CG News: भक्ति, साहस और कर्म की त्रिवेणी: पापमोचनी एकादशी पर मनाई जा रही माता कर्मा जयंती
CG News: 15 मार्च को चैत्र मास की पापमोचनी एकादशी है। भक्त माता कर्मा जयंती, यह तिथि केवल व्रत-उपवास की नहीं, बल्कि एक महान अवतरण की साक्षी है।

इमेज सोर्स- गूगल, एडिट बाय- NPG News
महासमुंद: 13 मार्च 2026| 15 मार्च को चैत्र मास की पापमोचनी एकादशी है। भक्त माता कर्मा जयंती, यह तिथि केवल व्रत-उपवास की नहीं, बल्कि एक महान अवतरण की साक्षी है। आज ही के दिन तैलिक कुल की आराध्या, परम प्रतापी माता कर्मा का प्राकट्य हुआ था। माता कर्मा का जीवन भक्ति, साहस और कर्म की त्रिवेणी है। उन्होंने समाज को वह राह दिखाई, जहाँ पसीने की बूंद भी पूजा बन जाती है।
परिश्रम ही परमेश्वर
तैलिक वंश सदैव से अपनी कर्मठता के लिए जाना जाता है। जब आधुनिक मशीनें नहीं थी, तब घानी से तेल पेरना और मानव सभ्यता के विकास में सहभागी बनना तेलियों का मुख्य कार्य था। इस कुल का मूल मंत्र ही 'परिश्रम' है। माता कर्मा ने इसी परिश्रमी वंश को एक नई पहचान दी। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं बसते हैं। वह हमारे हाथों के हुनर और माथे के पसीने में भी मिलते हैं। उन्होंने संदेश दिया कि अपने नियत कर्मों को पूरी ईमानदारी से करना ही सबसे बड़ी साधना है। उनके लिए कर्म ही धर्म था और सेवा ही जीवन का सार था।
भक्ति की अनूठी मिसाल
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो माता कर्मा की भक्ति अलौकिक थी। उनकी पुकार में वह शक्ति थी कि साक्षात जगत के स्वामी खिंचे चले आए। लोक कथाओं का वह प्रसंग आज भी रोमांच पैदा करता है, जब भगवान जगन्नाथ ने माता कर्मा के हाथों से बनी चावल की सादा खिचड़ी का भोग लगाया। प्रभु ने छप्पन भोग का त्याग कर भक्त के प्रेम को स्वीकार किया। यह घटना सिद्ध करती है कि ईश्वर केवल भाव के भूखे होते हैं। सदियों बाद भी जगन्नाथपुरी धाम ओडिशा में आज भी जगन्नाथ स्वामी को खिचड़ी का ही भोग लगाया जाता है। इस परंपरा की शुरुआत माता कर्मा की खिचड़ी से हुई थी।
कुल की रक्षक और संबल
इतिहास गवाह है कि मध्यकाल में जब तैलिक समाज भारी संकट में था, राजा के हाथी को नहलाने के लिए कुण्ड को तेल से भरने की बड़ी चुनौती थी। राजाज्ञा का उल्लंघन करने की किसी में हिम्मत नहीं थी, तब माता कर्मा एक रक्षक के रूप में उभरीं। क्रूर शासकों और अत्याचारियों ने जब समाज को प्रताड़ित किया, तब माता ने अपनी आत्मशक्ति से उनका प्रतिकार किया। उन्होंने न केवल समाज को संगठित किया, बल्कि उन्हें आत्मसम्मान से जीना सिखाया। उनके तेज और बुद्धिमत्ता के आगे बड़ी-बड़ी आसुरी शक्तियां भी परास्त हो गईं। उन्होंने तैलिक कुल की अस्मिता को बचाए रखा। इसी घटना से कर्मा को संत की उपाधि मिली। उन्हें लोग संत माता, भक्त माता कर्मा के नाम से पुकारने लगे।
पापमोचनी एकादशी का वरदान
माता कर्मा का अवतरण पापमोचनी एकादशी को हुआ था। यह तिथि पापों का नाश करने वाली मानी जाती है। माता कर्मा ने भी समाज की कुरीतियों और बुराइयों को नष्ट कर एक समतामूलक समाज की स्थापना की। आज जब हम उनकी जयंती मना रहे हैं, तो पूरा कृतज्ञ तैलिक समाज उन्हें नमन कर रहा है। आज घर-घर में उनकी भक्ति, आरती और कीर्तन हो रहे हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि एकता में ही शक्ति है। सद्कर्म ही भक्ति है। वसुधैव कुटुम्बकम के मूलमंत्र के साथ विश्व बंधुत्व वर्तमान समय की मांग है। बम-बारूद और विस्फोट केवल दूरियां बढ़ाते हैं। इंसान को क्रूर और अहंकारी बनाते हैं। पाप कर्म की ओर ले जाते हैं। मुक्ति का मार्ग तो अनन्य भक्ति में ही निहित है।
श्रेष्ठ कर्म का संदेश
माता कर्मा ने समाज को दो सूत्र दिए—श्रेष्ठ कर्म और अनन्य भक्ति। उनका कहना था कि 'भक्ति' बिना कर्म के अधूरी है और कर्म बिना भक्ति के बोझ लगने लगती है। वर्तमान समय, आधुनिक युग में भी उनके विचार बहुत प्रासंगिक हैं। आलस्य का त्याग कर समाज हित में कार्य करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा सुमन है। हमारी युवा पीढ़ी न केवल भक्ति से विमुख होती जा रही है, कर्म को भी साधना मानकर जीवन पथ पर अग्रसर नहीं हो रहे हैं। डिजिटल युग और एआई के अंधानुकरण ने हमें आलसी और सुविधाभोगी तो नहीं बना दिया है? कर्म पथ से विमुख तो नहीं हो रहे हैं, यह चिंतनीय है।
मानवता के लिए प्रेरणा पुंज
माता कर्मा केवल एक जाति अथवा समुदाय की गौरव नहीं हैं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा पुंज हैं। उनका जीवन दर्शन एक जलती हुई मशाल है। यह मशाल हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। आज कर्मा जयंती उत्सव पर हम संकल्प लें कि हम अपने श्रम से राष्ट्र का निर्माण करेंगे। हम सत्य और न्याय के मार्ग पर अडिग रहेंगे। विकसित भारत और विकसित छत्तीसगढ़ के सपने को साकार करने अपना सर्वश्रेष्ठ देंगे।
