नक्सलियों की भागीदारी ने खेलों को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बना दिया था। उस आयोजन की देशभर में सराहना हुई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसकी प्रशंसा की थी। इसी अनुभव के आधार पर सरगुजा संभाग में भी इस प्रकार का व्यापक आयोजन किया गया, जिससे खेल प्रतिभाओं को नए अवसर मिल सके और खेल संस्कृति को ग्रामीण समाज में मजबूत किया जा सके।

पहचान और प्रतीक में झलकी क्षेत्रीय अस्मिता

सरगुजा ओलंपिक का लोगो और शुभंकर भी इस आयोजन की विशेष पहचान बने। लोगो में मैनपाट के प्रसिद्ध टाइगर पॉइंट जलप्रपात को दर्शाया गया, जो प्रकृति की ऊर्जा और निरंतर प्रवाह का प्रतीक है। इसके चारों ओर विभिन्न खेलों के प्रतीक चिन्ह समावेशिता और समान अवसर का संदेश देते हैं। इस आयोजन का शुभंकर ‘गजरु’ रखा गया, जो हाथी की छवि पर आधारित है। आदिवासी संस्कृति में हाथी शक्ति, धैर्य, बुद्धिमत्ता और एकता का प्रतीक माना जाता है। गजरु ने खेल भावना, अनुशासन और सामूहिक सहभागिता का संदेश दिया।

बाइचुंग भूटिया ने छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों की सराहना

बाइचुंग भूटिया ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा खेलों को दी जा रही प्राथमिकता की जमकर प्रशंसा की। उन्होंने बस्तर ओलंपिक के अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि राज्य सरकार युवाओं को एक सशक्त मंच प्रदान कर रही है। छत्तीसगढ़ सरकार युवाओं और खेल को प्राथमिकता दे रही है। जिससे सुदूर क्षेत्रों के खिलाड़ियों की प्रतिभा मंच मिला है। खेल विधाओं को अवसर मिल रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ से न केवल राष्ट्रीय खिलाड़ी, बल्कि ओलंपिक मेडलिस्ट भी निकलेंगे।

सिंसियरिटी और हार्ड वर्क से मिलेगी सफलता

उन्होंने खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि, सरकारी सहयोग और इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ व्यक्तिगत मेहनत सबसे महत्वपूर्ण है। सफलता के लिए फोकस्ड रहना, ईमानदारी से प्रयास करना और अंतिम तक हार न मानना ही सफलता की असली कुंजी है। उन्होंने कहा कि शासन की इन पहलों का सकारात्मक परिणाम जल्द ही देश के खेल मानचित्र पर दिखाई देगा। उन्होंने छत्तीसगढ़ शासन, खेल युवा कल्याण विभाग एवं जिला प्रशासन को सरगुजा ओलंपिक में आमंत्रित करने के लिए आभार प्रकट किया।

आज वह पूरे देश में “बस्तर ओलंपिक” के नाम से जाना जा रहा है-पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने उद्बोधन के दौरान विशेष रूप से बस्तर का उल्लेख करते हुए कहा कि जो बस्तर कभी आकांक्षी जिला माना जाता था, आज वह पूरे देश में “बस्तर ओलंपिक” के नाम से जाना जा रहा है। विकास की धारा अब बस्तर के गांव-गांव तक पहुंच रही है। कई ऐसे गांव हैं जहां पहली बार बस सेवा शुरू हुई और पूरे गांव ने इसे उत्सव की तरह मनाया। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी था, जब कुछ जिलों को पिछड़ा मानकर छोड़ दिया गया था। वहां रहने वाले करोड़ों लोगों की मौलिक आवश्यकताओं तक को नकार दिया गया था और उन्हें उसी अवस्था में जीने के लिए मजबूर कर दिया गया। इन क्षेत्रों में विकास के अभाव ने हालात को और बदतर बना दिया था। स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि ऐसे जिलों को पनिशमेंट पोस्टिंग के लिए उपयुक्त माना जाने लगा था, जिससे वहां की व्यवस्था और अधिक बिगड़ती चली गई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस सोच और संस्कृति को बदला गया। यह निर्णय लिया गया कि पिछड़े क्षेत्रों में योग्य, युवा और होनहार अधिकारियों को तैनात किया जाएगा और उन्हें पूरे तीन वर्ष का समय दिया जाएगा, ताकि वे स्वतंत्र रूप से काम कर सकें। एक के बाद एक ठोस निर्णय लिए गए और आज उनके परिणाम देश देख रहा है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज संसद में प्रधानमंत्री के बस्तर में हुए विकास पर दिए गए वक्तव्य पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि बस्तर क्षेत्र छत्तीसगढ़ का सौभाग्य है। यह क्षेत्र प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है, जिसे धरती का स्वर्ग कहा जा सकता है। यहां अनेक सुंदर जलप्रपात हैं, कुटुमसर जैसी विश्वविख्यात गुफा है, विशाल अबूझमाड़ का जंगल है और धुड़मारास गांव को विश्व पर्यटन संस्था द्वारा चयनित 20 सर्वश्रेष्ठ पर्यटन ग्रामों में स्थान मिला है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि लगभग चार दशकों तक नक्सलवाद के कारण विकास इस पूरे क्षेत्र को छू नहीं पाया, जबकि बस्तर का क्षेत्रफल केरल राज्य से भी बड़ा है। अब स्थिति तेजी से बदल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दृढ़ संकल्प, स्पष्ट नीति और सुरक्षा बलों के अदम्य साहस के कारण बस्तर में नक्सलवाद समाप्ति की ओर है और विकास ने नई गति पकड़ी है। उन्होंने कहा कि इसी विश्वास और उत्साह का परिणाम है कि बस्तर ओलंपिक का आयोजन पिछले वर्ष से किया जा रहा है। पिछले वर्ष इसमें 1 करोड़ 65 लाख युवाओं की भागीदारी रही, जबकि इस वर्ष यह संख्या बढ़कर 3 करोड़ 91 लाख तक पहुंच गई है। इसी तरह बस्तर पंडुम का आयोजन भी पिछले वर्ष किया गया और इस वर्ष भी किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम का शुभारंभ 7 तारीख को महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के करकमलों से होगा, जबकि समापन 9 तारीख को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मुख्य आतिथ्य में होगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी कई बार बस्तर और बस्तर ओलंपिक का उल्लेख किया जाना पूरे छत्तीसगढ़ और विशेष रूप से बस्तर क्षेत्र के लिए गर्व और सौभाग्य का विषय है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बस्तर अब भय और पिछड़ेपन की पहचान नहीं, बल्कि विश्वास, विकास और संभावनाओं का प्रतीक बन रहा है। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि नीति, नीयत और नेतृत्व सही हो, तो दशकों की उपेक्षा को भी बदला जा सकता है।

Sandeep Kumar

संदीप कुमार कडुकार: रायपुर के छत्तीसगढ़ कॉलेज से बीकॉम और पंडित रवि शंकर शुक्ल यूनिवर्सिटी से MA पॉलिटिकल साइंस में पीजी करने के बाद पत्रकारिता को पेशा बनाया। मूलतः रायपुर के रहने वाले हैं। पिछले 10 सालों से विभिन्न रीजनल चैनल में काम करने के बाद पिछले सात सालों से NPG.NEWS में रिपोर्टिंग कर रहे हैं।

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